अटल जी से जुड़ी यादें: बड़ा कद और बड़ा पद मिलने के बावजूद कभी 'बड़ेपन' का एहसास नहीं होने दिया
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एक ऐसा शख्स जिसने जो राह पकड़ी उसके शीर्ष पर पहुंच गया। वह राजनीति के महानायक कहे गए लेकिन हिंदूवादी पार्टी के नेता होने के बावजूद मुसलमानों के भी महबूब रहे। कवि के रूप में 'अटल' छाप छोड़ने वाले वाजपेयी ने पत्रकार के नाते कलम संभाली तो नए प्रतिमान गढ़ दिए। साहित्यकारों की जमात में भी सम्मान हासिल किया।
बड़ा कद और बड़ा पद मिलने के बावजूद अटल ने कभी लोगों को अपने 'बड़ेपन' का एहसास नहीं होने दिया। अटल का दिल हमेशा बड़ा बना रहा। सरलता और सहजता उनकी पहचान रही। अटल बिहारी वाजपेयी पैदा भले ही लखनऊ में नहीं हुए लेकिन वह खुद को असली नखलऊवा कहते थे। इस शहर के लोगों से उनके घर-घरैया जैसे रिश्ते रहे। तभी तो उनकी बातों में लखनऊ बोलता था।
उनकी बुआ कृष्णा दीक्षित यही लखनऊ में ब्याही थीं। उस नाते उनका लखनऊ आना-जाना तो बचपन में ही शुरू हो गया था। पर, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के उत्तर प्रदेश के तत्कालीन प्रांत प्रचारक भाऊराव देवरस और सह प्रांत प्रचारक पं. दीनदयाल उपाध्याय ने 1947 में जब कानपुर में उनकी वकालत की पढ़ाई छुड़ाकर 'राष्ट्रधर्म' निकालने की जिम्मेदारी सौंपी तब से तो उनका लखनऊ से अटूट नाता हो गया। किसी घर में उनके भैया व भौजाई बन गए तो कहीं बुआ-फूफा। कहीं जिया तो कहीं साले-बहनोई के भी रिश्ते रहे।
अस्वस्थता के कारण अटल भले ही मृत्यु से पहले एक दशक से ज्यादा वक्त तक अपने लखनऊ नहीं आ पाए। पर, न वह लखनऊ को कभी भूले और न लखनऊ वाले अटल को। हर साल 25 दिसंबर को उनकी दीर्घायु की होर्डिंगें इस शहर की गली-गली से जुड़ी अटल की यादों का ताजा कर देती थीं।
यह पहला मौका होगा जब उनके अपने शहर और प्रदेश में उनकी दीर्घायु की जगह सीने पर पत्थर रखकर श्रद्धांजलि की कामना करते हुए कार्यक्रम होंगे। ऐसे में याद आती हैं लखनऊ से जुड़ी वह कुछ यादें जो हंसाती भी हैं, गुदगुदाती भी हैं और अटल के अब न होने का एहसास कराते हुए रुला भी देती हैं। ऐसे में पढ़ें अटल जी से जुड़े हुए कुछ किस्से:
अटल बोले, शादी के लिए कोई मिले तो जरूर बताना
अटल बड़े नेता थे। इलाहाबाद के विद्यार्थी मिलने आए तो उनके सवाल पर अटल के मुंह से जो जवाब निकला उसे सुनकर कुछ देर के लिए इन छात्रों की भी समझ में नहीं आया कि वह आगे क्या बोलें..। खान-पान के शौकीन वाजपेयी मजाकिया भी कम नहीं थे। आपातकाल के दौरान विधानसभा के मौजूदा अध्यक्ष हृदयनारायण दीक्षित भी अटल जी के साथ इलाहाबाद के नैनी जेल में बंद थे।
एक दिन इलाहाबाद विश्वविद्यालय के छात्रों का एक ग्रुप वाजपेयी से मिलने जेल आया। बातचीत चली तो थोड़ी देर में बेतकुल्लफी तक पहुंच गई। एक छात्र ने अटल जी से पूछ लिया, 'अटल जी आपने शादी क्यों नहीं की? अटल जी ने सुना और एक क्षण के लिए आंखें बंद की और फिर जोर का ठहाका लगाते हुए बोले, 'यार! जब शादी की उम्र थी तब जिंदगी की मस्ती में डूबा रहा। इस बारे में सोचने का मौका ही नहीं मिला। अब, जब सोचता हूं तो कोई मिलता नहीं। इतना सुनकर छात्रों का हंसते-हंसते बुरा हाल।
बकौल विधानसभा अध्यक्ष 'बातचीत करके थोड़ी देर बाद जब वे विद्यार्थी वापस लौटने को खड़े हुए तो अटल जी ने उस छात्र को रोका जिसने उनसे शादी को लेकर सवाल किया था। एक क्षण उसे गौर से देखा और फिर कंधे पर हाथ रखकर जैसे कोई राज की बात कर रहे हों उससे बोले, 'यार! देखना, अगर कोई मिले तो जरूर बताना। अटल का यह कहना था कि हम लोगों के मुंह से भी हंसी निकल गई। वह छात्र तो पूछिए न सीधे वाजपेयी जी के पैरों पर। वाजपेयी जी उसे उठाया और कहा, 'जीवन में कभी मस्ती खत्म न होने देना।'
अटल जी बोले, डरो नहीं थैली मारूंगा नहीं
हृदयनारायण दीक्षित जी बताते हैं, 'मेरी अटल जी से पहली मुलाकात 25 वर्ष की उम्र में उस समय हुई जब मैं उन्नाव में जनसंघ का जिला मंत्री था। उन्नाव की तरफ से अटल जी को थैली देने की योजना बनी। अटल जी आए। मैने बोलना शुरू किया। इसी बीच अचानक अटल जी की आवाज सुनाई दी, 'हृदय जी! यह साहित्य सम्मेलन नहीं है। भाषा सरल करो।' फिर बोलने खड़े हुए तो कहा, ' आप लोग सोच रहे होंगे कि यह थैली मैं मार मार दूंगा। घबराइए नहीं। निश्चिंत रहें। आपकी थैली सुरक्षित रहेगी। मैं थैली मार नहीं हूं। इसे लेकर नहीं जाऊंगा। थैली का धन उन्नाव की पार्टी और पार्टी वाले ही खर्च करेंगे।