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गर्भ में ही शिशु को चढ़ा सकते हैं खून

Fri, 31 Jan 2014 01:49 PM IST
टीम डिजिटल/अमर उजाला, लखनऊ
टीम डिजिटल/अमर उजाला, लखनऊ Updated Fri, 31 Jan 2014 01:49 PM IST
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sgpgi doctor gives biggest happiness

सीतापुर निवासी दंपती के लिए बीता सप्ताह खुशियों की सौगात लेकर आया।

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जन्म लेते ही एक के बाद एक पांच बच्चों की मौत से दुखी इस दंपती के दामन में ये खुशियां संजय गांधी पीजीआई के मातृ एवं शिशु स्वास्थ्य विभाग की प्रो. मंदाकिनी प्रधान के प्रयासों से आई।

गर्भ में ही शिशु को खून चढ़ाकर प्रो. प्रधान ने उसका जीवन बचाया। नौ दिन पहले महिला ने स्वस्थ शिशु की जन्म दिया। 2.5 किलोग्राम का ये शिशु अब स्वस्थ है।

बृहस्पतिवार को प्रो. मंदाकिनी प्रधान ने इस उपलब्धि को मीडिया से साझा किया।

प्रो. मंदाकिनी प्रधान ने बताया कि खून में आरएच फैक्टर निगेटिव मां और आरएच फैक्टर पॉजिटिव पिता के कारण गर्भस्थ शिशु को खून न बनने की दिक्कत हो जाती है।
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इसकी वजह से उसकी गर्भ में ही मौत हो जाती है। इसे फीटल डेथ कहते हैं। लेकिन अब इसे रोका जा सकता है।

इसमें सही समय पर गर्भ में शिशु की जांचकर उसे समय-समय पर खून चढ़ाया जाता है। जिससे वो पूरी तरह स्वस्थ जन्म लेता है।

प्रो. प्रधान ने बताया कि सीतापुर निवासी इस दंपती को तीन साल के अंतराल पर दूसरा बच्चा पैदा हुआ है। जो पूरी तरह से स्वस्थ है।

कॉलेज के समय ही लड़कियों का ब्लड ग्रुप जांचें
शादी के बाद होने वाली इस दिक्कत से बचने के लिए जरूरी है कि लड़कियों का ब्लड ग्रुप कॉलेज में पढ़ाई के समय ही करा लिया जाए। यदि ब्लड ग्रुप में आरएच फैक्टर निगेटिव आता है तो ऐसी लड़कियों को शादी के बाद गर्भधारण करने के बाद ऐसी ही परिस्थितियों से गुजरना पड़ सकता है।
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कुल जनसंख्या में पांच फीसदी आरएच निगेटिव फैक्टर के होते हैं।

गर्भधारण करने के बाद यदि समय पर आरएच की जानकारी मिल जाए तो एंटी डी इंजेक्शन लगाकर शिशु को बचाया जा सकता है।
यदि ये इंजेक्शन नहीं लगते हैं तो फिर एकमात्र चारा गर्भस्थ को खून चढ़ाना ही है।

प्रो. मदांकिनी प्रधान ने बताया कि चार साल के दौरान उनके विभाग में 200 महिलाओं को इस तकनीक से सुरक्षित प्रसव कराया जा सकता है। इसे इंट्रा यूट्राइन ब्लड ट्रांसफ्यूजन कहते हैं।

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