जब दस रुपये ज्यादा देकर पूर्व कांग्रेस अध्यक्ष ने ली भेंट में मिली इत्र की शीशी, पढ़ें पूरा माजरा
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वरिष्ठ साहित्यकार और कवि वियोगी हरि के संस्मरण के अनुसार, ‘राजर्षि पुरुषोत्तम टंडन जौनपुर गए थे। वहां उन्हें इत्र की दो शीशी भेंट की गईं। बढ़िया इत्र ‘रूह गुलाब।’ टंडन जी घर लौटकर आए तो साथ गए लोगों ने वे शीशियां भी लाकर घर में रख दीं।
संयोग से उसी समय टंडन जी के घर में एक शादी होने वाली थी। टंडन जी की पत्नी को लोग बउआ कहते थे। बउआ ने कहा, ‘इत्र अच्छा है। इसे रख लो।’ घर के लोगों ने उन शीशियों को उठाकर रख दिया। अगले दिन सुबह टंडन जी ने उन शीशियों के बारे में पूछा तो पता चला कि बउआ ने शादी के लिए रखवा दिया है।
इत्र वाले को बुलाकर लगवाई कीमत
बाबू जी ने पत्नी से कहा, ‘बउआ ये इत्र की शीशियां मेरी नहीं कांग्रेस के अध्यक्ष की हैं। इसलिए वे शीशियां मुझे दो ताकि जमा करा दें।’ हम लोगों ने समझाया, ‘बाबू जी! खरीदना तो पड़ेगा ही। इसलिए क्यों जिद कर रहे हैं। फिर ये कोई ऐसी वस्तु नहीं है जिसे कांग्रेस के कोष में जमा किया जा सके।’
बाबू जी ने कुछ देर सोचा फिर बोले, ‘किसी इत्र वाले को बुलवाओ।’ इत्र वाला बुलाया गया। बाबू जी ने उनकी कीमत लगवाई। जितनी कीमत लगी उससे दस रुपये अधिक कांग्रेस के कोष में जमा कराया, तब इन्हें रखा।’