श्रवण हत्याकांड: पति-बेटा खो चुकी पत्नी का एलान- अब आंसू नहीं, सिर्फ इंसाफ की जंग
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जवान बेटे को खोया...कलेजे पर पत्थर रख लिया। अब पति को छीन लिया...। पुलिस कहती है...हम पर भरोसा करो। भरोसा ऐसे होता है? बहुत हो गया...। बहुत रो लिया...। अब बर्दाश्त नहीं। पति को मौत की नींद सुलाई है...मैं उनकी नींद हराम कर दूंगी। कितना डरेंगे हम...अपने ही घर में हम बंधक बनकर रह गए हैं। कुछ नहीं है खोने को अब हमारे पास...। ये शब्द हैं निर्मला साहू के। आंखों में आंसू हैं पर दिल में नाइंसाफी के खिलाफ अंगारे...।
पूरे घर में माहौल गमगीन है। हम चुपचाप उनका चेहरा निहारते रहते हैं...जुबान से बोल नहीं फूटती...। तभी वह भर्राई आवाज में बोलती हैं- कलेजे पर पत्थर रख लिया था...। बेटे के हत्यारों को सजा दिलाने के लिए उनका हौसला देखा... सोच अब आंसू नहीं बहाऊंगी...।
बेटे को इंसाफ की उम्मीद ही तो हमें जिंदा रखे थी...। पर उस उम्मीद को भी मार डाला...। (सांत्वना दिलाने को कुछ हाथ बढ़ते हैं और निर्मला फफक पड़ती हैं। सन्नाटे में सिर्फ सिसकियां सुनाई देती हैं...)
कहां छिपा दूं...इन सबको, बेटा नवंबर से घर से बाहर नहीं निकला
सिसकियां थमती हैं...फिर भर्राई आवाज में सवाल- बेटे और बेटी को कहां छिपा दूं। नवंबर में बेटी के साथ वो बाहर गए थे...। लौटकर आए तो बेटे (सुनीत) से बोले- घर में ही रहा करो... बाहर जाने की जरूरत नहीं।
आयुष को खो दिया...अब कुछ खोने की स्थिति में नहीं हूं। उनकी बात से डर गई थी। जब तक वे (श्रवण) घर नहीं आ जाते थे, परेशान रहती। पुलिस कहती है भरोसा करो...कैसे भरोसा...किसका भरोसा?
वह दौड़ते-भागते रहे... धमकियों से नहीं डरे
उन्होंने (पति) दुकान-घर की जिम्मेदारी खुद उठा रखी थी। लगातार धमकियां मिल रही थीं। वो कहते थे खतरा तो है, लेकिन मैं रुकूंगा नहीं। बस तुम सब संभल कर रहो...। बेटे की मौत के बाद पता नहीं कहा से इतना हौसला आ गया था उनमें...। हम सबको इसकी आंच से दूर रखते।
बहाली के बाद क्या वे हमें छोड़ देंगे
हमने तो अपना सब गंवा दिया। कहने को तो हत्यारे का साथ देने वाले पुलिसवालों के खिलाफ कार्रवाई हो गई। हमने तो दो को खो दिया...। अपराधी के साथ साजिश रचती है पुलिस...। लाइन हाजिर हुए हैं...सस्पेंड हुए हैं...कुछ दिन में बहाल हो जाएंगे। तब फिर ?
कौन गारंटी ये पुलिसवाले फिर साजिश नहीं करेंगे? ऐसे लोगों को जेल क्यों नहीं भेजा जा रहा? सबकुछ साफ हो गया तब भी ऐसे लोगों पर कागजी कार्रवाई ही क्यों?
हंस लें जितना हंसना हो...रोएंगे
अपराधियों को हमें जितना रुलाना था रुला चुके। अब उनकी बारी है। हंस लें जितना हंसना हो...रोएंगे ये सब। ये रोएंगे... खून के आंसू। इनके पाप का घड़ा भर गया है...। कितना डराएंगे... कब तक घुट-घुट के जिएंगे? अब तक सिर्फ बेटे के लिए जंग थी। अब बेटे-पति के लिए लड़ेंगे...। इंसाफ लेकर रहेंगे। खौफ दिखाकर वह हमारे हौसलों को नहीं तोड़ सकते हैं।
बेटी बोली, पापा कहते थे-
पापा ने बताया कि ‘अमर उजाला’ ने बहुत साथ दिया। हम सब सिर्फ और सिर्फ इंसाफ चाहते हैं। जब हम पापा से कहते कि घर से मत जाओ या कुछ हो गया तो... यही कहते थे बेटा कैसे हार मान लें। पुलिसवालों का कोई भरोसा नहीं है। पापा के इस बलिदान को हम यूं ही कैसे चले जाने दें। हम न्याय चाहते हैं, बस किसी भी कीमत पर।
निर्मला के इन सवालों के जवाब कौन देगा
क्या ऐसी ही होती है पुलिस?
क्या हमारा बेटा और पति लौटा सकेंगे?
नवबंर से हम सब अपने ही घर में बंधक बन कर रह गए हैं। क्या कुसूर है हमारा?
अब एक बेटा बचा है, बेटी और बहू है। उनकी सुरक्षा की क्या गारंटी?
हमें अब भी न्याय नहीं मिलता तो व्यर्थ है हमारा जीना
दोषी पुलिसवालों पर सिर्फ कागजी कार्रवाई से क्या होगा
कुछ दिन बाद वो फिर बहाल होंगे, तो क्या हमें छोड़ देंगे?