अयोध्या: हाशिम और परमहंस में नहीं था मनभेद, एक ही तांगे पर जाते थे अदालत
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राम जन्मभूमि मामले के पक्षकार रहे महंत परमहंस रामचंद्रदास और हाशिम अंसारी की दोस्ती के सभी कायल थे। कोर्ट में सुनवाई के दौरान तमाम असहमतियों के बावजूद बाहर इन दोनों को अक्सर साथ मिलते रहने में गुरेज नहीं था। मरते दम तक दोनों ने गंगा-जमुनी तहजीब को अयोध्या में कायम रखा।
अपने हक की लड़ाई में उन्होंने कभी अयोध्या का आपसी सौहार्द खराब नहीं होने दिया यहां तक प्रदेश में कई बार इस मुद्दे पर तनाव हुआ लेकिन तब भी दोनों शहर का सौहार्द बनाए रखने में कामयाब रहे।
आखिरी सांस तक हाशिम को रहा फैसले का इंतजार
बाबरी मस्जिद के लिए 60 साल से भी अधिक समय तक कानूनी लड़ाई लड़ने वाले हाशिम अंसारी जीवन के अंतिम समय में काफी मायूस थे। वह आखिरी सांस तक अदालत के फैसले का इंतजार करते रहे, लेकिन उन्हें यह मौका नसीब नहीं हुआ।
हाशिम अयोध्या के उन चुनिंदा लोगों में से थे जिन्होंने धर्म और बाबरी मस्जिद के लिए संविधान व कानून के दायरे में रहते हुए आजीवन लड़ाई लड़ी। रामलला टेंट में थे उससे भी वह दुखी थे।
जीवन के अंतिम समय में उन्होंने एक साक्षात्कार में कहा था, मैं फैसले का इंतजार कर रहा हूं और मौत का भी। लेकिन चाहता हूं कि मौत से पहले फैसला देख लूं। मायूसी की वजह पूछने पर वह कहते थे कि जो मुखालिफ पार्टियां चैलेंज कर रही हैं, उनसे मायूसी है और हुकूमत कोई एक्शन नहीं लेती। इससे भी उनमें निराशा है।
हर हाल में अमन चाहते थे
साल 1934 में विवादित ढांचे के अंदर मूर्तियां रखने के बाद शांति व्यवस्था बनाए रखने में जिन्हें गिरफ्तार किया गया था उनमें हाशिम अंसारी भी शामिल थे। लोगों ने उनसे मुकदमा करने को कहा तो वे बाबरी मस्जिद के पैरोकार हो गए। लेकिन, कानूनी लड़ाई से इतर वे अमन के पैरोकार भी थे।
दंगाइयों के हमले में हिंदुओं ने बचाया
हाशिम का जन्म 1921 में हुआ था। जब वह 11 साल के थे, तभी उनके पिता की मृत्यु हो गई थी। दर्जा दो तक पढ़े हाशिम के परिवार की आमदनी का जरिया सिलाई था। 6 दिसंबर 1992 में शहर के बाहर से आए लोगों ने घर जला दिया था। लेकिन अयोध्या के हिंदुओं ने उन्हें और उनके परिवार को बचाया।
सरकार से उन्हें जो मुआवजा मिला उन्होंने अपना घर दोबारा बनवाया और एक एंबेसडर कार खरीदी थी। उनका बेटा मोहम्मद इकबाल इसी एंबेसडर को टैक्सी के तौर पर हिंदू तीर्थयात्रियों को अयोध्या के मंदिरों का दर्शन कराते हैं।
कांग्रेस को मानते थे दोषी...
राम जन्मभूमि-बाबरी मस्जिद विवाद में हाशिम अंसारी कांग्रेस को दोषी मानते थे। वहीं, मुस्लिम नेताओं के भी आलोचक थे। सन 1961 में जब सुन्नी वक्फ बोर्ड ने मुकदमा किया था तब उसमें हाशिम पहले मुद्दई बने।
पुलिस प्रशासन की सूची में नाम होने की वजह से 1975 में इमरजेंसी के दौरान उन्हें भी 8 महीने तक बरेली सेंट्रल जेल में रखा गया था। इसके लिए उन्होंने कभी कांग्रेस को माफ नहीं किया।