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सिर्फ नाम के ही ‘निराला’ नहीं थे साहित्यकार निराला, पढ़ें ये रोचक वाक्या
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, लखनऊ
Updated Mon, 08 Oct 2018 04:27 PM IST
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सूर्यकांत त्रिपाठी 'निराला'
- फोटो : डेमो
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प्रख्यात साहित्यकार सूर्यकांत त्रिपाठी ‘निराला’ सिर्फ नाम के निराला नहीं थे। उनका व्यवहार भी निराला था। लखनऊ के एक बड़े सेठ ने साहित्य गोष्ठी और कवि सम्मेलन आयोजित किया। उस समय निराला के बगैर तो साहित्यक संगोष्ठी और कवि सम्मेलन का कोई मतलब ही नहीं था।
सेठ जी अपने कुछ साथियों के साथ निराला जी के यहां पहुंचे। लेकिन उल्टे पैर दौड़ पड़े। हिंदी शिक्षक संघ के राष्ट्रीय अध्यक्ष डॉ. दीपक राय बताते हैं, ‘सेठ जी को लगा कि निराला जी इस समय काफी तंगी में हैं। लिहाजा उन्होंने कहा ‘आप किराए की चिंता न करिएगा। आपके लिए मोटर कार भेज दूंगा।’
सेठ का इतना कहना था कि निराला गुस्से से तमतमा उठे। बोले, ‘ भागो यहां से, नहीं तो ठीक नहीं होगा। मुझे तुम्हारे यहां नहीं आना।’ सेठ जी कुछ नहीं बोले, हाथ जोड़ कर निराला जी के चरण छुए और लौट आए। निश्चित दिन पर संगोष्ठी शुरू हुई। सेठ जी ने देखा कि निराला जी भी श्रोताओं के बीच पहली पंक्ति में बैठे हुए हैं।
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सेठ जी अपने कुछ साथियों के साथ निराला जी के यहां पहुंचे। लेकिन उल्टे पैर दौड़ पड़े। हिंदी शिक्षक संघ के राष्ट्रीय अध्यक्ष डॉ. दीपक राय बताते हैं, ‘सेठ जी को लगा कि निराला जी इस समय काफी तंगी में हैं। लिहाजा उन्होंने कहा ‘आप किराए की चिंता न करिएगा। आपके लिए मोटर कार भेज दूंगा।’
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सेठ का इतना कहना था कि निराला गुस्से से तमतमा उठे। बोले, ‘ भागो यहां से, नहीं तो ठीक नहीं होगा। मुझे तुम्हारे यहां नहीं आना।’ सेठ जी कुछ नहीं बोले, हाथ जोड़ कर निराला जी के चरण छुए और लौट आए। निश्चित दिन पर संगोष्ठी शुरू हुई। सेठ जी ने देखा कि निराला जी भी श्रोताओं के बीच पहली पंक्ति में बैठे हुए हैं।
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सरस्वती की साधना करने वाले के यहां कैसे न आता
सूर्यकांत त्रिपाठी 'निराला'
- फोटो : डेमो
वह तुंरत निराला जी के पास गए और उनके पैर छूकर उनसे मंच पर चलने का आग्रह किया।संगोष्ठी और कवि सम्मेलन खत्म हुआ तो सेठ ने हाथ जोड़कर कहा ‘आप आ गए बड़ी कृपा हुई। मैने तो आशा ही छोड़ दी थी।’
निराला जी बोले, ‘मैने सेठ को मना किया था लेकिन साहित्यानुरागीको नहीं। मेरे डांटने पर भी जब तुम पैर छूकर हाथ जोड़ते हुए चले आए तो लगा कि तुम सिर्फ लक्ष्मी उपासक नहीं बल्कि सरस्वती के भी साधक हो। सरस्वती की साधना करने वाले के यहां कैसे न आता।’
निराला जी बोले, ‘मैने सेठ को मना किया था लेकिन साहित्यानुरागीको नहीं। मेरे डांटने पर भी जब तुम पैर छूकर हाथ जोड़ते हुए चले आए तो लगा कि तुम सिर्फ लक्ष्मी उपासक नहीं बल्कि सरस्वती के भी साधक हो। सरस्वती की साधना करने वाले के यहां कैसे न आता।’