जरूर पढ़ें, अटल बिहारी की जिंदगी से जुड़े मजेदार किस्से
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बात खाने-पीने की हो या संवेदनशीलता की। लखनऊ वालों की कोई बात अटल बिहारी वाजपेयी के बिना पूरी नहीं हो सकती। आखिर विद्यार्थी जीवन के बाद से उनके फर्श से अर्श तक पहुंचने का यह शहर गवाह जो रहा है।
उनके पत्रकारिता जीवन का हमसफर बना यह शहर चुनावी राजनीति में उनके प्रस्थान का भी आधार बना। शुरुआत में इस शहर ने उन्हें भले ही सफलता नहीं दी, लेकिन उनके प्रति लखनऊ वालों का अपनापन और लगाव हमेशा बना रहा।
तमाम घरों में उनकी भौजाई और भाई बन गए तो कई घरों की रसोई में आज भी अटल की पसंद के व्यंजन की खुशबू महकती है। स्व. बजरंग शरण तिवारी, महापौर डॉ. दिनेश शर्मा और राजेंद्र कलंत्री के घरों से अटलजी की यादें कुछ विशेष ही जुड़ी रही हैं।
स्वास्थ्य कारणों से वाजपेयी भले ही लगभग एक दशक से लखनऊ न आ पाए हों, लेकिन लोगों की यादों में वे आज भी वैसे ही रचे-बसे हैं मानो यहीं मौजूद हों।
उनके 92वें जन्मदिन पर उनके जीवन के शुरुआती दौर को देखने वालों को उनकी यादें आज भी गुदगुदाती हुए रुला तक देती हैं। साथ ही याद दिला देती हैं उनकी हरफनमौला शैली की। साथ ही कहने लगती हैं, अटल, काश! बस एक बार ही सही। स्वस्थ होकर अपने लखनऊ तो घूम जाते।
चाट और मिठाई की दुकान पर जमती थी चौकड़ी
पूर्व महापौर और पूर्व विधायक डॉ. दाऊजी गुप्त कहते हैं, ‘मैं घोर कांग्रेसी परिवार का और वे कट्टर जनसंघी, पर शायद ही कोई दिन ऐसा बीतता हो जब चौक से लेकर अमीनाबाद तक उन दिनों की नामी-गिरामी चाट और मिठाई की दुकान पर हम लोगों की चौकड़ी न जमती हो।
अटलजी अमीनाबाद में कृष्णगोपाल कलंत्री के यहां रहते थे। साथ ही उनकी दुकान के ऊपर मौजूद स्वदेश अखबार को संभालते थे। कलंत्रीजी के बेटे नरेंद्र कलंत्री मेरे मित्र थे।
इसी नाते अटलजी से भी नजदीकी हो गई। फिर तो चौक के शंभू हलवाई की रबड़ी और गणेशगंज के नौबत हलवाई की जलेबियों का हम लोगों की जुबान को ऐसा स्वाद लगा कि बिना इन्हें खाए बिना चैन ही नहीं मिलता था।
शाम को गणेशगंज में ही तिवारी की चाट की दुकान पर दावत भी दिनचर्या का हिस्सा थी।’ कहते हैं कि अटलजी को कब्र के पास वाली मिठाई की दुकान में बनने वाली इमरती दूध में भिगोकर खाने में खूब मजा आता था। बड़े पदों पर पहुंचने के बावजूद वे जब लखनऊ आते तो इन्हें चखे बगैर न रहते। आज स्वास्थ्य कारणों से उनकी निष्क्रियता बहुत कष्ट देती है।
खाना छोड़ पहुंच गए हवाई जहाज छुड़ाने...
भाजपा के वरिष्ठ नेता लालजी टंडन बताते हैं कि अटलजी की संवेदनशीलता का जवाब नहीं है। श्रीराम जन्मभूमि आंदोलन के दौरान की बात है। प्रदेश में राष्ट्रपति शासन लगा था। अटलजी मीराबाई मार्ग स्थित स्टेट गेस्ट हाउस में भोजन कर रहे थे। रात में उन्हें दिल्ली लौटना था।
इतने में लखनऊ के जिलाधिकारी और तत्कालीन राज्यपाल के सलाहकार अचानक कमरे में आ गए। मैंने कहा कि अटलजी भोजन कर रहे हैं और आप लोग यहां तक पहुंच गए। तत्कालीन जिलाधिकारी ने हाथ जोड़ते हुए कहा कि अमौसी हवाई अड्डे पर एक लड़का दिल्ली जाने वाले हवाई जहाज में चढ़ गया है। उसके हाथ में हथगोला जैसी कोई वस्तु है।
कह रहा है कि अटल बिहारी वाजपेयी को बुलाओ नहीं तो इस जहाज को उड़ा दूंगा। मैंने कहा, इस तरह अटलजी कैसे वहां जांएगे। इन्हें भी तो खतरा हो सकता है। पर, इसी बीच अटलजी खाना बीच में छोड़कर खड़े हो गए और बोले कि चलो चलते हैं। आखिर दो सौ लोगों के जीवन का सवाल है।
हम लोग थोड़ी देर में एयरपोर्ट पहुंचे। अटलजी ने टॉवर पर चढ़कर लड़के से बात की, पर वह लड़का मानने को नहीं तैयार कि अटलजी ही बोल रहे हैं।
हवाई जहाज के पास ले चलने को कहा
आखिरकार अटलजी ने हवाई जहाज के पास ले चलने को कहा। सबकी हालत खराब। जैसे-तैसे डीएम के साथ हम लोग जहाज के पास पहुंचे। उसने हमें और अटलजी को अंदर बुलाया। वह अटलजी के पैर छूने झुका कि सुरक्षा बलों ने उसे दबोच लिया।
लड़के ने हाथ में ली वस्तु को फेंकते हुए कहा कि यह कुछ नहीं, सिर्फ सुतली का गोला है। अटलजी ने भाजपा के लोगों से कहा कि इसने नादानी में इस तरह की घटना को अंजाम दे दिया। इसकी जमानत जरूर करा देना जिससे इसका भविष्य न खराब हो।
हवाई जहाज में अंदर कांग्रेस के बड़े नेता और लंबे समय तक कोषाध्यक्ष रहे सीताराम केसरी भी बैठे हुए थे। अटलजी को देखकर बोले, ‘जब हमें मालूम हुआ कि आप लखनऊ में हैं तो मेरी जान में जान आ गई थी कि आप जरूर आ जाएंगे। हम लोग बच जाएंगे।’
अगर कोई मिले तो जरूर बताना...
