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बड़ी कामयाबी: बिना दिमाग खोले छह घंटे में निकाल दिया ट्यूमर

Sun, 15 May 2016 02:00 AM IST
ब्यूरो/अमर उजाला, लखनऊ
ब्यूरो/अमर उजाला, लखनऊ Updated Sun, 15 May 2016 02:00 AM IST
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success of doctors in Lohia institute.
इलाज के दौरान डॉक्टर्स - फोटो : amar ujala

बिना दिमाग खोले छह घंटे में ही डॉ. राम मनोहर लोहिया आयुर्विज्ञान संस्थान के डॉक्टरों ने 6/6 सेंटीमीटर के ट्यूमर को निकाल दिया। यह सब संभव हो सका न्यूरो नेविगेशन मशीन की मदद से। महज तीन इंच का चीरा लगाकर डॉक्टरों की टीम ने छह घंटे में ट्यूमर को बाहर निकाल लिया। अब मरीज पूरी तरह स्वस्थ है। सोमवार को उसे टांका कटने के बाद डिस्चार्ज कर दिया जाएगा।

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केस स्टडी : दस हजार मरीजों में एक या दो को होता है ऐसा ट्यूमर
बलरामपुर, बरगदवा साएब के समीउल्ला की मां नजमुन्निशां (50) को सांस लेने, चलने फिरने, खाने-पीने और हाथ में कंपकंपाहट की समस्या थी। लोहिया संस्थान के न्यूरो सर्जरी विभाग में इलाज के लिए पहुंचीं तो सीटी स्कैन और एमआरआई जांच में पता चला कि नजमुन्निशां को ब्रेन में ट्यूमर है।
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न्यूरो सर्जन डॉ. दीपक कुमार सिंह ने बताया कि नजमुन्निशां को ‘पेट्रो क्लाइवल मेनिनजियोमा ट्यूमर’ यानी ग्रेड वन कैंसर था जो दस हजार ट्यूमर के मरीजों में एक या दो में ही पाया जाता है। पेट्रो क्लाइवल मेनिनजियोमा ट्यूमर दिमाग में काफी गहरे में होता है इसलिए इसे सर्जरी कर निकालना बेहद चुनौती का काम होता है।

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एडवांस्ड टेक्निक से हो सकी पिन पॉइंट सर्जरी

success of doctors in Lohia institute.

दो करोड़ की लागत से आई न्यूरो नेविगेशन मशीन की वजह से इस मामले में पिन पॉइंट सर्जरी प्लान की जा सकी। डॉ. दीपक के मुताबिक सामान्य तरीके से ऑपरेशन किया जाता तो 10 से 12 इंच का चीरा लगाना पड़ता। वहीं ऑक्सीपिटल बोन को ज्यादा काटना पड़ता।

दरअसल न्यूरो नेविगेशन मशीन में सीटी स्कैन व एमआरआई की डिजिटल रिपोर्ट से कनेक्ट होती है। ऑपरेशन के दौरान यह मशीन ट्यूमर तक पहुंचने की राह बताती रहती है।

इससे पता चलता है कि सर्जरी एक्विपमेंट दिमाग के किस हिस्से तक पहुंचा है। इससे कहां और कितना कट लगाना है आसान हो जाता है। इसकी मदद से नजमुन्निशां के ऑपरेशन में टारगेट पर पहुंचकर पोर्ट की मदद से ट्यूमर को पूरी तरह से काटकर निकाल दिया गया।

ओपेन सर्जरी में लगते 12 घंटे, दस दिन भर्ती रहना पड़ता

success of doctors in Lohia institute.

डॉ. दीपक के मुताबिक नजमुन्निशां का मंगलवार सुबह 10 बजे से शाम चार बजे तक यानी छह घंटे ऑपरेशन चला। ओपेन सर्जरी करने पर कम से कम बारह घंटे का समय लगता।

ऐसे में बारह घंटे तक एनेस्थेसिया देना मरीज के लिए कष्टदायक होता है। इससे जान पर अधिक खतरा बना रहता है। ओपेन सर्जरी में कम से कम आठ से दस दिन भर्ती रहना पड़ता है जबकि इसमें 70 घंटे बाद ही डिस्चार्ज करने की संभावना रहती है।

नजमुन्निशां के केस में ट्यूमर को पूरी तरह से निकाल दिया गया इसलिए केमोथेरेपी और रेडियोथेरेपी की जरूरत नहीं होगी।

जरा सी चूक से हो सकता था बड़ा नुकसान

success of doctors in Lohia institute.
डॉ. दीपक सिंह - फोटो : amar ujala

डॉ. दीपक सिंह ने बताया कि ब्रेन स्टेम के पास ट्यूमर होने से सर्जरी के दौरान छोटी-सी चूक से भी मरीज पूरी तरह लकवाग्रस्त हो सकता था। हाथ-पैर आंख कान और शरीर के प्रमुख अंग पूरी तरह स्थूल हो जाते। ऐसे में मशीन ने सर्जरी के दौरान अहम भूमिका निभाई और हर तरह के खतरे को पूरी तरह खत्म कर दिया।

इन डॉक्टरों की टीम ने किया कमाल
टीम में एसआर डॉ. दीपक मेवाड़, एनेस्थेटिस्ट डॉ. राजीव दुबे, पैरामेडिकल स्टाफ डॉ. दीपक शांडिल्य।

40 हजार रुपये में हो गया ऑपरेशन
डॉ. दीपक कुमार सिंह ने बताया कि प्राइवेट न्यूरो सर्जरी सेंटर में न्यूरो नेविगेशन मशीन की मदद से ऑपरेशन कराने पर 5 से 7 लाख रुपये का खर्च आता है। संस्थान में ये ऑपरेशन महज 40 हजार रुपये के खर्च में हो गया। अभी तक ये सुविधा पीजीआई में ही है। निजी सेंटरों में इस आधुनिक मशीन की मदद सर्जरी की सुविधा दिल्ली, गुड़गांव, बंगलूरू और हैदराबाद जैसे सेंटरों में है।

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