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लखनऊ यूनिवर्सिटीः सरकारी नौकरी और कॉर्पोरेट सेक्टर में काम करने वाले भी कर सकेंगे पीएचडी
Tue, 29 Sep 2020 11:36 AM IST
पंकज श्रीवास्तव
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, लखनऊ
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, लखनऊ
Published by: पंकज श्रीवास्तव
Updated Tue, 29 Sep 2020 11:36 AM IST
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प्रतीकात्मक तस्वीर
- फोटो : अमर उजाला
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सरकारी नौकरी और कॉर्पोरेट सेक्टर में काम करने वाले व्यक्ति भी अब लखनऊ विश्वविद्यालय से पीएचडी कर सकेंगे। लविवि ने सोमवार को कार्यपरिषद की बैठक में पार्ट टाइम पीएचडी का ऑर्डिनेंस पास कर दिया है। ऑर्डिनेंस के हिसाब से सरकारी सेवा और कॉर्पोरेट सेक्टर में नौकरी करने वाले व्यक्ति पार्ट टाइम पीएचडी के लिए आवेदन कर सकते हैं।
हालांकि इसके लिए उन्हें निर्धारित शैक्षिक अर्हता यानी परास्नातक स्तर पर 55 फीसदी नंबर भी लाना जरूरी होगा। इसके साथ ही उन्हें हर महीने कम से कम छह दिन विभाग में उपस्थित भी रहना होगा। कार्यपरिषद की बैठक में पार्ट टाइम पीएचडी के साथ पीएचडी और डी. लिट् का ऑर्डिनेंस, परास्नातक स्तर पर सीबीसीएस सिलेबस को भी मंजूरी दी गई।
बैठक में शिक्षकों के कई विवादित मुद्दे भी रखे गए। शैक्षणिक मामलों को जहां चर्चा के बाद पास कर दिया गया, वहीं विवादित मुद्दे पर स्पष्ट आदेश नहीं दिया गया। उन्हें या तो लीगल सेल या फिर अगली कार्यपरिषद की बैठक के लिए टाल दिया गया। इसके साथ ही बैठक में कई कॉलेजों में बीएड की मान्यता विस्तार तथा गणित विभाग के प्रो. प्रवीण नागर की स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति का मामला भी रखा गया।
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इस पर कार्यपरिषद ने अपनी मुहर लगा दी। कार्य परिषद ने सरस्वती सम्मान की वजह से दो साल से सेवा विस्तार का लाभ लेने वाले पूर्व प्रति-कुलपति प्रो. यूएन द्विवेदी को सत्र लाभ देने का फैसला किया है। हालांकि यह फैसला राज्य सरकार के निर्देश के अधीन रहेगा।
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हालांकि इसके लिए उन्हें निर्धारित शैक्षिक अर्हता यानी परास्नातक स्तर पर 55 फीसदी नंबर भी लाना जरूरी होगा। इसके साथ ही उन्हें हर महीने कम से कम छह दिन विभाग में उपस्थित भी रहना होगा। कार्यपरिषद की बैठक में पार्ट टाइम पीएचडी के साथ पीएचडी और डी. लिट् का ऑर्डिनेंस, परास्नातक स्तर पर सीबीसीएस सिलेबस को भी मंजूरी दी गई।
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बैठक में शिक्षकों के कई विवादित मुद्दे भी रखे गए। शैक्षणिक मामलों को जहां चर्चा के बाद पास कर दिया गया, वहीं विवादित मुद्दे पर स्पष्ट आदेश नहीं दिया गया। उन्हें या तो लीगल सेल या फिर अगली कार्यपरिषद की बैठक के लिए टाल दिया गया। इसके साथ ही बैठक में कई कॉलेजों में बीएड की मान्यता विस्तार तथा गणित विभाग के प्रो. प्रवीण नागर की स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति का मामला भी रखा गया।
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इस पर कार्यपरिषद ने अपनी मुहर लगा दी। कार्य परिषद ने सरस्वती सम्मान की वजह से दो साल से सेवा विस्तार का लाभ लेने वाले पूर्व प्रति-कुलपति प्रो. यूएन द्विवेदी को सत्र लाभ देने का फैसला किया है। हालांकि यह फैसला राज्य सरकार के निर्देश के अधीन रहेगा।
इन प्रस्तावों को भी दी मंजूरी
- समाज कार्य विभाग में संचालित पंडित दीनदयाल उपाध्याय शोध पीठ और भाऊराव देवरस शोधपीठ का ऑर्डिनेंस भी पास किया गया।
- भोनवाल कॉलेज की मान्यता समाप्त करने, कला एवं शिल्प महाविद्यालय के 21 साल की उम्र पूरा करने के बावजूद दाखिला लेने वाले छात्रों को मानवीय आधार पर राहत दे दी गई है। इनको डिग्री मिलने का रास्ता साफ हो गया है।
