भीख नहीं, सहारे की आस में बेबस पूर्व सीएमओ की बुजुर्ग बेटियां
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कभी जो व्यक्ति हजारों लोगों की सेहत से जुड़े निर्णय करता था, आज उसी के परिवारीजन गोमीतनगर की एक खंडहरनुमा जगह पर लोगों के रहमो-करम पर गुजारा कर रहे हैं। चीफ मेडिकल ऑफिसर रहे डॉ. मुरली मनोहर माथुर का यह परिवार लंबे समय से इसी तरह अपने अस्तित्व के लिए लड़ रहा है। डॉ. माथुर अब इस दुनिया में नहीं हैं, लेकिन अमर उजाला ने इनके हालात को जानने के प्रयास में परिवार के बाकी सदस्यों से बात की तो कई दुखद तथ्य सामने आए।
गोमतीनगर का विनयखंड अपने खूबसूरत मकानों के लिए जाना जाता है। इन्हीं के बीच एक खंडहर में डॉ. माथुर का यह परिवार रह रहा है। इसमें डॉ. माथुर की बेटियां राधा माथुर और मांडवी माथुर रहती हैं। वे मानसिक रूप से पूरी तरह ठीक नहीं हैं। उनके एक बड़े भाई बीएन माथुर की एक साल पहले मौत हो गई थी।
वे तीनों बीते करीब 25 वर्ष से इन्हीं हालात में रह रहे थे। अब राधा और मांडवी ही बची हैं। वे दोनों ग्रेजुएट हैं, लेकिन हालात ने उन्हें ऐसे मुकाम पर ला छोड़ा है, जहां उनका जीवन बसर मुकिश्ल हो गया है। शहर के पॉश इलाके में उनका घर है, लेकिन वह खंडहर हो चुका है। उन्होंने बताया कि उनका बैंक अकाउंट है, जिसमें कुछ पैसा भी है, इसी से आ रहा मामूली ब्याज उनकी एकमात्र आय है।
पिता की मौत के बाद बिगड़े हालात
डॉ. एमएम माथुर बड़े चिकित्सा अधिकारी थे, बलरामपुर अस्पताल में भी तैनात रहे। इस परिवार में सभी सुख-सुविधाएं थीं। घूमना-फिरना और ऐशो-आराम सभी कुछ उनके पास था। लेकिन इन बहनों के अनुसार, पहले मां और फिर पिता की मौत के बाद जैसे विपत्तियों का पहाड़ उन पर टूटा। एक बहन अपना मानसिक संतुलन खो बैठी। परिवार में बड़े भाई बीएन माथुर परिवार को संभाल नहीं पाए। इसके बाद लगातार हालात बिगड़े और अंत में भीख मांगना ही उनके लिए अस्तित्व को बचाए रखने का जरिया बना।
पड़ोसियों की मदद से गुजर रही जिंदगी