‘सड़क केवल गाड़ियों के लिए नहीं होती’
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
पूर्व आईएएस अधिकारी और भारत की ट्रांसपोर्ट पॉलिसी तैयार करने वाले ओपी अग्रवाल का कहना है कि सड़कें केवल गाड़ियों के चलने के लिए नहीं होतीं। सड़कें बनाने वाले इंजीनियरों और ब्यूरोक्रेट्स को भी यह ध्यान रखना चाहिए कि सड़कें सभी वर्ग के लिए उपयोगी हों। मौजूदा समय में वर्ल्ड रिसोर्सेज इंटरनेशनल (डब्ल्यूआरआई) इंडिया के सीईओ ओपी अग्रवाल शुक्रवार को लखनऊ में अरबन मोबिलिटी कॉन्फ्रेंस में भाग लेने आए थे।
देश में अरबन मोबिलिटी को ठीक करने में केंद्र सरकार और कई राज्य सरकारों को सहयोग कर रहे ओपी अग्रवाल का कहना है कि लखनऊ सहित अधिकांश शहरों में सड़कों पर फुटपाथ, दिव्यांगों के लिए उपयोगी टेक्टाइल टाइल नहीं मिलेंगे। साइकिल ट्रैक बनाए भी गए हैं तो उन पर अतिक्रमण हैं।
अगर हमें सड़कों पर ट्रैफिक जाम खत्म करना है। इसके लिए नए फ्लाईओवर्स, चौड़ीकरण की जगह सभी के लिए सड़कें, सभी के लिए यातायात सुविधा जैसी थीम को ध्यान में रखकर काम करना होगा। पब्लिक के लिए बस सुविधा ठीक करनी होगी। अभी जिस तरह की सिटी बस सेवा शहरों में है। उससे तो हालात ठीक नहीं होने वाले हैं। साइकिल शेयरिंग जैसी सुविधाओं के लिए पार्किंग व विज्ञापन से कमाई जैसी सुविधाएं देनी होंगीं।
पब्लिक ट्रांसपोर्ट के लिए सभी नागरिक चुकाएं शुल्क
जर्मनी के यातायात व ध्वनि प्रदूषण डिवीजन के पूर्व प्रमुख एक्सेल फ्रीडरिक ने कहा कि रोड नेटवर्क के प्रबंधन के लिए कुछ प्रमुख फैसले लेने होंगे। जैसे, पब्लिक ट्रांसपोर्ट के उपयोग के लिए अनिवार्य शुल्क सभी नागरिकों पर लगे। आर्थिक नुकसान के चलते सभी पब्लिक ट्रांसपोर्ट का उपयोग करने लगेंगे। पब्लिक ट्रांसपोर्ट भी इससे सुधरेगा। जर्मनी में हमारा मिनिस्टर तक पब्लिक ट्रांसपोर्ट उपयोग करता है। इससे पूरी सुविधाएं वैसे ही ठीक हो जाती हैं। मेट्रो के लिए फीडर सिस्टम लाने होंगे।
एक चौथाई लागत में बन जाएगी मेट्रो नियो
परंपरागत मेट्रो नेटवर्क की तुलना में एक चौथाई कीमत में मेट्रो नियो बनाई जा सकती है। 10 लाख से कम आबादी वाले शहरों के लिए यह बहुत उपयोगी हो सकता है। नासिक में पहला प्र्रोजेक्ट मेट्रो नियो का कर रहे महा मेट्रो रेल कॉरपोरेशन के एमडी बृजेश दीक्षित ने बताया कि एलीवेटेड ट्रैक पर यह ट्रेन भी चलेगी। दो कोच की इस ट्रेन के लिए छोटे स्टेशन बनेंगे।
पटरी नहीं होने की वजह से सिग्नल सिस्टम और पटरी की लागत भी कम होती है। कोच भी हल्के होते हैं। सबसे बड़ी कोच की खासियत यह है कि एलीवेटेड ट्रैक से हटाकर इसे सड़क पर फीडर सर्विस की तरह भी उपयोग किया जा सकता है। गोरखपुर, वाराणसी जैसे शहरों में यह उपयोगी हो सकता है।
एल्युनियम के कोच अब मेट्रो में लगेंगे
अभी तक स्टील के बने कोच मेट्रो प्रोजेक्टों में उपयोग हो रहे थे। टीटागढ़ कंपनी ने एल्युमिनियम के कोच बनाकर मेट्रो को देने की शुरूआत की है। कंपनी ने अरबन मोबिलिटी एक्सपो में इसे प्रजेंट किया है। कंपनी के प्रतिनिधि ने बताया कि पुणे मेट्रो में सबसे पहले इन कोच का उपयोग होगा। इसका सबसे बड़ा फायदा हल्के कोच के साथ कम कीमत और शांत ट्रेन बनाने के रूप में सामने आयेगा।
क्यूआर कोड स्कैन कर जानिए अपनी मेट्रो
यूपी मेट्रो रेल कॉरपोरेशन ने पूरे प्रदेश में चल रही मेट्रो के बारे में जानने के लिए क्यूआर कोड का उपयोग किया है। हर शहर की मेट्रो के लिए अलग क्यूआर कोड बनाया गया है। मोबाइल से स्कैन करते ही प्रोजेक्ट के बारे में सूचना मिल जाएगी। इन क्यूआर कोड को एक्सपो के बाद सभी मेट्रो स्टेशनों पर भी रखा जाएगा।