- दिव्यांग कर्मचारियों को दिव्यांग वाहन भत्ता देने का प्रस्ताव भी पास कर दिया गया है। n नियत वेतन पर काम करने वाले कर्मचारियों को 11-11 महीने के सेवा विस्तार दिए जाने के प्रस्ताव को भी कार्य परिषद ने मंजूर कर लिया है। - डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर और केंद्रीय प्लेसमेंट सेल के प्रस्ताव भी कार्य परिषद की बैठक में पास कर दिए गए।
प्रो. सुकांत का मामला अब लीगल सेल के पास
समाजशास्त्र विभाग के प्रो. सुकांत चौधरी का मामला लीगल सेल के हवाले कर दिया है। उनका चयन अर्हता पूरी किए बिना किया गया था। लविवि में नियुक्ति के लिए परास्नातक स्तर पर 55 फीसदी अंक अनिवार्य है, जबकि प्रो. चौधरी के पीजी में 55 फीसदी नंबर नहीं थे।
इसको लेकर बनी समिति की रिपोर्ट पर विचार के बाद लविवि ने यह मामला लीगल सेल को सौंप दिया है। इसी तरह आवेदन की तिथि पर अर्हता पूरी न करने वाली डॉ. कविता चतुर्वेदी के मामले को कार्यपरिषद ने अगली बैठक के लिए टाल दिया है।
- भोनवाल कॉलेज की मान्यता समाप्त करने, कला एवं शिल्प महाविद्यालय के 21 साल की उम्र पूरा करने के बावजूद दाखिला लेने वाले छात्रों को मानवीय आधार पर राहत दे दी गई है। इनको डिग्री मिलने का रास्ता साफ हो गया है।
- दिव्यांग कर्मचारियों को दिव्यांग वाहन भत्ता देने का प्रस्ताव भी पास कर दिया गया है। n नियत वेतन पर काम करने वाले कर्मचारियों को 11-11 महीने के सेवा विस्तार दिए जाने के प्रस्ताव को भी कार्य परिषद ने मंजूर कर लिया है। - डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर और केंद्रीय प्लेसमेंट सेल के प्रस्ताव भी कार्य परिषद की बैठक में पास कर दिए गए।
प्रो. सुकांत का मामला अब लीगल सेल के पास
समाजशास्त्र विभाग के प्रो. सुकांत चौधरी का मामला लीगल सेल के हवाले कर दिया है। उनका चयन अर्हता पूरी किए बिना किया गया था। लविवि में नियुक्ति के लिए परास्नातक स्तर पर 55 फीसदी अंक अनिवार्य है, जबकि प्रो. चौधरी के पीजी में 55 फीसदी नंबर नहीं थे।
इसको लेकर बनी समिति की रिपोर्ट पर विचार के बाद लविवि ने यह मामला लीगल सेल को सौंप दिया है। इसी तरह आवेदन की तिथि पर अर्हता पूरी न करने वाली डॉ. कविता चतुर्वेदी के मामले को कार्यपरिषद ने अगली बैठक के लिए टाल दिया है।
पूर्व कुलपति के खिलाफ जांच मामले में बैकफुट पर कार्यपरिषद
लविवि के पूर्व कुलपति प्रो. एसपी सिंह के खिलाफ विभिन्न मामलों में जांच समिति बनाने के मामले में कार्यपरिषद को बैकफुट पर जाना पड़ा है। कार्यपरिषद ने पूर्व कुलपति के खिलाफ जांच करने के लिए जांच समिति का गठन कर दिया था। इसके बाद पूर्व कुलपति ने राजभवन में अपना पक्ष रखा था।
उनके अनुसार कार्यपरिषद को कुलपति के खिलाफ जांच समिति बनाने का अधिकार नहीं है। यह अधिकार राजभवन के पास है। इस पर राजभवन की ओर से कार्य परिषद को पत्र जारी करते हुए पूछा गया था कि किस नियम के तहत यह जांच समिति बनाई गई है। लविवि द्वारा इस संबंध में कोई स्पष्ट नियम न होने की बात कहते हुए निस्तारित कर दिया गया है।
कॉलेजों को नहीं मिली जुर्माने से छूट
बैठक में मुमताज डिग्री कॉलेज, सरदार भगत सिंह डिग्री कॉलेज और नगर निगम डिग्री कॉलेज का मामला भी रखा गया। इन पर निर्धारित समय में पाठ्यक्रम की स्थाई मान्यता न लेने की वजह से जुर्माना लगाया गया है। इस जुर्माने पर कॉलेजों ने कार्यपरिषद के सामने अपील की थी, लेकिन कार्यपरिषद ने सही ठहराते हुए इसे जमा करने का निर्देश दिया है।
उनके अनुसार कार्यपरिषद को कुलपति के खिलाफ जांच समिति बनाने का अधिकार नहीं है। यह अधिकार राजभवन के पास है। इस पर राजभवन की ओर से कार्य परिषद को पत्र जारी करते हुए पूछा गया था कि किस नियम के तहत यह जांच समिति बनाई गई है। लविवि द्वारा इस संबंध में कोई स्पष्ट नियम न होने की बात कहते हुए निस्तारित कर दिया गया है।
कॉलेजों को नहीं मिली जुर्माने से छूट
बैठक में मुमताज डिग्री कॉलेज, सरदार भगत सिंह डिग्री कॉलेज और नगर निगम डिग्री कॉलेज का मामला भी रखा गया। इन पर निर्धारित समय में पाठ्यक्रम की स्थाई मान्यता न लेने की वजह से जुर्माना लगाया गया है। इस जुर्माने पर कॉलेजों ने कार्यपरिषद के सामने अपील की थी, लेकिन कार्यपरिषद ने सही ठहराते हुए इसे जमा करने का निर्देश दिया है।