वाजपेयी मजाकिया भी कम नहीं रहे। विधान परिषद में भाजपा के नेता हृदयनारायण दीक्षित बताते हैं कि आपातकाल के दौरान वे और अटलजी इलाहाबाद की नैनी जेल में बंद थे।
एक दिन इलाहाबाद विश्वविद्यालय के छात्रों के एक समूह में आए किसी छात्र ने उनसे पूछा, आपने शादी क्यों नहीं की। अटलजी ने ठहाका लगाते हुए कहा, ‘यार जब शादी की उम्र थी तब जिंदगी की मस्ती ने इस बारे में सोचने का मौका ही नहीं दिया।
अब जब सोचता हूं तो कोई मिलती नहीं।’ छात्र काफी देर तक हंसते रहे। थोड़ी देर बाद जब ये विद्यार्थी लौटने को उठे तो अटलजी ने फिर उस छात्र से चुटकी ली, ‘यार! देखना, अगर कोई मिले तो जरूर बताना।’ हम लोगों की हंसी भी न रुक पाई। वह छात्र तो सीधे वाजपेयी के पैरों पर।
‘शादी जरूरी है या अखबार’
1950 के आसपास से अटल बिहारी वाजपेयी के नजदीक रहे चंद्रप्रकाश अग्निहोत्री बताते हैं कि प्रसंग अटलजी के लखनऊ आने के कुछ ही दिन के बाद का है। अटलजी यहां स्वदेश अखबार के संपादक थे। कानपुर में उनकी बहन का विवाह समारोह था। नानाजी देशमुख ने कहा कि आज तुम्हारी बहन की शादी है।
अटलजी बोले, ‘शादी जरूरी है या अखबार।’ नानाजी चुपचाप कानपुर चले गए। वहां उन्होंने दीनदयाल उपाध्याय से बताया होगा। दीनदयालजी कानपुर से लखनऊ आए। वह अटल से कुछ नहीं बोले और कंपोजिंग में जुट गए। शाम हुई तो उपाध्यायजी ने अटलजी से कहा, ‘यह जो गाड़ी खड़ी है। इसमें तुम तुरंत कानपुर जाओ। बहन की शादी में शामिल होओ।’
अटलजी चुपचाप उठे और गाड़ी से कानपुर चले गए। अग्निहोत्री बताते हैं कि उन्होंने रिश्तों का भी बहुत ध्यान रखा। 1957 में चुनाव लड़ने के दौरान उन्होंने एक दिन हमसे पूछा कि फूलकुमारी बुआ कहां रहती हैं। मैंने बताया कि हमारे घर के पास। फूलकुमारी शुक्ल ग्वालियर में उनके गुरु रहे त्रिवेणी शंकर वाजपेयी की बहन थीं।
रात में बिना किसी को बताए पहुंच गए हमारे घर। मेरे पिताजी के साथ उनके घर पहुंचे। उनके पैर छुए और हालचाल पूछा। फूलकुमारी बुआ ने अटलजी की बातों का जवाब तो बाद में दिया। पहले वहां मौजूद बड़े-बूढ़ों के पैर छूने का आदेश दिया। इनमें हमारे पिताजी मथुरा प्रसाद अग्निहोत्री जो हाईकोर्ट में सेक्शन अफसर थे, भी शामिल थे।
बिल्कुल आज्ञाकारी बालक बन गए अटल
अटलजी बिल्कुल आज्ञाकारी बालक की तरह पैर छूने के लिए झुक गए। कुछ लोगों ने उनका हाथ बीच में रोका तो बोले, ‘बुआ का आदेश है।’
कार्यकर्ताओं से उनका लगाव सिर्फ इसी से जाना जा सकता है कि विधायक सतीश भाटिया की मृत्यु पर आए अटलजी शवयात्रा के साथ पैदल ही आलमबाग श्मशान घाट तक गए।
अधिकारियों के लाख कहने पर भी उन्होंने सुरक्षा और गाड़ी लेने से इन्कार कर दिया। बोले, ‘शवयात्रा में कोई गाड़ी से नहीं चलता।’ वे तब तक श्मशान घाट पर बैठे रहे जब तक अंत्येष्टि पूरी नहीं हो गई।