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संगम में वैज्ञानिकों को विलुप्त धारा के निशान मिलने के संकेत

Thu, 01 Feb 2018 05:44 PM IST
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, लखनऊ
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, लखनऊ Updated Thu, 01 Feb 2018 05:44 PM IST
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scientist found the sign of invisible river in sangam Allahabad
संगम - फोटो : SELF

तीर्थराज प्रयाग के संगम क्षेत्र में वैज्ञानिकों को विलुप्त धारा (पॉलियो चैनल) के अलग-अलग जगहों पर निशान मिले हैं। टेढ़ी-मेढ़ी, घुमावदार और सीधी लंबी विलुप्त धारा के निशान कौशांबी के सराय अकिल गांव से लेकर त्रिवेणी संगम के बीच इलेक्ट्रिकल रेजिस्टिविटीटुमोग्राफी तकनीक पर आधारित सर्वे में नजर आए हैं।

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हालांकि वैज्ञानिक अभी इससे पूर्ण रूप से सहमत नहीं हैं कि यह पॉलियो चैनल विलुप्त सरस्वती नदी का ही है। सूखकर टूटी हुई धाराओं (चैनल) कहां से कहां तक लगातार गए हैं और उनके भीतर का पानी खारा है या मीठा या फिर एक जैसा है, इसका अध्ययन करने के लिए दूसरी तकनीकों का सहारा लिया जाएगा।
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छह सौ किलोग्राम वजन वाले भू-भौतिकीय ट्रांसमीटर से बृहस्पतिवार से संगम क्षेत्र की चिह्नित एरिया में हेलीकॉप्टर के जरिये विलुप्त धारा का थ्रीडी डाटा संग्रह करने का काम शुरू होगा।
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फिलहाल पॉलियो चैनल मिलने से केंद्रीय भूमि जल आयोग, नेशनल जियोफिजिकल रिसर्च इंस्टीट्यूट हैदराबाद और डेनमार्क के स्काईटेम सर्वे एप्स के वैज्ञानिक सरस्वती नदी की धारा की खोज को लेकर उत्साहित हैं। उनका कहना है कि कोशिश जारी है और आने वाले समय में इस रहस्य से पर्दा जरूर उठेगा।

केंद्रीय भूमि जल बोर्ड के क्षेत्रीय निदेशक डॉ. वाईबी कौशिक के नेतृत्व में कौशांबी जिले के फन गांव में कैंप कर रहे वैज्ञानिकों ने बृहस्पतिवार को भूगर्भीय रहस्यों का पता लगाने में सक्षम आधुनिक तकनीक से लैस सीएसआईआर के हेलीकॉप्टर से हवाई सर्वेक्षण आरंभ किया।

सर्वेक्षण दल के साथ आए सीएसआईआर के वैज्ञानिक डॉ. सुभाष चंद्रा का कहना है कि इलेक्ट्रिकल रेजिस्टिविटीटुमोग्राफी तकनीक से विलुप्त धारा के चैनल दिखाई पड़े हैं । यह निशान कौशांबी में 1500 से 2000 फीट गहराई में मिले हैं।


डेलीकॉप्टर के जरिए भूगर्भ का अध्ययन करने के बाद मिलने वाले डाटा के आधार पर निर्धारित स्थानों पर ड्रिलिंग और लॉगर मशीन से लॉगिंग कराई जाएगी, ताकि चैनलों को जोड़कर उनके अस्तित्व, प्रकार और एकरूपता का पता किया जा सके।

फिलहाल सरस्वती नदी की विलुप्त धारा के रहस्यों का पता करने के लिए सतह से 500 मीटर की गहराई तक थ्रीडी डाटा जुटाया जा रहा है।

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