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2017 चुनाव में इन चार ‘क’ के इर्द-गिर्द घूमे सारे सियासी वार

Mon, 06 Mar 2017 01:03 PM IST
अखिलेश वाजपेयी/ अमर उजाला-लखनऊ
अखिलेश वाजपेयी/ अमर उजाला-लखनऊ Updated Mon, 06 Mar 2017 01:03 PM IST
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 speech analysis of political parties in 2017 election
नरेंद्र मोदी

कैराना, कसाब, करंट और अब काशी। चुनावी समर 2017 की अधिकतर चाल व प्रहार इन्हीं चार ‘क’ के इर्द-गिर्द घूमे। वार और पलटवार का जरिया भी बने। शुरुआत भले ही भाजपा ने की लेकिन दूसरे दलों ने भी इन शब्दों का सहारा लेने में न संकोच किया और न परहेेज। 

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पश्चिम से शुरू हुआ चुनावी समर ज्यों-ज्यों पूरब की ओर बढ़ा त्यों-त्यों शब्दों के नए दांव से विरोधी को चित करने का खेल परवान चढ़ता गया। शब्द जरूर बदले लेकिन मकसद नहीं बदला। 
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ध्रुवीकरण को धार देने का इरादा भी टस से मस नहीं हुआ। रण का रुख अब जब बाबा विश्वनाथ की धरती पर पहुंचा तो कैराना, कसाब और करंट जैसे शब्द विसर्जित होते दिख रहे हैं और बात विकास के साथ काम गिनाने व बताने पर आ टिकी है।
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ऐसा नहीं कि भाजपा ने ही ऐसा किया। विरोधी भी पीछे नहीं रहे। फर्क बस यह रहा है कि भगवा टोली ने इन शब्दों केे सहारे हिंदुओं के ध्रुवीकरण की कोशिश की तो सपा-कॉंग्रेस और बसपा इनके सहारे मुसलमानों को साथ जोड़ने की बेताब नजर आए। 
पश्चिम उत्तर प्रदेश के चुनावी रण में कैराना मुद्दा बना। 

पर, विकास के लिए नहीं बल्कि हिंदुओं के पलायन को लेकर। जिसे वोटों के ध्रुवीकरण का जरिया बनाने की भी कोशिश की गई। भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह हों या प्रदेश अध्यक्ष केशव प्रसाद मौर्य अथवा पार्टी के स्टार प्रचारक महंत आदित्यनाथ। सभी ने कैराना के पलायन की घटना के बहाने पूरे पश्चिम उत्तर प्रदेश को कश्मीर बनाने की साजिश के आरोप लगाए। 

मुसलमानों में डर पैदा करने की कोश‌िश

 speech analysis of political parties in 2017 election
पीएम नरेंद्र मोदी

इसके लिए सपा की मौजूदा, बसपा व कॉंग्रेस की पूर्ववर्ती सरकारों की तुष्टीकरण नीति को निशाना बनाया। सपा, बसपा और कॉंग्रेस के नेताओं ने भाजपा नेताओं की बातों को मुद्दा बनाकर मुसलमानों को डर दिखाया कि इनकी सरकार बनी तो मुसलमानों के लिए कितनी परेशानी बढ़ेगी।

चुनावी रण उत्तर प्रदेश की धरती के बीच मुकाम पर पहुंचा तो यहां न कैराना था और न पलायन। पर, बुंदेलखंड और मध्य उत्तर प्रदेश की इस धरती पर बिजली का संकट आम लोगों की समस्या थी। सो करंट की गोट और कब्रिस्तान बनाम श्मशान की चोट, वोटों के ध्रुवीकरण का जरिया बनी। 

मोर्चा भी किसी और ने नहीं बल्कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने खुद संभाला। उन्होंने यह कहते हुए कि रमजान पर बिजली मिलती है तो दिवाली पर भी मिलनी चाहिए। सरकार अगर कब्रिस्तान बनवाती है तो उसे श्मशान भी बनवाना चाहिए। भाजपा विरोधी कहां पीछे रहते। उन्हें भी मानों मुस्लिम वोटों की लामबंदी का अवसर मिल गया। 

अखिलेश यादव, राहुल गांधी और मायावती सभी ने प्रधानमंत्री की बात को मुद्दा बनाकर भाजपा व केंद्र सरकार को मुस्लिम विरोधी करार देना शुरू कर दिया। प्रधानमंत्री तो एक बार बोले लेकिन  भाजपा विरोधी दलों और भगवा टोली के दूसरे नेताओं ने इसे कई बार उठाया। भाजपा विरोधी दलों ने मुसलमानों को भाजपा का चरित्र समझाकर वोट की गणित दुरुस्त करने की कोशिश की।
 
