बचपन में खुश करने वाला खिलौना, नींद लगे तो पेट पर सुलाने वाला बिछौना है पापा। संघर्ष की आंधियों में हौसले की दीवार है पापा। बाहर से सख्त, पर अंदर से नर्म। जिम्मेदारियों से लदी परिवार की गाड़ी के सारथी है पापा। बच्चों के सपनों को पूरा करने में जी जान लगा देने वाला सुपर हीरो... भी है पापा। फादर्स डे पर आज हम बात करेंगे पिता और बच्चों के उसी खूबसूरत रिश्ते की। चूंकि कोरोना काल से अभी हम उबरे नहीं हैं और इस कठिन वक्त ने रिश्तों के कई रूप दिखाए हैं। कुछ घटनाएं और कहानियां निराश करने वाली हैं तो कुछ दिल को नया हौसला देने वाली भी हैं। आइए कुछ ऐसी कहानियां आप भी पढ़िए।
Special story on Fathers's Day: संघर्ष की आंधियों में हौसले की दीवार हैं पापा...
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डॉक्टरों ने ना कह दिया, मैं कैसे हार जाती हिम्मत... पापा को ठीक होना ही था
- पूर्वी आनंद, फोटोग्राफर
कोरोना की दूसरी लहर का दौर बहुत मुश्किल वक्त था। हम सब संक्रमित थे। मैं पहले ठीक हो गई, मां-बहन आइसोलेट थीं। पापा आनंद कृष्णा की तबीयत बिगड़ गई। पापा का ऑक्सीजन लेबल 80 से भी नीचे चला गया और उन्हें सांस लेने में दिक्कत होने लगी। मैं उन्हें निजी अस्पताल ले गई। वहां जाने के दो-तीन दिन बाद पापा की तबीयत और ज्यादा बिगड़ने लगी। डॉक्टर ने बुलाया और कहा कि पापा को ले जाओ...। उस वक्त पापा की दी सीख कि तर्कों को आधार पर फैसले करो याद आई। मैंने डॉक्टरों से बात की और कहा कि आप बस पापा को यहां रहने दीजिए, उनसे सिर्फ दिन में तीन-चार बार कहिए कि वे ठीक हो रहे हैं, बाकी मैं देख लूंगी। मैं 11 दिन तक पापा के साथ आईसीयू में थी। पापा को बाईपैप लगा था, फिर भी मैं पापा के साथ लूडो खेलती, सेल्फी लेती और उन्हें ठीक होने का विश्वास दिलाती रही। मेरी बीमारी कहां चली गई, कहां से हिम्मत आई नहीं मालूम। बस इतना जानती थी कि पापा-मम्मी की 25वीं शादी की सालगिरह पर पापा को घर ले जाऊंगी। एक दिन पहले हम घर आ गए और साथ मिलकर केक काटा। पापा रिकवर कर रहे हैं।
..क्योंकि आप से ही सीखा है
फादर्स डे पर पापा को इतना ही कहूंगी कि ये मुश्किल वक्त में धैर्य और फैसले लेने में देरी न करने की आपकी सीख ने मुझे सही राह दिखाई। आप हैं तो हम हैं।
पापा ने भर्ती होने से इन्कार किया, बेटी ने घर को अस्पताल बना दिया
- डॉ. सृष्टि श्रीवास्तव, डेंटिस्ट
पापा डॉ. सतीश कुमार श्रीवास्तव सोनभद्र में रहते हैं। मां-पापा दोनों की तबीयत बिगड़ी। मम्मी को हल्का असर था, पर पापा की तबीयत ज्यादा खराब थी। उन दोनों को लखनऊ बुला लिया। पापा का सिटी स्कोर 16 था, यानी 70 फीसदी के आसपास फेफड़े प्रभावित हो चुके थे। केजीएमयू लेकर जाने की व्यवस्था की। ले भी गए, कैंपस में पहुंचे, वहां भीड़ और चारों तरफ से मिल रही नकारात्मक खबरें सुनकर पापा ने कहा, मुझे यहां से ले चलो। फैसला मुश्किल था, डर भी था, क्योंकि अपनों को खोने का गम हर तरफ से सुनाई दिखाई दे रहा था। मन कड़ा किया, पापा को घर लाई और अपने डॉक्टर मित्रों व कुछ वरिष्ठ डॉक्टरों से टेली काउंसिलिंग के जरिए पापा का ट्रीटमेंट घर पर शुरू किया। ऑक्सीजन, इंजेक्शन, कन्संट्रेटर, दवा सब घर पर। ड्रिप लगाने से लेकर इंजेक्शन लाने तक का काम खुद किया। कुछ दोस्त लगातार फोन पर उपलब्ध थे, वे बताते रहे, मैं इलाज कराती रही। डर लग रहा था, पर पापा की रिपोर्ट निगेटिव आने के बाद भी पोस्ट कोविड ट्रीटमेंट भी घर पर किया और अंतत: पापा ठीक हुए और घर चले गए।
