1996 का परिदृश्य: दरकती मर्यादाओं का दौर, सदन के अंदर चले लात-घूंसे, रात के अंधेरे में चली गई कल्याण की कुर्सी

अखिलश वाजपेयी, अमर उजाला, लखनऊ Published by: ishwar ashish Updated Thu, 25 Nov 2021 10:21 AM IST

सार

1996 से 2002 तक का यह कालखंड उत्तर प्रदेश के संसदीय इतिहास का ‘युद्धकाल’ माना जा सकता है। जब राजनीतिक अवसरवाद सिर चढ़कर बोल रहा था तो सदन के अंदर लात-घूंसे तक चल गए।
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- फोटो : amar ujala
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विस्तार

उत्तर प्रदेश के राजनीतिक चरित्र, चिंतन और चाल में 1989 से शुरू हुए बदलाव ने 1996 के चुनाव के साथ राजनीति और राजनेताओं के कई रंग दिखाए। यह वो दौर था जब राज्यपाल रोमेश भंडारी सियासी अखाड़े में सांविधानिक मर्यादाओं को भूल भाजपा से कुश्ती लड़ते नजर आए। राजनेताओं की अखाड़ेबाजी से लोकतांत्रिक परंपराओं को बचाने के लिए न्यायालय को कई बार हस्तक्षेप करना पड़ा।
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कल्याण सिंह की उसी भाजपा से आर-पार की लड़ाई छिड़ गई, जिसकी जड़ें मजबूत करने वाले अहम किरदारों में वे थे। कुर्सी के खेल में टकराव ने भाजपा की सत्ता से वनवास की पटकथा लिख दी। 1996 में चुनी गई विधानसभा चली तो पांच की जगह लगभग छह साल, मायावती दूसरी बार मुख्यमंत्री बन गईं, भाजपा के तीन नेता मुख्यमंत्री बने, केंद्र में भी भाजपा की सरकार बन गई, बावजूद इसके यह कालखंड अच्छी कम, बुरी यादें ज्यादा दे गया।


एक तरह से 1996 से 2002 तक का यह कालखंड उत्तर प्रदेश के संसदीय इतिहास का ‘युद्धकाल’ माना जा सकता है। 1995 में स्टेट गेस्ट हाउस कांड के चलते मुलायम सिंह-कांशीराम की दोस्ती टूट चुकी थी। भाजपा ने बसपा को समर्थन देकर सरकार बनवाई। यह फैसला संघ परिवार की समग्र हिंदुत्व के समीकरणों से सियासत को साधने का प्रयोग था। मायावती ने 3 जून 1995 को मुख्यमंत्री पद की शपथ ली। पर, यह प्रयोग छह महीने भी नहीं चला। मायावती के एजेंडे को लेकर वैचारिक विरोध में 18 अक्तूबर 1995 को भाजपा ने समर्थन वापस ले लिया। प्रदेश में राष्ट्रपति शासन लग गया।

रोमेश भंडारी ने नहीं बनने दी सरकार
1996 में राष्ट्रपति शासन के दौरान ही विधानसभा के चुनाव हुए थे। विधानसभा की उस समय 425 सीटें थीं। बहुमत के लिए 213 सीटें जरूरी थीं। भाजपा 174 सीटें जीतकर 1993 की तरह ही सबसे बड़े दल के रूप में उभरी। 110 सीटों के साथ सपा दूसरे नंबर पर थी। बसपा 1993 की ही तरह 67 सीटें ही जीत सकी तो कांग्रेस को 33 सीटें मिली थीं। स्टेट गेस्ट हाउस कांड की तल्खी से सपा और बसपा एक नहीं हो सकती थीं। राज्यपाल रोमेश भंडारी ने सबसे बड़ा दल होने के बावजूद भाजपा को सरकार बनाने का न्योता नहीं दिया। भाजपा ने दावा किया तो भी उन्होंने इनकार कर दिया। उन्होंने राष्ट्रपति शासन की अवधि बढ़ाने की सिफारिश कर दी।

