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जानें, अखिलेश के बजट के सियासी मायने

Wed, 25 Feb 2015 07:26 PM IST
Updated Wed, 25 Feb 2015 07:26 PM IST
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अखिलेश सरकार का चौथा बजट सबक, सियासी सरोकार और सपनों का लेखा-जोखा है। कोई रचनात्मकता दिखाने, अर्थव्यवस्था केसवालों से जूझने या आर्थिक-रिस्ट्रक्चरिंग की जद्दोजहद में सिर खपाने की बजाय मुख्यमंत्री ने 2017 का अपना लक्ष्य साधने पर सारा ध्यान केंद्रित रखा है।

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उन्हें अंदाज है कि 2017 की सियासी जंग का आगाज हो चुका है और कुछ कर दिखाने-बताने केलिए महज एक बजट और पेश करने का मौका मिलेगा। अब वक्त कम, चुनौतियां ज्यादा हैं। लिहाजा उन्होंने अपना चुनावी रथ सीधे गांवों की ओर मोड़ दिया।
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लैपटॉप बांटकर नौजवानों को लुभाने और आधुनिकता से कदमताल की कोशिशों का हश्र अखिलेश यादव लोकसभा चुनाव में देख चुके हैं। जो नेतृत्व लैपटॉप वितरण को दुनिया की सबसे बड़ी योजना बताकर आसमान से तारे तोड़ लाने जैसे पराक्रम से गदगद था, वही सार्वजनिक तौर पर मान चुका है कि लैपटॉप बांटना सबसे बड़ी भूल थी।
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हमारे लैपटॉप हमारे ही खिलाफ काम आए। लिहाजा, सरकार ने इस बजट केजरिए अपनी राह बदल ली। सपा ने मान लिया है कि उसकी अगली जंग अभी तक भाजपा से ही है। दिल्ली में भले उलटे मुंह गिरे हों, आम शहरियों का मोदी से मोहभंग नहीं हुआ है।

यूपी-बिहार जीतने केलिए भाजपा हर जतन करेगी। ऐसे में सपा को रुढ़ियों-जातियों और पोंगापथ में जकड़े ग्रामीणों को लुभाना ज्यादा आसान लग रहा है, ये उसके परंपरागत वोट भी हैं। वैसे भी सुबह से शाम होने तक अपने शौक, फैशन, मोबाइल-आईपैड-गैजेट्स बदलने वालों की पीढ़ी की निष्ठाओं पर भरोसे ने उसे सियासी तौर पर कमजोर ही किया है।

तो यह गांवों का बजट है

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..तो सीधे-सीधे यह बजट गांवों और गांव वालों का बजट है। राजनीतिक बजट है। गन्ना किसानों को पैसा दिलाने में भले नाकाम रही हो, सरकार किसानों की खुशहाली केलिए 2015-16 को किसान वर्ष केरूप में मनाएगी।

करीब 25 हजार करोड़ रुपये सीधे ग्रामीणों और ग्रामीण  योजनाओं के लिए लक्षित हैं, अन्य योजनाओं से गांवों पर खर्च होगा वह अलग। बजट में, बेरोजगार नौजवानों के लिए एग्री जंक्शन जैसी वन स्टॉप शॉप योजना है। 7000 करोड़ रुपये की भारी रकम केसाथ गांवों में 16 घंटे और कृषि क्षेत्र को 8 घंटे बिजली देने जैसा अति-लुभावना वादा है।

मुफ्त सिंचाई के लिए 200 करोड़ है, तो सस्ती परिवहन सुविधा केलिए 100 करोड़ रुपये का प्रावधान है। कम ब्याज पर फसली कर्ज केलिए 150 करोड़ और बीजों केलिए भी सवा दो सौ करोड़ का प्रावधान किया गया है।