हालात कैसे भी हों, घबराओ मत
पापा ने ही सिखाया है कि हालात कैसे भी हों, मुश्किल आने पर कभी घबराओ मत। बस आपकी तबीयत खराब होने के वक्त इसी सीख ने हौसला दिया।
बेड नहीं मिला, ऑक्सीजन भी नहीं, पर सांसों की डोर टूटने नहीं दी
- मुद्रा सिंह, असिस्टेंट प्रोफेसर इन लॉ
मैं कॉलेज कैंपस में ही रह रही थी। एक दिन घर से अचानक फोन आया की पापा बाथरूम में गिर कर बेहोश हो गए हैं। नवरात्र की अष्टमी थी, मैं घर पहुंची। वहीं रुकी, अचानक मुझे भी बुखार-जुकाम ने घेर लिया। एंटीजन टेस्ट में पापा पॉजिटिव और हम सब निगेटिव आए। आरटीपीसीओ जांच कराई तो मैं भी पॉजिटिव थी। पापा को लेकर एक कमरे में शिफ्ट हुई, क्योंकि पापा को बिल्कुल होश नहीं था। अस्पताल में कहीं बेड नहीं मिला, ऑक्सीजन भी नहीं मिल पाई, पापा को छोड़ कैसे लाइन लगाती। एक दोस्त के परिचित डॉक्टर ने फोन पर गाइड किया और पापा का अपना ट्रीटमेंट चालू किया। इंजेक्शन देना था, पर नसों में देना चुनौती थी, फिर ओरल मेडीसिन पर लौटी। पापा के फेफड़े पर 60 फीसदी तक असर आ चुका था। इस बीच नेबुलाइज करना, इंसुलिन देने का तरीका वीडियोकाल से सीखा। अपना इलाज करती रही। ऑक्सीजन लेवल नीचे जाने लगा तो पापा को क्रोनिक एक्सरसाइज के जरिए संभालती रही। बस पापा को कहती रही कि आपको हिम्मत नहीं हारना है। कोशिश रंग लाई और पापा धीरे-धीरे खतरे से बाहर आने लगे।
जिद्दी तो आपने बनाया है
फादर्स डे पर आपसे कहना चाहूंगी कि ये जिद्दी स्वभाव आपके कारण है, आपने ही कहा कि जो सही है उसके लिए जिद मत छोड़ो। आपकी सांसें लौटाने की जिद इसीलिए की थी।
पापा बोले- मैं हूं न, तुम दोनों को कुछ न होने दूंगा...
- आयुष मिश्रा, मोहनलालगंज
मेरी हरदोई के संडीला बैंक में तैनाती है। एक दिन अचानक तबीयत खराब हुई, जांच में पॉजिटिव आया। पापा हरिगोविन्द मिश्र मुझे वहां से ले आए, उस वक्त मैं उनके लिए बस एक बैंककर्मी नहीं बल्कि छोटा सा बेटा था। मैं घर आया, मेरी बहन सौम्या भी संक्रमित हो गई। हमें चिंता थी कि पापा को कुछ न हो जाए और पापा तो मानो तय करके बैठे थे कि हमारे पास से हटेंगे नहीं। 20 दिन तक न उन्हें खाने का होश था न सोने का होश था। भोर हो या आधी रात, हमारी दवाई, हमारे खाने और हमारी सेहत की उन्होंने यूं चिंता की जैसे हम चार-पांच साल के बच्चे हों। हमें लगा कि हम फिर से बचपन में हैं, जहां बच्चे पिता की अंगुली पकड़कर चलना सीखते हैं। लगातार डॉक्टरों से संपर्क करते रहे, दवाएं करते रहे, होम आइसोलेशन में रखकर उन्होंने हमें अच्छा कर दिया। बस रात-दिन वे एक ही बात कहते हैं कि मैं हूं ना, तुम लोगों को कुछ नहीं होने दूंगा। अब लग रहा है कि सच... पापा हैं तो हमें कुछ हो ही नहीं सकता है।