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जब विद्यानिवास मिश्र के लिए लखनऊ से आम व खरबूजा लेकर पहुंचे टंडन, पढ़ें- पूरा माजरा
Fri, 28 Jun 2019 04:52 PM IST
ishwar ashish
अखिलेश बाजपेयी/अमर उजाला, लखनऊ
अखिलेश बाजपेयी/अमर उजाला, लखनऊ
Published by: ishwar ashish
Updated Fri, 28 Jun 2019 04:52 PM IST
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राजर्षि दास टंडन
- फोटो : अमर उजाला
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राजर्षि पुरुषोत्तम दास टंडन ‘बाबू जी’ विधानसभा अध्यक्ष थे। पर, वह नागरी लिपि, हिंदी भाषा और साहित्य का काम भी अपनी देखरेख में करवा रहे थे। उन्होंने हिंदी साहित्य सम्मेलन का गठन भी किया था। वह बड़े कद के ही नहीं बड़े भाव के भी थे।
वह दूसरों की काफी चिंता करते थे। प्रसंग छतरपुर में आयोजित हिंदी साहित्य सम्मेलन का है। इसके आयोजक वरिष्ठ साहित्यकार विद्यानिवास मिश्र थे। उन्होंने बाबू जी को सम्मेलन के उद्घाटन के लिए बुलाया। मिश्र के संस्मरण से पता चलता है, ‘बाबू जी छतरपुर पहुंचे। सम्मेलन का उद्घाटन हुआ।
शोभा यात्रा निकली। विश्राम के लिए वह गांधी भवन पहुंचे। मैं भी वहां पहुंचा ताकि उन्हें कोई कठिनाई न हो। मुझे देखते ही उन्होंने अपना झोला खोला और बोले, ‘तुम्हारे लिए लखनऊ से खरबूजा और दशहरी आम लाया हूं। इसे तुम अभी खा लो, नहीं तो तुम लोगों की व्यवस्था में भूखे ही रह जाओगे।’
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वह दूसरों की काफी चिंता करते थे। प्रसंग छतरपुर में आयोजित हिंदी साहित्य सम्मेलन का है। इसके आयोजक वरिष्ठ साहित्यकार विद्यानिवास मिश्र थे। उन्होंने बाबू जी को सम्मेलन के उद्घाटन के लिए बुलाया। मिश्र के संस्मरण से पता चलता है, ‘बाबू जी छतरपुर पहुंचे। सम्मेलन का उद्घाटन हुआ।
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शोभा यात्रा निकली। विश्राम के लिए वह गांधी भवन पहुंचे। मैं भी वहां पहुंचा ताकि उन्हें कोई कठिनाई न हो। मुझे देखते ही उन्होंने अपना झोला खोला और बोले, ‘तुम्हारे लिए लखनऊ से खरबूजा और दशहरी आम लाया हूं। इसे तुम अभी खा लो, नहीं तो तुम लोगों की व्यवस्था में भूखे ही रह जाओगे।’
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जब वह अधिकारपूर्वक बोले- जो मैं कह रहा हूं वह करो
मैंने कहा, ‘बाबू जी! मेरी व्यवस्था है।’ वह अधिकारपूर्वक बोले, ‘जो मैं कह रहा हूं वह करो। लखनऊ से इतनी दूर आम व खरबूजा अपने खाने के लिए नहीं लाया हूं। फिर लखनऊ से आए आम को न खाना वहां की तौहीन है।’ कहने का अर्थ यह कि जब तक मैंने आम व खरबूजा खाना शुरू नहीं कर दिया तब तक वह खड़े रहे।
जब मैं आम खाकर चलने को हुआ तो उन्होंने फिर रोका और अपना बटुआ खोलते हुए ढेेर सा मेवा निकालकर खद्दर के रुमाल में बांधा और कहा, ‘इसे रख लो।’ मैं उन्हें देखने लगा तो बोले, ‘मेवा जेब में पड़ी रहेगी तो इस भागदौड़ में जब कमजोरी महसूस हो तो मुंह में डाल लेना।’
जब मैं आम खाकर चलने को हुआ तो उन्होंने फिर रोका और अपना बटुआ खोलते हुए ढेेर सा मेवा निकालकर खद्दर के रुमाल में बांधा और कहा, ‘इसे रख लो।’ मैं उन्हें देखने लगा तो बोले, ‘मेवा जेब में पड़ी रहेगी तो इस भागदौड़ में जब कमजोरी महसूस हो तो मुंह में डाल लेना।’