स्वामी प्रसाद का इस्तीफा: अपने पत्र में किसे छुटभईया नेता कह रहे हैं स्वामी, बयानों को 'निजी' बताने पर नाराजगी
स्वामी प्रसाद के बयानों पर राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव के साथ उनकी पत्नी डिंपल यादव और चाचा शिवपाल यादव भी इसे उनके निजी बयान बताते रहे हैं।
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अपने पत्र में वह छुटभईया नेताओं पर भी प्रतिक्रिया व्यक्त कर रहे हैं। बीते दिनों में स्वामी प्रसाद के बयानों पर सबसे तीखी प्रतिक्रिया पूर्व मंत्री और वर्तमान में ऊंचाहार से विधायक मनोज पांडेय ने प्रकट की थी। हो सकता है कि स्वामी की प्रतिक्रिया मनोज पांडेय को लेकर हो। एक ही दिन पहले वह मनोज पांडेय को बीजेपी का एजेंट बता चुके हैं।
स्वामी प्रसाद के बयानों पर राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव के साथ उनकी पत्नी डिंपल यादव और चाचा शिवपाल यादव भी इसे उनके निजी बयान बताते रहे हैं। पत्र की भाषा यह कहती है कि यदि उनके बयानों का समर्थन ना भी किया जाए तो कम से उन्हें निजी बताकर भोथरा ना किया जाए।
मुझे धमकियां दी गईं, मारने की सुपारी भी
स्वामी प्रसाद मौर्य ने कहा कि सपा को मजबूत करने के लिए खुद की परवाह नहीं की। उन्होंने कहा, दलितों और पिछड़ों को जोड़ने के अभियान के दौरान, मुझे गोली मारने, हत्या कर देने, तलवार से सिर कलम करने, जीभ काटने, नाक-कान काटने, हाथ काटने आदि-आदि लगभग दो दर्जन धमकियों व हत्या के लिए 51 करोड़, 51 लाख, 21 लाख, 11 लाख, 10 लाख आदि भिन्न-भिन्न रकम देने की सुपारी भी दी गई, अनेको बार जानलेवा हमले भी हुए, यह बात दीगर है कि प्रत्येक बार मैं बाल-बाल बचता चला गया। उल्टे सत्ताधारियों द्वारा मेरे खिलाफ अनेको एफआईआर भी दर्ज कराई गई, लेकिन अपनी सुरक्षा की बिना चिंता किये हुए मैं अपने अभियान मैं निरंतर चलता रहा।
किसी का हर बयान पार्टी का, मेरा हर बयान निजी
स्वामी प्रसाद ने कहा, हैरानी तो तब हुई जब पार्टी के वरिष्ठतम नेता चुप रहने के बजाय मौर्य जी का निजी बयान कह करके कार्यकर्ताओं के हौसले को तोड़ने की कोशिश की, मैं नहीं समझ पाया एक राष्ट्रीय महासचिव मैं हूं, जिसका कोई भी बयान निजी बयान हो जाता है और पार्टी के कुछ राष्ट्रीय महासचिव व नेता ऐसे भी हैं जिनका हर बयान पार्टी का हो जाता है, एक ही स्तर के पदाधिकारियों में कुछ का निजी और कुछ का पार्टी का बयान कैसे हो जाता है, यह समझ के परे है। दूसरी हैरानी यह है कि मेरे इस प्रयास से आदिवासियों, दलितों, पिछड़ो का रुझान समाजवादी पार्टी के तरफ बढ़ा है। बढ़ा हुआ जनाधार पार्टी का और जनाधार बढ़ाने का प्रयास व वक्तव्य पार्टी का न होकर निजी कैसे? यदि राष्ट्रीय महासचिव पद में भी भेदभाव है, तो मैं समझता हूं ऐसे भेदभाव पूर्ण, महत्वहीन पद पर बने रहने का कोई औचित्य नहीं है।