योगी की टीम में लखनऊ का दबदबा, अखिलेश सरकार से ज्यादा मंत्री
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उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री महंत आदित्यनाथ योगी की मंत्रिपरिषद में लखनऊ का दबदबा हो गया है। राजधानी के लोगों ने पार्टी की झोली में नौ में से आठ सीटें डालीं तो जवाब में भाजपा ने भी 47 सदस्यीय मंत्रिपरिषद में सूबे में किसी एक जिले से सबसे ज्यादा सात मंत्री बनाकर इसका आभार जताने का संदेश भी दे डाला।
यह बात दीगर है कि इनमें विधायक सिर्फ चार ही हैं। एक विधान परिषद के सदस्य हैं तो दो लोग अभी किसी सदन के सदस्य नहीं हैं। पिछली अखिलेश यादव सरकार में राजधानी से तीन मंत्री बनाए गए थे।
इनमें दो कैबिनेट और एक राज्यमंत्री स्वतंत्र प्रभार थे। हालांकि इन सभी को पहले राज्यमंत्री ही बनाया गया था बाद में तरक्की देकर कैबिनेट किया गया।
नई सरकार में राजधानी से जिन लोगों को प्रतिनिधित्व दिया गया है, उनमें उप मुख्यमंत्री दिनेश शर्मा के अलावा तीन कैबिनेट मंत्री डॉ. रीता बहुगुणा जोशी, आशुतोष टंडन व बृजेश पाठक, दो राज्य मंत्री (स्वतंत्र प्रभार)डॉ. महेन्द्र सिंह व स्वाति सिंह और एक राज्यमंत्री मोहसिन रजा शामिल हैं।
पिछली अखिलेश यादव सरकार के मुकाबले नई भाजपा सरकार में राजधानी को दो गुना से ज्यादा प्रतिनिधित्व दिया गया है। आधा दर्जन से ज्यादा मंत्रियों को कैबिनेट में जगह मिलने से राजधानी में विकास की रफ्तार तेज होने की उम्मीद जताई जा रही है।
संभवत: यह पहला मौका है, जब कैबिनेट में राजधानी से सात मंत्रियों को शामिल किया गया है। उप मुख्यमंत्री बने डॉ. दिनेश शर्मा अभी तक लखनऊ के मेयर थे। बतौर मेयर राजधानी की समस्याओं और विकास की जरूरतों से वह अच्छी तरह वाकिफ हैं।
माना जा रहा है कि उनके डिप्टी सीएम बनने से लखनऊ की तस्वीर बदलेगी। इसके अलावा डॉ. जोशी, पाठक व टंडन के भी कैबिनेट मंत्री बनने का राजधानी को फायदा होगा और विकास की रफ्तार तेज होगी। देखने वाली बात यही है कि ये उम्मीदें कहां तक पूरी होती हैं।
डॉ. दिनेश शर्मा : नई भूमिका की चुनौती
महापौर से डिप्टी सीएम बने डॉ. शर्मा के लिए नई भूमिका उपलब्धि के साथ चुनौतीपूर्ण भी है। संगठनात्मक कामकाज के माहिर शर्मा पार्टी के सौम्य व साफ-सुथरे चेहरे वाले नेता हैं।
एलयू में कॉमर्स के प्रोफेसर शर्मा भारतीय जनता युवा मोर्चा व अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद से भी जुड़े रहे हैं। उन्हें पीएम व भाजपा अध्यक्ष अमित शाह का करीबी माना जाता है।
वह पहली बार 2008 में मेयर बने। 2012 में फिर से मेयर चुन लिए गए। 2014 के लोकसभा चुनाव में लखनऊ से टिकट के दावेदार भी थे, लेकिन राजनाथ सिंह के लिए दावेदारी छोड़ दी थी। केंद्र में मोदी सरकार बनने के बाद उन्हें राष्ट्रीय उपाध्यक्ष व गुजरात का प्रभारी भी बनाया गया।
आशुतोष टंडन : पिता की विरासत आगे बढ़ाने की चुनौती
आशुतोष उर्फ गोपाल टंडन भाजपा के दिग्गज नेता लालजी टंडन के पुत्र हैं। दूसरी बार विधानसभा में पहुंचे गोपाल टंडन के सामने मंत्री के रूप में अपने पिता की विरासत को आगे बढ़ाने की चुनौती भी है।
56 वर्षीय गोपाल टंडन एलयू स्नातक हैं। वह लखनऊ पूर्व विधानसभा क्षेत्र से तीन साल में दूसरी बार विधायक चुने गए हैं। 2009 में चुनावी राजनीति में कदम रखा।
पिता लालजी टंडन के सांसद चुने जाने के कारण रिक्त सीट लखनऊ पश्चिम से पहला चुनाव लड़े लेकिन कांग्रेस केश्याम किशोर शुक्ला से हार गए। कलराज मिश्र के लोकसभा सदस्य चुने जाने के बाद हुए उप चुनाव में वह लखनऊ पूर्व से चुनाव लड़े और जीते।
रीता बहुगुणा जोशी : खींचनी होगी नई लकीर
रीता बहुगुणा जोशी : खींचनी होगी नई लकीर
रीता बहुुगुणा जोशी को भाजपा की प्रतिष्ठापूर्ण सीट लखनऊ कैंट पर कमल खिलाने का तोहफा मंत्री पद के रूप में मिला। उन्होंने न सिर्फ इस सीट पर अपर्णा यादव को हराया बल्कि अपनी सीट बरकरार रखकर यह साबित कर दिया कि वह क्षेत्र से लगातार जुड़ी रहीं।