न्यायालय के सहारे लोकतंत्र
प्रदेश में राष्ट्रपति शासन एक साल पहले से ही लगा हुआ था, फिर से इसकी सिफारिश ने विवाद खड़ा कर दिया। उच्च न्यायालय ने राज्यपाल की सिफारिश पर सवाल उठा दिया। मामला सर्वोच्च न्यायालय पहुंचा। शीर्ष अदालत ने इलाहाबाद हाईकोर्ट के निर्णय पर रोक लगाते हुए राष्ट्रपति शासन छह महीने बढ़ाने के फैसले को सही ठहरा सांविधानिक और लोकतांत्रिक संकट टाला। विधानसभा निलंबित हो गई। राष्ट्रपति शासन जारी रहा। यह ऐसा कालखंड रहा, जिसमें व्यवस्थापिका की परंपराओं व मर्यादाओं को बचाने के लिए न्यायालय को सबसे ज्यादा बार हस्तक्षेप करना पड़ा।

छह-छह महीने के मुख्यमंत्री

विधानसभा तो निलंबित हो गई, लेकिन परदे के पीछे सरकार बनाने की कवायदें जारी रहीं। सरकार बनाने के सबसे नजदीक थी भाजपा, बशर्ते उसे बसपा का साथ मिल जाता। दिल्ली में अटल बिहारी वाजपेयी और कांशीराम के बीच बातचीत शुरू हुई।
बसपा मायावती को मुख्यमंत्री बनाने पर अड़ गई। कोई और रास्ता न देख भाजपा ने हामी भर दी, लेकिन कुछ शर्तों के साथ। छह-छह महीने के मुख्यमंत्री का नायाब फॉर्मूला निकाला गया।

बसपा फिर अड़ गई कि पहले छह महीने के लिए मायावती को ही मुख्यमंत्री बनाया जाए। भाजपा राजी तो हो गई लेकिन इस शर्त के साथ कि विधानसभा अध्यक्ष उसका होगा। दोनों में गठबंधन हुआ और 21 मार्च 1997 को पहले छह महीने के लिए मायावती मुख्यमंत्री बन गईं। पहले चार महीने तो ठीक-ठाक बीते, लेकिन उसके बाद मायावती के कई फैसलों ने भाजपा व बसपा के बीच कड़वाहट बढ़ाना शुरू कर दिया।

मायावती ने पलटी मारी
मायावती ने समझौते के अनुसार 21 सितंबर 1997 को मुख्यमंत्री की कुर्सी छोड़ दी। कल्याण सिंह ने मुख्यमंत्री पद संभाला। दोनों पार्टियों में तल्खी और तकरार लगातार तेज हो रही थी। कल्याण एक के बाद एक, मायावती के फैसले पलटने लगे। तिलमिलाई बसपा ने 19 अक्तूबर को समर्थन वापस ले लिया। राज्यपाल रोमेश भंडारी ने कल्याण को दो दिन के भीतर सदन में बहुमत साबित करने का निर्देश दे दिया।

सदन में चले लात-घूंसे
बसपा, कांग्रेस और जनता दल (यू) के विधायक टूटने लगे। 21 अक्तूबर 1997 को बहुमत परीक्षण के दौरान विधायकों ने सदन की मर्यादा ताक पर रखते हुए एक-दूसरे पर माइक व जूते-चप्पल फेंके। लात-घूंसे चले। कल्याण को 222 विधायकों का समर्थन मिला।

राष्ट्रपति ने नहीं मानी भंडारी की सिफारिश

विधानसभा में हुई हिंसा के बाद राज्यपाल भंडारी ने 22 अक्तूबर 1997 को राष्ट्रपति शासन लगाने की सिफारिश कर दी। पर, राष्ट्रपति केआर नारायणन ने इसे मानने से इनकार कर दिया। उन्होंने दोबारा विचार के लिए उसे केंद्र सरकार के पास भेजा। आखिरकार केंद्र सरकार ने भी सिफारिश को दोबारा राष्ट्रपति के पास नहीं भेजने का फैसला किया और इस तरह कल्याण सिंह सरकार चलती रही।

जंबो मंत्रिमंडल का भी रिकॉर्ड
कल्याण सिंह को दूसरे दलों से आए ज्यादातर विधायकों को मंत्री बनाना पड़ा। उन्होंने मंत्रिमंडल में 93 लोगों को शामिल किया। इतना बड़ा मंत्रिमंडल प्रदेश में पहले कभी नहीं बना था। इसके बाद देश में मंत्रियों की संख्या को लेकर बहस छिड़ी और नियम बना कि दोनों सदनों की संख्या का अधिकतम 15 प्रतिशत ही मंत्रिमंडल का आकार होगा।

