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...जब भारतीयों का घर में घुसना भी था वर्जित, तब 'मुंशीजी' का स्वागत करते थे अंग्रेज

Thu, 22 Nov 2018 04:14 PM IST
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, लखनऊ
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, लखनऊ Updated Thu, 22 Nov 2018 04:14 PM IST
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story of munsi naval kishore
मुंशी नवल किशोर
बात अंग्रेजी हुकूमत के इस दौर की है जब अंग्रेज अफसरों के घरों में आमतौर पर हिंदुस्तानियों का प्रवेश प्रतिबंधित हुआ करता था। उस समय कोई बड़ा अंग्रेज अफसर किसी भारतीय का स्वागत करे तो ताज्जुब ही माना जाएगा। उनका जन्म तो मथुरा में हुआ था और पैतृक घर अलीगढ़ में था, पर पत्रकारिता और व्यवसाय में रुचि के चलते वह 22 वर्ष की उम्र में ही लखनऊ आ गए।
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लखनऊ में उन्होंने ‘नवल किशोर प्रेस’ स्थापित किया, जिसने उर्दू, फारसी, अरबी, संस्कृत सहित धार्मिक, सामाजिक और अन्य कई विषयों पर पुस्तकें छापीं। कुरान व गीता के भी कई संस्करण छापे। ख्याति इतनी बढ़ी कि इस प्रेस को उस समय दुनिया के नंबर एक पेरिस के एलपाइन प्रेस के बाद दूसरा दर्जा दिया जाने लगा।
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इन्होंने ही लखनऊ में अपर इंडिया कूपन पेपर मिल स्थापित कर उत्तर भारत में कागज बनाने का पहला कारखाना स्थापित करने का कीर्तिमान बनाया। बात हो रही है मुंशी नवल किशोर की। इतिहासविद् प्रो. पंकज कुमार बताते हैं, ‘प्रसंग 1883 का है।
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दिसंबर की कड़ाके की ठंड। मिस्टर ह्यूम लखनऊ में थे। एक दिन पहले ही रात में सभी से कह चुके थे कि कल सुबह एक विशेष मेहमान आने वाले हैं। इसलिए सुबह से उनके बंगले पर साफ-सफाई और स्वागत की तैयारी चल रही थी।

लोगों को लगा कि वायसराय आने वाले हैं

story of munsi naval kishore
मुंशी नवल किशोर - फोटो : डेमो
लोग अटकलें लगा रहे थे कि शायद लाट साहब आने वाले हैं या फिर वायसराय। मि. ह्यूम बार-बार बरामदे में चक्कर लगा रहे थे। सुबह के 11 बजे रहे होंगे कि मुख्य फाटक से अंदर एक बग्घी आई और मि. ह्यूम लपककर उसके पास पहुंचे।

बग्घी से साफा बांधे एक सफेद दाढ़ी वाला रोबीला व्यक्ति निकला। एक भारतीय के स्वागत में पलक-पांवड़े बिछाए ह्यूम को देखकर नौकर ताज्जुब में थे। यह कोई और नहीं मुंशी जी थे। अंग्रेज अफसर को एक भारतीय का स्वागत करते देख नौकरों का सीना भी गर्व से चौड़ा हो गया था।’
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