{"_id":"61cc0bb2e67bd23ae214fb92","slug":"read-about-an-intresting-story-of-third-cm-of-uttar-pradesh-chandrabahnu-gupta","type":"story","status":"publish","title_hn":"अतीत का झरोखा: वह मुख्यमंत्री जो लखीमपुर खीरी का पांच रुपये का कर्जदार रहा","category":{"title":"City & states","title_hn":"शहर और राज्य","slug":"city-and-states"}}
अतीत का झरोखा: वह मुख्यमंत्री जो लखीमपुर खीरी का पांच रुपये का कर्जदार रहा
Wed, 29 Dec 2021 12:49 PM IST
ishwar ashish
अखिलेश वाजपेयी, अमर उजाला, लखनऊ
अखिलेश वाजपेयी, अमर उजाला, लखनऊ
Published by: ishwar ashish
Updated Wed, 29 Dec 2021 12:49 PM IST
सार
चंद्रभानु गुप्त उत्तर प्रदेश के तीसरे मुख्यमंत्री थे। वो खुद को लखीमपुर खीरी का कर्जदार बताते थे। वो भी पांच रुपये का...। यहां पढ़ें पूरा रोचक किस्सा
विज्ञापन
चंद्रभानु गुप्त
- फोटो : amar ujala
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
विस्तार
चंद्रभानु गुप्त उत्तर प्रदेश के तीसरे मुख्यमंत्री थे। उनका जन्म मूल रूप से अलीगढ़ में हुआ था। पर, उनके बचपन का ज्यादातर समय लखीमपुर खीरी में बीता। गुप्त के बड़े भाई डॉ. प्यारेलाल लखीमपुर खीरी में जेल में डॉक्टर थे। लखनऊ के महापौर एवं विधान परिषद सदस्य रहे स्व. डॉ. दाऊजी गुप्त ने एक बार गुप्त का किस्सा मुझे सुनाया था।
विज्ञापन
किस्सा कुछ यूं है कि 1916 में लखनऊ में कांग्रेस का अधिवेशन था। चंद्रभानु गुप्त जी ने बड़े भाई डॉ. प्यारेलाल से लखनऊ आने की अनुमति मांगी। पर, उन्होंने मना कर दिया। गुप्त जी की अधिवेशन में शामिल होने की बड़ी इच्छा थी, क्योंकि उसमें लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक आ रहे थे। हालांकि, अधिवेशन में महात्मा गांधी भी शामिल होने के लिए आ रहे थे। पर, उस समय तक गांधी जी का नाम बहुत चर्चित नहीं हुआ था।
विज्ञापन
यह अधिवेशन इसलिए भी महत्वपूर्ण था क्योंकि 1907 में सूरत में कांग्रेस अधिवेशन में हुई फूट के बाद पहली बार लखनऊ में इस अधिवेशन में नरम एवं गरम दल वाले नेता एक साथ बैठने जा रहे थे। बड़े भाई प्यारेलाल जी से अनुमति नहीं मिली तो
विज्ञापन
उन्होंने किसी से 5 रुपये उधार लिए और लखीमपुर खीरी से लखनऊ आ गए।
लखनऊ में वह गणेशगंज स्थित आर्यकुमार सभा के दफ्तर में ठहरे। डॉ. प्यारेलाल भी अधिवेशन में हिस्सा लेने लखनऊ आए थे। उन्हें जब मालूम हुआ कि चंद्रभानु घर से चुपचाप निकलकर इसी अधिवेशन को देखने आए हैं, तो वह आर्यकुमार दफ्तर
पहुंचे और उन्हें अपने साथ ले गए। इस अधिवेशन का गुप्त पर ऐसा असर हुआ कि उन्होंने आगे चलकर लखनऊ को ही अपनी कर्मभूमि बना ली। वे प्रदेश के मुख्यमंत्री भी हुए। डॉ. दाऊ जी बताते थे कि गुप्त जी से मिलने जब भी कोई लखीमपुर खीरी से आ जाता तो वे कहते, अरे भाई मैं तो वहां का कर्जदार हूं।