आपराधिक छवि वाले दोस्त बने
कल्याण ने सरकार तो बचा ली लेकिन उन्हें बहुत कुछ गंवाना पड़ा। राजा भैया के खिलाफ ‘कुंडा को गुंडा विहीन करूं, प्रण करत ध्वज उठाय दोउ हाथ’ का शंखनाद करने वाले कल्याण को राजा भैया को अपने मंत्रिमंडल में जगह देनी पड़ी, क्योंकि मायावती के समर्थन वापस लेने के बाद उन्होंने ही उनकी मदद की थी।

रात के अंधेरे में खींच ली गई कल्याण की कुर्सी

कल्याण सिंह की सरकार बचाने आए जगदंबिका पाल का मन भी कुछ दिनों में मुख्यमंत्री की कुर्सी के लिए मचलने लगा। राज्यपाल रोमेश भंडारी भी कल्याण सरकार को नहीं देखना चाहते थे। बसपा विधायकों को तोड़ने से मायावती तो पहले से ही नाराज चल रही थीं। पाल ने मायावती से बातचीत की और कथानक तैयार हो गया। 21 फरवरी, 1998 को भंडारी ने कल्याण सिंह सरकार को बर्खास्त कर जगदंबिका पाल को रात 10.30 बजे मुख्यमंत्री पद की शपथ दिला दी। वरिष्ठ पत्रकार योगेश श्रीवास्तव बताते हैं कि पाला बदल के खेल में माहिर नरेश अग्रवाल भी पाल के साथ थे। वह उप मुख्यमंत्री बन गए। अटल बिहारी वाजपेयी को राज्यपाल के फैसले के खिलाफ धरना और आमरण अनशन पर बैठना पड़ा।

जब सचिवालय में दो मुख्यमंत्री बैठे थे
कल्याण सरकार की बर्खास्तगी पर भाजपा नेताओं ने रात में ही उच्च न्यायालय की शरण ली। न्यायालय ने राज्यपाल के फैसले पर रोक लगा दी और कल्याण सरकार को बहाल कर दिया। उस दिन सचिवालय में अजीब नजारा देखने को मिला। वहां दो मुख्यमंत्री बैठे थे। जगदंबिका पाल सुबह-सुबह ही सचिवालय पहुंच कर मुख्यमंत्री की कुर्सी पर काबिज हो गए तो कल्याण सिंह बगल वाले कमरे में बैठकर कुर्सी खाली होने की प्रतीक्षा कर रहे थे। अधिकारियों ने जब उच्च न्यायालय का आदेश दिखाते हुए कड़े तेवर दिखाए तो पाल भारी मन से कुर्सी छोड़कर चले गए। विवाद बढ़ने पर सर्वोच्च न्यायालय के आदेश पर 26 फरवरी को फिर बहुमत का परीक्षण हुआ, जिसमें कल्याण सिंह जीते। सर्वोच्च न्यायालय के निर्देश पर पाल की मुख्यमंत्री की शपथ और कार्यकाल को शून्य माना गया। मुख्यमंत्रियों की सूची से पाल का नाम भी हटा दिया गया।

राज्यपाल की विधानसभा अध्यक्ष से भी ठनी
पाल को मुख्यमंत्री की शपथ दिलाने को लेकर राज्यपाल भंडारी की भी खूब किरकिरी हुई। बहुमत साबित करने के दौरान राज्यपाल भंडारी और विधानसभा के तत्कालीन अध्यक्ष केशरीनाथ त्रिपाठी के बीच खूब तल्खी हुई। राज्यपाल पर्यवेक्षकों की देखरेख में बहुमत परीक्षण चाहते थे, लेकिन तत्कालीन विधानसभा अध्यक्ष त्रिपाठी ने अपने अधिकारों का हवाला देते हुए उन्हें इसकी अनुमति नहीं दी।

सत्ता बदली, पर सांसत खत्म नहीं हुई
कल्याण को हटाने और रामप्रकाश गुप्त को मुख्यमंत्री बनाने के बावजूद भाजपा की अंदरूनी खींचतान खत्म नहीं हुई। कुछ दिन की शांति के बाद रामप्रकाश गुप्त को लेकर तरह-तरह की खबरें आने लगीं। खासतौर से उनके भुलक्कड़ होने की बात काफी तेजी से फैली। इस सबके बीच वर्ष 2000 की दिवाली भी प्रदेश में सत्ता बदल का संदेश लेकर आई। गुप्त की जगह राजनाथ सिंह ने मुख्यमंत्री पद संभाला।
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