उन्नाव में चलती थी कुलदीप सेंगर की सत्ता, दुष्कर्म पीड़िता के पिता की मौत के बाद शुरू हुए दुर्दिन
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भाजपा विधायक कुलदीप सिंह सेंगर की उन्नाव में समानांतर सत्ता चलती थी। पुलिस हो या प्रशासन, सभी उसकी जी हुजूरी करते थे, लेकिन उसके ऊपर दुष्कर्म का आरोप लगाने वाली युवती के पिता की हिरासत में मौत के बाद से दुर्दिन शुरू हो गए।
इससे पूर्व दुष्कर्म पीड़िता को स्थानीय पुलिस तवज्जो नहीं दे रही थी। युवती ने न्यायालय के आदेश पर मुकदमा कायम कराया तो पुलिस थोड़ा हरकत में आई और शिवम नाम के युवक को गिरफ्तार कर जेल भेज दिया। युवती लगातार सेंगर पर दुष्कर्म का आरोप लगाती रही, पर पुलिस अनसुना करती रही।
गर्दिश में आए कुलदीप के सितारे
मामले की पैरवी करने वाले दुष्कर्म पीड़िता के पिता की कुलदीप के गुर्गों ने सात अप्रैल को पिटाई की, ऊपर से पुलिस ने पिता को ही सलाखों के पीछे ढकेल दिया। मामला लखनऊ तक पहुंचा, फिर भी कोई कार्रवाई नहीं हुई।
पीड़िता ने खुद को आग लगाने की कोशिश की तो एडीजी जोन ने मामले का संज्ञान लेकर उन्नाव के तत्कालीन एसपी को जांच के लिए लिखा। अगले दिन पुलिस की पिटाई से पीड़िता के पिता की मौत हो गई। बस यहीं से यूपी की सियासत में भूचाल आ गया और कुलदीप के सितारे गर्दिश में आ गए।
रातोरात सीबीआई को जांच स्थानांतरित
पीड़िता के पिता की मौत से सरकार बैकफुट पर आ गई और पुलिस ने सेंगर के भाई को गिरफ्तार कर लिया। रातोरात जांच सीबीआई को स्थानांतरित की गई और जांच शुरू होने तक मामले की पड़ताल के लिए एसआईटी का गठन किया गया।
एसआईटी हरकत में आती इससे पहले ही सीबीआई ने दो घंटे में दुष्कर्म और दुष्कर्म पीड़िता के पिता की हत्या के मामले में एफआईआर दर्ज कर जांच शुरू कर दी।
आखिर तक बचाती रही पुलिस
जिस विधायक को उसके रसूख के चलते यूपी पुलिस बचा रही थी, उसी सेंगर को सीबीआई ने चंद घंटों में ही गिरफ्तार कर लिया। सीबीआई ने उन्नाव के माखी थाने के कई पुलिस कर्मियों को गिरफ्तार कर जेल भेज दिया। इन पुलिस कर्मियों पर दुष्कर्म पीड़िता के पिता को झूठे मुकदमे में फंसाने का आरोप था।
इसमें थाने के एसएचओ और कई अन्य पुलिस कर्मी शामिल थे। यानी 20 महीने में ही सीबीआई ने कुलदीप के खिलाफ दर्ज मुकदमे में पूरे साक्ष्य एकत्र किए और न्यायालय में पैरवी की, जिससे कुलदीप की तमाम दलीलें नाकाम साबित हुईं और उसे न्यायालय ने दोषी माना।