भाजपा ने तर्क दिए कि वह सबके साथ और सबके विकास की बात करते हैं। बिजली और विकास के काम में भेदभाव क्यों होना चाहिए। व्याख्या कुछ रही हो लेकिन मकसद सबका वोटों की लामबंदी ही दिखा।

कसाब का बहाना

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भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह - फोटो : अमर उजाला
वैसे तो यह चुनाव भाजपा और उसके विरोधी दलों के बीच जुमलेबाजी के लिए भी याद किया जाएगा। शुरुआत भी प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने मेरठ की पहली चुनावी सभा में ‘स्कैम’ शब्द के सहारे सपा, कॉंग्रेस, अखिलेश और मायावती के भ्र्रष्टाचार पर गठजोड़ की व्याख्या से की। 

पर, धीरे-धीरे हर तरफ से अलग-अलग तरह केजुमले बोलकर एक-दूसरे पर प्रहार किए गए। मोदी ने बसपा को ‘बहनजी संपत्ति पार्टी  कहकर व्याख्या की तो मायावती ने भाजपा को ‘भारतीय जुमला पार्टी’ और नरेन्द्र मोदी का मतलब ‘एंटी दलित मैन’ बताकर हमला बोला। अखिलेश बोले, ‘मोदी मन की बात करते हैं लेकिन काम की नहीं।’ पर, सबसे मुख्य मुद्दा ‘कसाब’ रहा।  

इसके सहारे भी वोटों का ध्रुवीकरण करके सियासी गणित साधने की कोशिश की गई। अमित शाह ने वैसे तो कसाब का मतलब कॉंग्रेस, सपा व बसपा बताया और कहा कि इन्हें खत्म किए बगैर देश या प्रदेश ठीक नहीं हो सकता। 

पर, जब उन्होंने यह भी जोड़ा कि उनके शब्द का अर्थ कोई और न लगा लिया जाए तो यह बात छिपी नहीं रही कि वह सफाई भले दें लेकिन मकसद ‘कसाब’ के साथ इन सबको जोड़कर वोटों की गणित दुरुस्त करने की ही है। कांग्रेस ने कहा भी कि यह भाजपा की घिनौनी सांप्रदायिक सोच है। 

इस बार  मुख्यमंत्री अखिलेश यादव या बसपा सुप्रीमो मायावती से पहले जवाब देने उतर पड़ी, मुख्यमंत्री की पत्नी डिंपल यादव। कसाब का मतलब बताया, ‘‘क’ से कंप्यूटर, ‘स’ से स्मार्ट फोन और ‘ब’ से बहन।’

काशी में बस काम

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काशी विश्वनाथ मंदिर से दर्शन कर कालभैरव जाते पीएम मोदी - फोटो : अमर उजाला
काशी की भूमि पर रण पहुंचने के साथ न तो भगवा टोली की तरफ से इस तरह के शब्द सुनाई दे रहे हैं और विरोधी दलों की तरफ से भी इन शब्दों को याद नहीं किया जा रहा है। ऐसा शायद इसलिए कि न तो यहां भगवा टोली को इन शब्दों का सहारा लेने की जरूरत है और न विरोधियों को। 

भगवा टोली के पास पूर्वांचल की इस धरती पर गैर भाजपाई दलों की सरकारों के द्वारा इस इलाके की लगातार उपेक्षा गिनाने के तर्क मौजूद हैं तो यह बताने के तथ्य भी कि केंद्र में मोदी के नेतृत्व में सरकार बनने के बाद से यहां रहने वालों की दशा और इस क्षेत्र के विकास की दिशा संभालने के लिए कई काम शुरू किए गए हैं। 

गैर भाजपा दलों सपा-कॉंग्रेस गठबंधन और बसपा के पास प्रधानमंत्री के संसदीय क्षेत्र के आसपास का इलाका होने के कारण उनके कामों पर निशाना साधकर वोटों को लामबंद करने का विकल्प मौजूद है। रही वोटों के ध्रुवीकरण की बात तो कशी और वहां भी मोदी की मौजूदगी दोनों पक्षों को स्वत: ऐसी स्थितियां बना रही है। फिर शब्दों का सहारा लेने की जरूरत ही क्या है।
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