आज फिर अयोध्या की परीक्षा, तपिश समझने की कोशिश या मकसद कुछ और
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गोया 490 साल हो गए इस संघर्ष को। उपलब्ध तारीखें बताती हैं कि अयोध्या के श्रीराम जन्मभूमि मंदिर और बाबरी मस्जिद का विवाद 1528 में शुरू हुआ था। कई युद्ध हुए। लड़ाइयां हुईं। बीती शताब्दी में भी 1934 में मंदिर बनाने के लिए एक संघर्ष हुआ। मंदिर बनाने और मस्जिद बचाने का संघर्ष 2018 तक पहुंच गया। इस दौरान अयोध्या को कई परीक्षाओं से गुजरना पड़ा। जगह-जगह बैरीकेडिंग हो गई। जिस नगरी को कभी जीती न जाने वाली नगरी मानकर अयोध्या नाम दिया गया था, उसे जीतने के संघर्ष ने आए दिन अयोध्या की परीक्षा लेना इसकी नियति बना दिया। जगह-जगह संगीनों का साया हो गया। अपने ही शहर में आने-जाने पर पूछताछ शुरू हो गई। हर वक्त अनहोनी की आशंका ने इन 490 वर्षों के अयोध्या के संघर्ष की एकमात्र गवाह ‘सरयू’ को भी अपनी नियति पर सोच-विचार को विवश कर दिया। अयोध्या का सहारा लेने वाले को परीक्षाओं का परिणाम मिलता गया। अच्छे से अच्छे परिणाम पाते गए। सत्ता की सीढ़ियां भी चढ़ते गए। ताकत हासिल करते गए। पर, अयोध्या की परीक्षा का परिणाम पाने की प्रतीक्षा समाप्त नहीं हुई। धर्मसभा के नाम पर अयोध्या की रविवार को फिर परीक्षा होने जा रही है। पर, इस नगरी की एकमात्र साथी ‘सरयू’ की लहरें आज भी हर आने-जाने वाले यह सवाल जरूर पूछ रही होंगी कि धर्मसभा के जरिये अयोध्या की इस बार होने जा रही परीक्षा का परिणाम आ जाएगा या उसकी नियति में प्रतीक्षा ही रहेगी।
परीक्षाओं की परेशानी
दस्तावेज बताते हैं कि 1528 से लेकर 1934 तक कई संघर्ष हुए। पर, 1984 से शुरू हुए मंदिर बनाने और बाबरी मस्जिद बचाने के संघर्ष की बात करें तो अयोध्या को कई परीक्षाओं से गुजरना पड़ा। बाहर से आने वालों ने यहां का भाईचारा बिगाड़ने की कोशिश की। भाईचारा तो उतना नहीं बिगड़ा लेकिन एक-दूसरे के बीच पहले जैसा भरोसा तो नहीं ही रहा। संघर्ष 1990 में लोगों की बड़े पैमाने पर गिरफ्तारी, कारसेवा व कारसेवकों की गोलियों से मौत तक पहुंची। अयोध्या की स्थिति कैदखाना जैसी हो गई। कई रास्ते हमेशा के लिए बंद हो गए। इसके बाद 1992 में ढांचा ध्वंस, अदालती लड़ाई, उच्च न्यायालय की लखनऊ खंडपीठ में सुनवाई व 30 सिंतबर 2010 को फैसले तक पहुंचा। हर बार अयोध्या और यहां के लोगों को धैर्य की परीक्षा देनी पड़ी। पर, परिणाम आने की प्रतीक्षा खत्म नहीं हुई।
नियति में प्रतीक्षा ही
उच्च न्यायालय की लखनऊ खंडपीठ का फैसला आया तो लगा कि शायद अब विवाद खत्म हो जाए और अयोध्या की प्रतीक्षा भी । पर, परिणाम नहीं निकला। मस्जिद बचाने व मंदिर बनाने का विवाद सर्वोच्च न्यायालय के पास पहुंच गया। लोग बदल गए, लोगों की किस्मत बदल गई। लेकिन अयोध्या व यहां वालों की किस्मत नहीं बदली। मस्जिद के पक्षकार हाशिम अंसारी और अब पक्षकार उनके लड़के इकबाल अंसारी तथा हाजी महबूब या उनसे पहले उनके पिता की किस्मत व हाल जस का तस रहा। इसके नाम पर बाहर राजनीति करने वालों की हालत जरूरत बदल गई। मंदिर के मूल पक्षकारों की भी न किस्मत बदली और न उनकी आर्थिक स्थिति। पर, मंदिर के नाम पर भी सियासत करने वाले बाहर के लोगों की किस्मत जरूर बदल गई।
अयोध्या के तकदीर में वही घाट, वही राम की पैड़ी, तंग गलियां, बिजली की किल्लत, उबड़-खाबड़़ रास्ते लिखे रहे। ऊपर से 1992 से पहले वैभव से युक्त मंदिरों में वीरानगी जरूर छा गई। भाजपा की हैसियत बदली, अयोध्या आने से रोकने वाले मुलायम सिंह की भी वोटों की गणित मजबूत हुई, इस मुद्दे पर पक्ष व विपक्ष में सियासत करने वाले कुछ औरों के भी भाग्य बदले। मंदिर बनवाने के लिए अयोध्या आने और जेल जाने वालों तथा इन्हें रोकने व जेल भेजने वालों में कई लखनऊ व दिल्ली की सरकार में महत्वपूर्ण पदों पर आते-जाते रहे। पर, विवाद के समाधान के परिणाम की प्रतीक्षा समाप्त नहीं हुई। धर्मसभा को लेकर अयोध्या में चौकसी को एक बार फिर जगह-जगह संगीनों वाले जवान तैनात हैं। लोग आशंकाओं से घिरे हैं। धर्मसभा के बहाने रविवार को अयोध्या की एक और परीक्षा होने जा रही है। बेचैन सरयू की लहरें हर आने जाने वालों से पूछ रही हैं कि आखिर अयोध्या की परीक्षाओं के यह दौर कब खत्म होगा।