बसपा नेताओं की आपसी फूट में खुला लैकफेड घोटाला

टीम डिजिटल/लखनऊ Updated Tue, 22 Oct 2013 12:41 AM IST
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reason behind lakefed scam

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बांदा की एक सड़क के ठेके में हुए कमीशनबाजी के खेल ने न सिर्फ बसपा सरकार के मंत्रियों में फूट डाली बल्कि मुकदमेबाजी में भी फंसा दिया।
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ऐसे ही एक मामले में लैकफेड घोटाले की जांच के लिए मुकदमा दर्ज कराया गया था। लेकिन इस मुकदमेबाजी का कोई लाभ मिलने के बजाय इसमें एक-एक कर कई मंत्री फंसते चले गए।
महोबा में दो किलोमीटर की सड़क बनाने के चार करोड़ 28 लाख रुपए के ठेके को बसपा सरकार में तत्कालीन मुख्यमंत्री मायावती की संस्तुति पर पॉवर प्रोजेक्ट कार्पोरेशन लिमिटेड को ठेका सौंपा गया था।
कार्पोरेशन के एक ठेकेदार ने काम भी शुरू दिया था पर बीच में ही कार्पोरेशन के ठेके को रद कर लैकफेड के सिपुर्द कर दिया गया। यह फैसला तत्कालीन मंत्री बाबू सिंह कुशवाहा के कहने पर पूर्व आईएएस रामबोध मौर्य ने किया था।

बगैर किसी उचित कारण के न सिर्फ ठेका रद किया गया बल्कि जिस ठेकेदार ने काम शुरू कर दिया था, उसमें जो खर्च हुआ, उसे उसके आधे से कम का भुगतान देकर मुंह बंद रखने की चेतावनी दे दी गई।

ठेके की लेन-देन में जो कमीशनबाजी हुई वह ऊपर तक पहुंची ही नहीं और पूर्व मंत्री कुशवाहा व पूर्व आएएस रामबोध मौर्य के बीच ही बंदरबांट हो गई।

इसकी जानकारी होने पर तत्कालीन मंत्री नसीमुद्दीन सिद्दीकी के इशारे पर लखनऊ की हुसैनगंज कोतवाली में लैकफेड का मुकदमा दर्ज कराया गया था।

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मुकदमा दर्ज कराने के पीछे पूर्व मंत्री बाबू सिंह कुशवाहा पर दबाव बनने की मंशा थी, लेकिन सत्ता पलटने ही पत्ते भी पलट गए।

लैकफेड घोटाले के शिकंजे में बसपा के कई मंत्री फंस गए और कमीशनखोरी का ऊपर तक पहुंचने का आरोप लगा।

पूर्व आईएएस रामबोध मौर्य के अलावा कई अन्य अधिकारियों से भी जो पूछताछ की गई उसमें  सामने आया था कि पूरा कमीशन डकार लिए जाने की वजह से शीर्षस्थ लोग नाराज थे। इसी वजह से मुकदमा कराया गया।

दो सौ करोड़ से अधिक का हुआ घोटाला
इस पूरे प्रकरण की जांच में यह पहले ही सामने आ चुका है कि लैकफेड में सौ नहीं बल्कि दो सौ से ढाई सौ करोड़ के बीच का घोटाला हुआ।

जांच कर रहे अधिकारियों का अभी भी मानना है कि घोटाले की रकम बढ़ भी सकती है।

घोटाले की रकम के इतना अधिक होने का खुलासा अगस्त 2012 में तब हुआ था जब मामले की जांच कर रही पुलिस कोआपरेटिव सेल की टीम ने आरोपी पूर्व महाप्रबंधक (प्रशासन) पंकज त्रिपाठी को रिमांड पर लेकर लैकफेड कार्यालय में छापामारी की।

दो बार की हुई छापामारी में करोड़ों के भुगतान के दस्तावेज गायब पाए गए थे। पूछताछ में सामने आ चुका है लैकफेड को कई विभागों से करोड़ों का काम मिला था और लगभग सभी में जमकर धांधली हुई।

इसमें 132 करोड़ का काम अकेले पंचायती राज विभाग का था। इसके अलावा बीआरजीएफ योजना में करीब 143 करोड़ का काम आवंटित किया गया था।

साथ ही बेसिक शिक्षा व राष्ट्रीय माध्यमिक शिक्षा विभाग, एनआरएचएम, आंगनबाड़ी विभाग समेत कुछ अन्य विभागों के लिए संस्था को निर्माण करने के लिए रकम मिली थी।

लैकफेड के निर्माण एजेंसी बनने के बाद राष्ट्रीय माध्यमिक शिक्षा अभियान के तहत प्रदेश के कुल 14 जिलों में 25 स्कूलों का निर्माण होना था। हर स्कूल 58.12 लाख रुपए की लागत से बनना था। इसमें भी जमकर धांधली हुई थी।

उस तमाम धांधलियों की शिकायत पर पुलिस कोआपरेटिव सेल की टीम ने लैकफेड मुख्यालय पर छापा मारा था। छापे में जांच एजेंसी को फर्जी तरीके से किए गए भुगतान से संबंधित कई महत्वपूर्ण दस्तावेज हाथ लगे थे।

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