मंत्री बनने वाली इकलौती महिला विधायक हैं। इलाहाबाद विवि में प्रोफेसर रहीं रीता पूर्व सीएम हेमवती नंदन बहुगुणा की बेटी हैं। उनके बड़े भाई विजय बहुगुणा उत्तराखंड के सीएम रह चुके हैं। इलाहाबाद की मेयर रह चुकीं डॉ. जोशी ने 2014 का लोकसभा चुनाव में कांग्रेस के टिकट पर लखनऊ से राजनाथ सिंह के खिलाफ चुनाव लड़ा था। वह प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष भी रह चुकी हैं।
बृजेश पाठक : मंत्री को हराने का इनाम
हरदोई जिले के मल्लावां के रहने वाले बृजेश पाठक ने एलयू छात्रसंघ के अध्यक्ष रह चुके हैँ। सपा सरकार के मंत्री रविदास मेहरोत्रा को हराने का इनाम उन्हें मंत्री पद के रूप में मिला है।
52 साल के बृजेश की छवि दबंग नेता की है। 2002 में वह कांग्रेस के टिकट पर मल्लावां सीट से विधानसभा चुनाव लड़े थे और मात्र 130 वोटों से बसपा प्रत्याशी सतीश वर्मा से हार गए थे।
इसके बाद बसपा में शामिल हुए 2004 में उन्नाव लोकसभा सीट से सांसद चुने गए। पाठक राज्यसभा के सदस्य भी रहे। उन्होंने 2009 में भी लोकसभा चुनाव लड़ा, पर हार गए। बसपा में दलित-ब्राह्मण गठजोड़ के लिए ब्राह्मण भाईचारा सम्मेलनों की भी जिम्मेदारी संभाली। वह मंत्री रविदास मेहरोत्रा को हराकर विधानसभा पहुंचे। मंत्री को हराने का इनाम उन्हें मंत्री बनाकर दिया गया।
स्वाति सिंह: मायावती के खिलाफ मोर्चा खोल बनाई पहचान
मुलायम कुनबे के अनुराग सिंह को सरोजनीनगर सीट पर हराया। उन्हें स्वतंत्र प्रभार के मंत्री बनाया गया है। ।भाजपा नेता दयाशंकर सिंह की पत्नी हैं स्वाति सिंह। किस्मत की धनी स्वाति को 20 जुलाई 2016 से पहले कोई नहीं जानता था।
38 साल की स्वाति तब चर्चा र्में आईं जब उनके पति ने बसपा सुप्रीमो मायावती के खिलाफ अभद्र टिप्पणी के जवाब की थी। इसके जवाब में बसपा नेताओं ने स्वाति और उनकी बेटी पर अभद्र टिप्पणियां कीं। नसीमुद्दीन समेत कई नेताओं के खिलाफ मुकदमा कायम करा दिया।
स्वाति के आक्रमक तेवरों के आगे मायावती तक को बैकफुट पर जाना पड़ा। स्वाति के तेवर भाजपा को पसंद आए। इसके बाद वह भाजपा का प्रमुख महिला चेहरा होकर उभरीं। स्वाति को महिला मोर्चा का अध्यक्ष बना दिया गया। चुनाव में उन्हेें सरोजनीनगर सीट से टिकट दे दिया गया और वह चुनाव जीत कर विधायक बन गईं।
डॉ. महेंद्र सिंह : असम में कमल खिलाने का इनाम
डॉ. महेंद्र सिंह की गिनती भारतीय जनता पार्टी के जमीनी नेताओं में होती है। महेंद्र सिंह ने पार्षद से अपना सियासी सफर शुरू किया था। वर्तमान में डॉ. महेंद्र सिंह मौजूदा समय में विधान परिषद सदस्य है। डॉ. महेंद्र सिंह भाजपा असम के प्रभारी हैं।
असम विधान सभा चुनाव में वह भाजपा के प्रमुख रणनीतिकार थे और उनकी अगुवाई में भाजपा को वहां जीत हासिल हुई। 47 वर्ष के डॉ. महेंद्र सिंह लखनऊ विश्वविद्यालय से पीएचडी की डिग्री ले चुके हैं।
उन्हें राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ का भी नजदीकी माना जाता है। वह भारतीय जनता युवा मोर्चा और विद्यार्थी परिषद से भी जुड़े रहे हैं। जनता से सीधे जुड़ाव और पार्टी के लिए उनके योगदान को देखते हुए डा. महेंद्र सिंह को राज्यमंत्री (स्वतंत्र प्रभार) से नवाजा गया है।
मोहसिन रजा : मुसलमानों में भरोसा पैदा करने की पहल
विधानसभा चुनाव में एक भी मुसलमान को टिकट न देने की तोहमत झेल रही भाजपा ने पूर्व क्रिकेटर मोहसिन रजा को मंत्रिपरिषद में जगह देकर मुसलमानों में भरोसा पैदा करने की पहल की है।
मोहसिन की गिनती शहर की बड़ी खेल हस्तियों में होती है। वह 2013 में भाजपा से जुड़े। 49 साल के मोहसिन ने लखनऊ में गली क्रिकेट से पहचान बनाई।1987 में उन्होंने दो रणजी मैच भी खेले, लेकिन अपनी गरम मिजाजी के कारण ज्यादा समय तक क्रिकेट की पिच पर नहीं टिक सके।
उनकी कोचिंग में यूपी की अंडर-23 टीम कर्नल सीके नायडू ट्र्रॉफी जीतने में भी कामयाब रही थी। वर्तमान में मोहसिन रजा चौक स्टेडियम में एलसीए क्लब से जुडे़ हुए हैं। क्रिकेट के साथ-साथ मोहसिन ने जब सियासी पिच पर भी स्ट्राइक ली तो मंत्री की कुर्सी तक भी जा पहुंचे। फिलहाल वह विधानमंडल के दोनों सदनों में से किसी के भी सदस्य नहीं है।