ग्रामीण इन्फ्रास्ट्रक्चर के लिए केंद्रीय योजनाओं की अच्छी-खासी रकम तो मिलेगी ही, सरकार ने अपने स्तर पर लोहियाजी केनाम से गांवों में मकान बनाने के लिए 1000 करोड़ रुपये का इंतजाम भी है। इसकेलिए सरकार 1500 करोड़ का हडको से कर्ज लेगी, जिसका सालाना ब्याज ही 80 करोड़ रुपये होगा।

अल्पसंख्यकों की सरकार कैसे अनदेखी करती? अल्पसंख्यक कल्याण केलिए 2776 करोड़ रुपये रखे गए हैं। अन्य योजनाओं से भी वे लाभ पाएंगे ही। लेकिन, लोकसभा चुनाव केबाद से जैसे सरकार तुष्टीकरण के आरोपों से बचना चाहती है, वैसी ही कोशिश बजट में भी दिखी। उधर, सामाजिक सुरक्षा के नाम पर वोट-बटोरू समाजवादी पेंशन के लिए 2727 करोड़ व बुजुर्ग-किसान पेंशन केलिए 1613 करोड़ के इंतजाम भी हैं।

महिलाओं का भी रखा ख्याल

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महिला अत्याचारों पर अक्सर घिरी दिखने वाली सरकार ने बजट केबहाने अपने संजीदा जाहिर होने की मुनादी भी करनी चाही है। 100 करोड़ का महिला सम्मान कोष, हर जनपद में महिला हेल्पलाइन और आर्थिक रूप से कमजोर महिलाओं की सेहत केलिए आशा ज्योति केंद्र इसकी मिसाल हैं।

कन्या विद्याधन की बहाली के लिए 300 करोड़, विधवा-निराश्रित महिलाओं व उनके बच्चों की शिक्षा केलिए 637 करोड़ और स्कूलों में बालिका हॉस्टल केलिए 244 करोड़ का इंतजाम भी किया गया है। लैपटॉप योजना का दायरा थोड़ा सिकुड़ गया है, अब यूपी बोर्ड के 10वीं और 12वीं के मेधावियों को ही इसका फायदा मिलेगा। बेरोजगारों को भत्ता तो गुजरे जमाने की बात हो गया।

पर शहरियों की अनदेखी नहीं है?

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शहरों-शहरियों की बजट में अनदेखी नहीं है। शहर की सड़कों को बदसूरत बनाने और उलझाने वाले बिजली के ओवरहेड तारों से मुक्ति दिलाने की आस बजट में जगाई गई है। टीप टॉप सड़कों पर सरपट भागती साइकिलों के सपने भी सजाए गए हैं। शहरियों को लुभाने केलिए सारा जोर इन्फ्रास्ट्रक्चर पर है।

ऐसे बड़े काम, जो खुद अपनी गवाही दें। केंद्र की सियासत का शिकार लखनऊ मेट्रो केलिए 425 करोड़ हैं तो गाजियाबाद मेट्रो केलिए 1834 करोड़। आगरा-लखनऊ ग्रीन फील्ड एक्सप्रेस-वे केलिए 3000 करोड़। लखनऊ में उच्चस्तरीय कैंसर संस्थान पर सरकार आगे बढ़ी, तो बोनस में कन्नौज को भी यह सौगात दे दी। वहीं, कानपुर में ट्रांस-गंगा परियोजना में स्मार्ट सिटी और गाजियाबाद में सबसे लंबे 6 लेन एलीवेटेड हाइवे का सपना भी दिखाया गया है।

मुख्यमंत्री ने बजट भाषण में अपनी सरकार को इसलिए भी सराहा है कि यूपी की विकास दर पांच फीसदी रही है, जो देश की विकास दर 4.7 से ज्यादा है। लेकिन, आंकड़े हमेशा सवाल का जवाब नहीं होते। प्रतिष्ठा देते हों, ऐसा भी नहीं। मजबूती और मजबूरी का विकल्प भी नहीं बनते। सरकार हो या व्यक्ति, सार्वजनिक दायरे में उनका एक्शन ही भविष्य तय करता है। एक्शन अक्सर आंकड़ों की चुगली कर दिया करते हैं।

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