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कर्ज, फसल बर्बादी, वसूली का नोटिस... खुदकुशी

Tue, 09 Feb 2016 12:48 PM IST
Updated Tue, 09 Feb 2016 12:48 PM IST
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special coverage on farmer suicide in bundelkhand

केस-1

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जनवरी 2015 में ललितपुर शहर से सटे रजवारा गांव में किसान करोडे़ कुशवाहा ने फांसी लगा ली। उसने बैंक से 50 हजार रुपये का कर्ज ले रखा था। फसल बर्बादी के कारण चुका नहीं पाया।

बैंक से नोटिस, फिर वसूली एजेंटों ने इतना धमकाया कि उसे मौत को गले लगाना आसान लगा। 26 जनवरी 2016 को अमर उजाला टीम जब करोड़े के घर पहुंची तो उसके बेटे पुरुषोत्तम ने बताया कि कोई अफसर-कर्मचारी आज तक घर नहीं आया। न ही मदद मिली। बैंक वाले अब भी वसूली का दबाव बनाए हुए हैं- कहते है, ‘मरने से कर्ज माफ थोड़े ही हो जाता है।
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केस-2
कल्यानपुरा गांव का हरीराम सहरिया (22)। फसल बर्बाद हुई तो ईंट भट्ठे में मजदूरी करने लगा, लेकिन ठेकेदार मजदूरी का पैसा खा गया। साहूकार से 20 हजार रुपये कर्ज ले रखा था जो ब्याज जोड़कर साल भर में ही 40 हजार से ऊपर हो गया था।
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अधिकारियों के यहां कई बार गुहार लगाई, पर सुनवाई नहीं हुई। आखिर 19 दिसंबर 2015 को उसने फांसी लगाकर जान दे दी। पिता हरदास ने बताया कि उन्हें प्रशासन से कोई मदद नहीं मिली है।

एक साल में 22 किसानों ने मौत को लगाया गले

special coverage on farmer suicide in bundelkhand

ये दो केस बानगी हैं ललितपुर जिले के सरकारी अमले की संवेदनहीनता के। लगातार तीन साल से सूखे व अकाल की त्रासदी झेल रहा ललितपुर जिला किसानों की खुदकुशी में महाराष्ट्र के विदर्भ की शक्ल लेता जा रहा है। नवंबर 2015 से 25 जनवरी 2016 तक तीन माह में ही जिले के 22 किसान मौत को गले लगा चुके हैं।

ललितपुर में किसानों की सबसे बड़ी त्रासदी बैंक व साहूकारों का कर्ज साबित हो रहा है। वे इस कर्ज की भरपाई नहीं कर पाते और स्वाभिमानी होने के कारण किसी की बात उन्हें बर्दाश्त नहीं होती।

ये वजहें ही उनके लिए मौत का द्वार खोलती हैं। सरकार किसान हितैषी होने का दावा तो करती है, लेकिन उसके नुकसान की भरपाई नहीं करती। पिछले रबी सीजन में जिले में 355 करोड़ रुपये की फसल बर्बाद हो जाने का आकलन किया गया था, पर अब भी बहुत सारे किसान मुआवजे की राह देख रहे हैं।

मौत के नए बहाने गढ़ता प्रशासन

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सैदपुर गांव के किसान मुन्ना की मौत के मामले में तत्कालीन एसडीएम ने डीएम को जो रिपोर्ट सौंपी, उसमें लिखा ‘मुन्ना ने अपनी जमीन ठेके पर दे रखी थी और उसका पैसा भी प्राप्त कर लिया था। मुन्ना की मौत सीने में दर्द होने से हुई है।’

पटौराकलां गांव के किसान राजेन्द्र अहिरवार की मौत को प्रशासन ने पति-पत्नी का झगड़ा करार दिया। ग्राम रजवारा के करोड़े कुशवाहा की खुदकुशी की वजह शराब की लत बताई गई।

यही नहीं, उसमें गृहकलह का आधार भी जोड़ दिया गया। समाजसेवी अजय श्रीवास्तव कहते हैं कि खुदकुशी करने वाले किसानों के परिवार को मदद मिलने की राह में पुलिस प्रशासन की यही संवेदनहीनता आड़े आती है।

कर्ज से हार रहे छोटे किसान

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जिले में जिन किसानों ने आत्महत्या की, उनमें से ज्यादातर तंगहाल और छोटी जोत के किसान थे। रजवारा के करोड़े कुशवाहा के पास तीन एकड़ तो कुम्हैड़ी के रामकिशोर झा के पास डेढ़ एकड़ ही जमीन थी।

ग्राम पठा विजयपुरा के बूठे प्रजापति के पास चार एकड़ जमीन थी और बैंक का कर्ज 50 हजार रुपये था। सैदपुर में आत्महत्या करने वाला मुन्ना भी डेढ़ एकड़ जमीन पर 50 हजार रुपए कर्ज लिए था।

यह तस्वीर कड़ेसरा खुर्द गांव की है। झरुआ अपने घर के बाहर रोज ऐसे ही बैठता है। उसकी निगाहें राह तकती रहती हैं...। दरअसल, सूखा पड़ने से उसके बच्चे गांव छोड़कर काम की तलाश में बाहर चले गए हैं और झरुआ अकेले रह गया है।

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