कोरोना कालः मुस्कुराएगा इंडिया की रिपोर्ट जारी, आंकड़ों से समझिए किस पर कितना हावी हुआ मानसिक दबाव
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संक्रमण के बीच बढ़ते अनिश्चितता का ग्राफ युवा व किशोरों की चिंता बढ़ा रहा है। युवाओं का बेलौस अंदाज, बेफिक्री और आसमान से ऊंचा उड़ने की ख्वाहिशें कोरोना से पैदा हुए हालात के बोझ में कहीं गुम हो गए हैं। कोरोना काल में युवा व किशोरों के मानसिक स्वास्थ्य के लिए मुस्कुराएगा इंडिया अभियान एनएसएस और यूनिसेफ द्वारा चलाया गया।
इसकी पहली रिपोर्ट जून में जारी हुई थी और तकरीबन 1100 युवाओं ने समस्याएं दर्ज कराईं थी। दूसरी रिपोर्ट मानसिक स्वास्थ्य दिवस की पूर्व संध्या पर सामने आई, जिसमें यह संख्या 2156 के आसपास दर्ज हुई है। अभियान से जुड़े विशेष कार्याधिकारी व राज्य संपर्क अधिकारी एनएसएस अंशुमालि शर्मा कहते हैं कि समस्याओं में सीधे तौर पर मानसिक विकार के मामले तो महज 11 प्रतिशत ही हैं, लेकिन इन्हें जन्म देने वाले मुद्दों तेजी से उभर कर सामने आए हैं, जिनकी वजह से युवा तनाव में है।
जैसे शिक्षा संबंधी समस्याएं 41 फीसदी रहीं हैं। वित्तीय समस्याओं का प्रतिशत 13 और पारिवारिक दिक्कतों का प्रतिशत भी 11 रहा। इसी तरह सेहत, रोजगार और खानपान से जुड़ी समस्याओं से परेशान युवा-किशोरों का प्रतिशत क्रमश: 10, 7 और 4 रहा।
महिलाओं की तुलना में पुरुष ज्यादा जागरूक
रिपोर्ट के मुताबिक तनाव व दबाव झेलने वालों में 59 फीसदी पुरुष व 41 फीसदी महिलाएं हैं। इसी तरह शहरी युवा 48 फीसदी की तुलना में ग्रामीण प्रतिशत 52 फीसदी ज्यादा है। अंशुमालि शर्मा कहते हैं कि यह सकारात्मक संकेत है कि ग्रामीण भी अवसाद, तनाव को एक बीमारी की तरह मानकर इसके इलाज के लिए आगे आए हैं। वहीं, स्नातक कर चुके युवाओं में भविष्य की चिंता ज्यादा देखी गई। कुल आंकड़ों में ऐसे युवा 47 प्रतिशत हैं। मनोवैज्ञानिकों का कहना है कि ग्रेजुएशन के बाद नौकरी, आगे की पढ़ाई को लेकर अनिश्चितता तनाव बढ़ा रही है।
पीयर ग्रुप से दूरी, आने वाले वक्त में 65 फीसदी युवाओं को करेगी बीमार, नजर रखे परिवार
युवाओं के समाजशास्त्र पर बनी शोध कमेटी के उपाध्यक्ष व समाजशास्त्री डॉ. विनोद चंद्रा कहते हैं कि स्कूल-कॉलेज, कोचिंग की कैंटीन में पीयर ग्रुप के साथ बिताया समय व्यक्तित्व विकास की एक बेहतरीन पाठशाला होती है। ग्रेजुएशन में फ्रेशर्स पार्टी, वेलकम पार्टी का अपना महत्व है, जिसमें नए लोगों के साथ सामंजस्य का पाठ सीखते हैं स्टूडेंट।
आठ महीने से यह सब युवाओं-किशोरों से छिन गया है। सामंजस्य और समाजीकरण की प्रैक्टिस छूटी है। आने वाले वक्त में इसका असर देखने को मिलेगा और शिक्षकों और अभिभावकों को नजर रखना होगा। 60.65 फीसदी युवाओं में तमाम तरह की मनोवैज्ञानिक दिक्कतें देखने को मिलेंगी
मनोचिकित्सकों की चिंता का कारण
मनोवैज्ञानिक डॉ. आशुतोष श्रीवास्तव कहते हैं कि युवाओं और किशोरों में चिंता, अवसाद, ओसीडी (मनोविकार), अकेलापन और आत्महत्या की प्रवृत्ति बढ़ी है। वहीं, कोविड मेंटल हेल्थ वॉरियर डॉ. रश्मि सोनी कहती हैं कि नई व्यवस्थाओं ने हीन भावना और कुंठा को बढ़ाया है। बच्चों में खीझ और जिद्दीपन बढ़ा है।
ये भी हकीकत आई सामने
खुनखुनजी गर्ल्स पीजी कॉलेज की समाजशास्त्र विभाग की असिस्टेंट प्रोफेसर व रायबरेली के मनोविज्ञान विभाग के असिस्टेंट प्रोफेसर डॉ. अमिष द्वारा किए गए ऑनलाइन सर्वे का ये निष्कर्ष रहा। यह सर्वे 519 युवाओं पर किया गया।
- 30% ने वर्क फ्रॉम होम के कारण कार्य क्षेत्र से अलगाव की बात कही।
- 60% युवाओं ने माना कि वे दोबारा नौकरी न मिलने के डर से सहमे हैं।
- 40% युवाओं को स्कूल, कॉलेज, सार्वजनिक स्थानों पर संक्रमित होने का डर रहता है।
- 40% युवा मानते हैं कि छींक आने से डर जाते हैं
- 75% युवाओं का 10.10 घंटे सोशल साइट्स पर बीत रहा है।