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कैंटीन की कमाई डेढ़ लाख किराया 83 रुपये महीना

Sat, 14 Jan 2017 03:30 PM IST
ब्यूरो/अमरउजाला, लखनऊ
ब्यूरो/अमरउजाला, लखनऊ Updated Sat, 14 Jan 2017 03:30 PM IST
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sixty years old canteen closed in charbagh station
रेलवे कैंटीन - फोटो : amar ujala

चारबाग रेलवे स्टेशन पर 60 साल पुरानी जिस कैंटीन को हाल ही में बंद कराया गया है, उसकी एक महीने की कमाई एक से डेढ़ लाख रुपये थी। यानी सालाना 18 लाख रुपये। लेकिन, रेलवे को इससे किराए के रूप में सिर्फ 83 रुपये प्रतिमाह ही मिलते थे।

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इसके लिए न तो कोई लाइसेंस दिया गया और न ही अलॉटमेंट लेटर। अब मामले की शिकायत जीएम के पास पहुंचने से रेलवे अधिकारियों के हाथ-पैर फूले हुए हैं। चारबाग रेलवे स्टेशन पर उत्तर रेलवे व पूर्वोत्तर रेलवे के पार्सल घरों के बीच बने कैब-वे को चौड़ा किया जाना है।
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इसके लिए पास में बनी कैंटीन को सुरक्षा बलों की निगरानी में उत्तर रेलवे अधिकारियों ने खाली करवाया है। बता दें कि ईआई रेलवे कन्ज्यूमर कोऑपरेटिव सोसाइटी के तहत वर्ष 1951 से यह कैंटीन चल रही थी।
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यहां से कुलियों को सस्ता भोजन दिया जाता था। अधिकारियों ने बताया कि कैंटीन से प्रतिमाह एक से डेढ़ लाख रुपये की इनकम कैंटीन मालिक को होती थी। रेलवे को किराए के रूप में सिर्फ एक हजार रुपये सालाना मिल रहा था।

अफसरों ने कैंटीन का लाइसेंस व अलॉटमेंट लेटर जांचने की जहमत नहीं उठाई। कुलियों के नेता रामसुरेश ने बताया कि कैंटीन में सस्ता, किफायती व बढ़िया खाना मिलता था। यहां से 15 रुपये में खाना, दो रुपये में चाय, पांच रुपये में बंद-मक्खन मिलता था। कैंटीन हटाए जाने से कुलियों के लिए दिक्कत हो गई है।

कैंटीन के ठेके से जुड़ी फाइल गुम

sixty years old canteen closed in charbagh station
रेलवे कैंटीन - फोटो : amar ujala

उत्तर रेलवे लखनऊ मंडल कार्यालय में लापरवाही का यह आलम है कि कैंटीन से सम्बंधित कोई कागज अधिकारियों के पास नहीं है। सूत्रों की मानें तो कैंटीन के ठेके से जुड़ी फाइल गायब है। जिससे यह पता लगाना मुश्किल हो गया है कि किसके निर्देश पर ठेका दिया गया और इतने वर्ष अ‌ध‌िकार‌ियों ने चुप्पी क्यों साध रखी थी।

‘उत्तर रेलवे अधिकारियों ने अलॉटमेंट लेटर मांगा, वह इसलिए नहीं था कि कैंटीन 60 साल पुरानी है। अधिकारी कैंटीन को अवैध बता रहे हैं, अगर ऐसा है तो हर साल हजार रुपये किराया क्यों जमा कराया जा रहा था? कैंटीन से इतनी कमाई नहीं होती थी, बल्कि रेलवे अफसर, जीआरपी व आरपीएफ वाले तो मुफ्त में ही खाते थे। कैंटीन की लड़ाई जारी रहेगी।’ -संजय कात्याल, कैंटीन मालिक
 

‘कैंटीन से सम्बंधित अलॉटमेंट लेटर संचालक के पास नहीं था। न ही लाइसेंस से जुड़ी जानकारी उसके पास है। दूसरे, कैब-वे यात्रियों के हित में चौड़ा किया जा रहा है, इसलिए कैंटीन व कुली विश्रामालय को हटाना जरूरी है।’ -शिवेंद्र शुक्ल, सीनियर डीसीएम, उत्तर रेलवे

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