सरकारी अस्पतालों में बुखार तक की दवाएं नहीं, मरीज बाहर से खरीदने को मजबूर
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लखनऊ के सरकारी अस्पतालों और चिकित्सा संस्थानों में दवाओं की किल्लत से मरीजों की मुश्किलें बढ़ गईं हैं। केजीएमयू, लोहिया संस्थान, बलरामपुर अस्पताल सहित सभी अस्पतालों में बुखार तक की दवाओं का संकट है। मरीज घंटों कतार में लगकर काउंटर पर पहुंचते हैं तो जवाब दिया जाता है कि दवाएं खत्म हो गई हैं। भर्ती मरीजों को भी बाहर से दवाएं मंगानी पड़ रही हैं। केजीएमयू में कैंसर के मरीजों को टारगेटेड थेरेपी में इस्तेमाल होने वाली दवाएं करीब दो माह से नहीं मिल रही हैं। पेश है अस्पतालों में दवा संकट की पड़ताल करती रिपोर्ट...
केजीएमयू
वार्ड में सिर्फ ग्लूकोज, बुखार व कैंसर की दवाएं खत्म
केजीएमयू हर साल करीब 80 करोड़ की दवाएं खरीदने का दावा करता है। यहां रोजाना आठ से 10 हजार मरीज आते हैं। करीब 4500 बेड हैं। आयुष्मान, असाध्य, सीएम व पीएम फंड के तहत भी यहां बड़ी संख्या में मरीज भर्ती होते हैं। इन्हें भी वार्ड में पर्याप्त दवाएं नहीं मिल रही हैं। हालत यह है कि कैंसर मरीजों को टारगेटेड थेरेपी में दी जाने वाली दवाएं करीब दो माह से खत्म हो गई हैं। वहीं, इन दिनों वायरल, फीवर, डेंगू व मलेरिया के मरीज बढ़ गए हैं। सांस के मरीज भी बड़ी संख्या में आ रहे हैं, लेकिन इन्हें दवाएं नहीं मिल पा रही हैं।
ये दवाएं खत्म : गैस के लिए दी जाने वाली पेंटाजोल, दर्द की ट्रामाडोल, एंटीबायोटिक्स सेप्रोजोन, सेफ्ट्रीक्जोन, एम्पिसिलीन, मेट्रनिडाजोल, सिप्रोफ्लोजिन, बुखार की पैरासीटामॉल जैसी प्रमुख दवाएं खत्म हो चुकी हैं। वार्ड में भर्ती होने वाले मरीजों को सिर्फ ग्लूकोज मिल रहा है। अन्य दवाओं की पर्ची थमा दी जाती है। सूत्रों का कहना कि केजीएमयू प्रशासन की ओर से दवा आपूर्ति करने वाली फर्म को हर सप्ताह रिमाइंडर भेजा जा रहा है, लेकिन वहां से दवा उपलब्ध नहीं होने का जवाब भेज दिया जा रहा है।
अमृत व एचआरएफ को फायदा देने की कवायद तो नहीं...
सिविल अस्पताल : यहां शुगर की दवाओं तक का संकट बना है। कई एंटीबायोटिक दवाएं भी नहीं हैं। मरीज निजी मेडिकल स्टोर से दवाएं खरीदने को मजबूर हैं। निदेशक डॉ. डीएस नेगी ने बताया कि कुछ दवाएं कम हैं, जल्द ही वे अस्पताल में रहेंगी।
बलरामपुर अस्पताल : यहां हाईडोज एंटी रैबीज वैक्सीन इम्यूनोग्लोबिन नहीं है। ऐसे में मरीज निजी सेंटर से दो हजार रुपये तक के वैक्सीन लेकर लगवा रहे हैं। इसी तरह ब्लड प्रेशर की टेलमीसेरटन, शुगर की लेटेस्ट दवाएं, कैल्शियम की टैबलेट नहीं है। प्रवक्ता एसएस त्रिपाठी के मुताबिक, एक-दो दवाएं कम हैं। इनकी जगह दूसरी दवाएं मुहैया करा देते हैं।
विलय के साथ शुरू हो गया दवा संकट
लोहिया संस्थान में अस्पताल के विलय के बाद ही दवाओं का संकट शुरू हो गया है। हालत यह है कि मुफ्त में मिलने वाली दवाएं नाममात्र की मिल रही हैं। यहां रोजाना करीब साढ़े तीन हजार मरीज आते हैं। विलय के दूसरे दिन संस्थान से कुछ दवाएं हॉस्पिटल ब्लॉक में भेजी गई थीं, लेकिन वे दूसरे ही दिन खत्म हो गईं। अब मरीजों को निजी मेडिकल स्टोर से दवाएं खरीदनी पड़ रही हैं।
नहीं मिल रहीं ये दवाएं : लोहिया संस्थान में वायरल फीवर में दी जाने वाली पैरासिटामॉल और सेप्रोजोन जैसी दवाएं नहीं हैं। इसी तरह हृदय रोगियों को दी जाने वाली कोवार्सिल एम, शुगर की ग्लिम प्राइड 2 एमजी दवा का भी संकट है।
मंगवाईं जाएंगी दवाएं
आयुष्मान, असाध्य सहित अन्य मरीजों को जरूरत के मुताबिक लोकल परचेज से दवाएं उपलब्ध कराई जाती हैं। उन्हें दवा नहीं खरीदनी पड़ती है। संभव है कि कुछ दवाओं की कमी हो, लेकिन हर सप्ताह मुख्य स्टोर में दवाएं मंगाई जाती हैं। कई बार कंपनी आपूर्ति करने में देरी कर देती है। इस वजह से समस्या हो सकती है। फिर भी इसे दिखवाया जाएगा और दवाएं मंगवाई जाएंगी। - डॉ. सुधीर सिंह, प्रवक्ता, केजीएमयू
मुख्य स्टोर में चंद दवाएं ही मिलीं
विलय के वक्त अनुमान था कि करीब तीन माह की दवाएं हैं, लेकिन मुख्य स्टोर में चंद दवाएं ही पाई गईं। संस्थान की ओर से दवाओं का प्रबंध किया जा रहा है। कुछ दवाएं आ गई हैं। कुछ आनी हैं। - डॉ. भुवनचंद तिवारी, एमएस, लोहिया संस्थान