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सुना है क्या: 'नेताजी की बंध गई घिग्घी', साथ ही 'फिर न बन जाए गले की फांस और सूची में कब आएगा नाम' के किस्से

Sun, 27 Sep 2026 10:00 AM IST
Bhupendra Singh अमर उजाला ब्यूरो, लखनऊ
अमर उजाला ब्यूरो, लखनऊ Published by: Bhupendra Singh Updated Sun, 27 Sep 2026 10:00 AM IST
सार

यूपी के राजनीतिक गलियारे और प्रशासन में तमाम ऐसे किस्से हैं, जो हैं तो उनके अंदरखाने के... लेकिन, चाहे-अनचाहे बाहर आ ही जाते हैं। ऐसे किस्सों को आप अमर उजाला के "सुना है क्या" सीरीज में पढ़ सकते हैं। तो आइए पढ़ते हैं इस बार क्या है खास...

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story of worries about it becoming millstone around neck and speculation over when name will appear on list
सुना है क्या/suna hai kya - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

यूपी के राजनीतिक गलियारे और प्रशासनिक गलियों में आज तीन किस्से काफी चर्चा में रहे। चाहे-अनचाहे आखिर ये बाहर आ ही जाते हैं। इन्हें रोकने की हर कोशिश नाकाम होती है। आज की कड़ी में 'नेताजी की बंध गई घिग्घी' की कहानी। इसके अलावा 'फिर न बन जाए गले की फांस' और 'सूची में कब आएगा नाम' के किस्से भी चर्चा में रहे। आगे पढ़ें, नई कानाफूसी...

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नेताजी की बंध गई घिग्घी

प्रदेश के पढ़ाई-लिखाई वाले विभाग में लाइमलाइट में बने रहने के शौकीन एक नेताजी हाल में फंस गए। दरअसल, नेताजी ने एक सूचना बिना जांचे-परखे सार्वजनिक कर दी। थोड़ी ही देर में इसे लेकर राजधानी से प्रयागराज तक खोजबीन शुरू हो गई। पड़ताल में पता चला कि यह सूचना गलत है। जब उन्हें पता चला कि यह उनके लिए भारी पड़ने वाला है तो उनकी घिग्घी बंध गई। आननफानन उन्होंने न सिर्फ संदेश डिलीट किया बल्कि जगह-जगह पैरवी में भी जुट गए कि इसे लेकर उन पर कोई कार्रवाई न हो।

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फिर न बन जाए गले की फांस

कुछ समय पहले सुर्खियों में रहा एक कारोबारी समूह फिर से अंदर ही अंदर ब्यूरोक्रेसी में चर्चा का विषय बन गया है। दरअसल सरकार से मिलने वाली रियायत को लेकर फिर से अंदरखाने चख-चख मची है। विभाग में कानाफूसी जोरों पर है कि समूह को रियायत देने के लिए नियमों में बदलाव किया जा सकता है। कंप्यूटर पर फाइलें चल निकली हैं। राहत देने के लिए एड़ी चोटी का जोर भी लग रहा है। वहीं, कुछ साहबों को चिंता है कि जल्दबाजी में कहीं फिर से यही समूह उनके लिए गले की फांस न बन जाए।

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सूची में कब आएगा नाम

पुलिस महकमे के कुछ बड़े अधिकारी तबादले की सूची में अपना नाम आने के इंतजार में हैं। एक अधिकारी कमिश्नरेट की कमान संभालने के लिए व्याकुल हैं तो एक की नजर कानून व्यवस्था पर है। जैसे जैसे समय बीत रहा है, वैसे व्याकुलता बढ़ रही है। हर तरफ से फील्डिंग लगाई गई ताकि मामला किसी भी तरह से गड़बड़ न हो। अब देखना होगा कि आखिर सूची कब आएगी और उसमें साहब के नाम होंगे या नहीं। अगर नाम होते भी हैं तो क्या उनके मन मुताबिक होंगे या नहीं।

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