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बुद्धम शरणम गच्छामि....
लखनऊ/इंटरनेट डेस्क
Updated Sat, 27 Jul 2013 04:47 PM IST
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श्रावस्ती
लखनऊ से दूरी- करीब 154 किलोमीटर
शहर से करीब डेढ़ सौ किलोमीटर दूर आज भी एक जगह ऐसी है, जिसकी आबोहवा में बुद्ध बसे हुए हैं। बौद्ध और जैन धर्म को मानने वाले लोग दुनिया भर से इस जगह छुट्टियां मनाने आते हैं...तो आप क्यों पीछे रहें। इस हफ्ते चलते हैं बुद्ध की शरण में...
किसी जमाने में यह स्थान उत्तरी कोसल राज्य की राजधानी रहा तो कभी यह माणिकपुरी बन गया। लेकिन, इस जगह को बुद्ध के पारलौकिक स्वरूप और जैन तीर्थ स्थल के रूप में जाना जाता है।
कहा जाता है कि श्रावस्ती में स्थित जेठवन में भगवान बुद्ध ने अपने जीवने के 25 वर्ष बिताए। बौद्ध शिल्पकारी से भी यह जगह मालामाल है। यह कई जैन तीर्थंकरों की भी भूमि रही। भगवान महावीर के समय राजा प्रसेनजित ने यहां शासन किया। श्रावस्ती में न सिर्फ सदियों पुराने कई जैन मंदिर हैं, बल्कि स्तूप भी मौजूद हैं।
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महान राजा अशोक ने भी अपने पुत्र राजा सम्प्रति के साथ यहां कई मंदिरों और स्तूपों का निर्माण करवाया था। 5 ईसा पूर्व चीनी यात्री फाह्यान ने भी अपने लेखों में इस स्थान का जिक्र किया है। उन्होने खास तौर पर यहां मौजूद ब्रिथकल्प के लिए इसका उल्लेख किया है।
यहां सहेथ, महेथ, शोभनाथ मंदिर और महामंगोल मंदिर जैसी अद्भुत जगहें मौजूद हैं। न सिर्फ यह जगह आपको इतिहास की यात्रा पर ले जाती है, बल्कि प्रकृति के पारलौकिक सौंदर्य से भी रू-ब-रू कराती है। यहां आज भी कई ऐसे स्तूप मौजूद हैं, जिनको देखना भर खुद में खास है।
कहां ठहरें - पीडब्ल्यूडी के इंस्पेक्शन बंग्लो, बर्मीज टेंपल रेस्ट हाउस, चाइनीज टेंपल रेस्ट हाउस और जैन धर्मशाला के अलावा भी श्रावस्ती के आस-पास कई होटल्स मौजूद हैं। विदेशी यात्रियों के बीच मशहूर होने की वजह से खान पान का बंदोबस्त भी बेहतरीन है।
कैसे जाएं- आप अपनी गाड़ी से करीब 4 घंटे की ड्राइव से यहां पहुंच सकते हैं। कैसरबाग बस अड्डे से बहराइस के लिए बसें भी मिलती हैं। बहराइच से श्रावस्ती पहुंचना काफी आसान है। यहां पहुंचने के लिए आप इस मैप का भी इस्तेमाल कर सकते हैं।
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लखनऊ से दूरी- करीब 154 किलोमीटर
शहर से करीब डेढ़ सौ किलोमीटर दूर आज भी एक जगह ऐसी है, जिसकी आबोहवा में बुद्ध बसे हुए हैं। बौद्ध और जैन धर्म को मानने वाले लोग दुनिया भर से इस जगह छुट्टियां मनाने आते हैं...तो आप क्यों पीछे रहें। इस हफ्ते चलते हैं बुद्ध की शरण में...
किसी जमाने में यह स्थान उत्तरी कोसल राज्य की राजधानी रहा तो कभी यह माणिकपुरी बन गया। लेकिन, इस जगह को बुद्ध के पारलौकिक स्वरूप और जैन तीर्थ स्थल के रूप में जाना जाता है।
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कहा जाता है कि श्रावस्ती में स्थित जेठवन में भगवान बुद्ध ने अपने जीवने के 25 वर्ष बिताए। बौद्ध शिल्पकारी से भी यह जगह मालामाल है। यह कई जैन तीर्थंकरों की भी भूमि रही। भगवान महावीर के समय राजा प्रसेनजित ने यहां शासन किया। श्रावस्ती में न सिर्फ सदियों पुराने कई जैन मंदिर हैं, बल्कि स्तूप भी मौजूद हैं।
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महान राजा अशोक ने भी अपने पुत्र राजा सम्प्रति के साथ यहां कई मंदिरों और स्तूपों का निर्माण करवाया था। 5 ईसा पूर्व चीनी यात्री फाह्यान ने भी अपने लेखों में इस स्थान का जिक्र किया है। उन्होने खास तौर पर यहां मौजूद ब्रिथकल्प के लिए इसका उल्लेख किया है।
यहां सहेथ, महेथ, शोभनाथ मंदिर और महामंगोल मंदिर जैसी अद्भुत जगहें मौजूद हैं। न सिर्फ यह जगह आपको इतिहास की यात्रा पर ले जाती है, बल्कि प्रकृति के पारलौकिक सौंदर्य से भी रू-ब-रू कराती है। यहां आज भी कई ऐसे स्तूप मौजूद हैं, जिनको देखना भर खुद में खास है।
कहां ठहरें - पीडब्ल्यूडी के इंस्पेक्शन बंग्लो, बर्मीज टेंपल रेस्ट हाउस, चाइनीज टेंपल रेस्ट हाउस और जैन धर्मशाला के अलावा भी श्रावस्ती के आस-पास कई होटल्स मौजूद हैं। विदेशी यात्रियों के बीच मशहूर होने की वजह से खान पान का बंदोबस्त भी बेहतरीन है।
कैसे जाएं- आप अपनी गाड़ी से करीब 4 घंटे की ड्राइव से यहां पहुंच सकते हैं। कैसरबाग बस अड्डे से बहराइस के लिए बसें भी मिलती हैं। बहराइच से श्रावस्ती पहुंचना काफी आसान है। यहां पहुंचने के लिए आप इस मैप का भी इस्तेमाल कर सकते हैं।