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शक था कैंसर का, पर सर्जरी की तो डॉक्टर रह गए हैरान

Wed, 18 May 2016 01:03 PM IST
ब्यूरो/अमरउजाला, लखनऊ
ब्यूरो/अमरउजाला, लखनऊ Updated Wed, 18 May 2016 01:03 PM IST
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rare case of phaleria in stomach in ram manohar lohia institute lucknow
डॉ. अंशुमान पांडे - फोटो : amar ujala

फाइलेरिया नाम सुनते ही हाथी पैर की तस्वीर जेहन में कौंध जाती है। पर, कोई कहे कि पेट में फाइलेरिया तो शायद यह बात गले न उतरे। डॉ. राम मनोहर लोहिया आयुर्विज्ञान संस्थान के गैस्ट्रो सर्जरी के डॉक्टरों की टीम एक ऑपरेशन के दौरान चौंकी। 

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शक कैंसर की ओर था, पर सर्जरी शुरू हुई तो पता चला कि कुछ और है। मामला फाइलेरिया का सामने आया। डॉक्टरों का दावा है कि देश में इस तरह की पहली सर्जरी है। यह सर्जरी यूरोप के इंटरनेशनल जर्नल ऑफ इन्फेक्शस डिजीज में प्रकाशित हुई है।
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केस स्टडी : गैस्ट्रो सर्जरी विभाग के विभागाध्यक्ष डॉ. अंशुमान बताते हैं बाराबंकी की 28 वर्षीय एक महिला असहनीय पेट दर्द और बुखार से पीड़ित थी। यह सिलसिला तीन महीने से चल रहा था। पित्त जैसी उल्टियां होतीं। 
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उसे पीलिया नहीं था। पेट का सीटी स्कैन कराया गया तो उसमें गॉल ब्लैडर के बगल में पानी की झिल्ली दिखाई दी। ऐसा कुछ नहीं दिखा, जिससे स्पष्ट हो कि मरीज को कैंसर है। इस तरह का ये केस अपने आप में अजूबा था जिसे मेडिकल की भाषा में ‘इंफेस्टेशन ऑफ लिवर’ कहा जाता है।

लिवर में सिस्टिक लेजन में पाया गया। ये बहुत दुर्लभ बीमारी थी जिसमें मरीज को परेशानी तो थी लेकिन कैंसर का लक्षण नहीं था। डॉ. अंशुमान के मुताबिक मरीज अभी भी संस्थान में फॉलोअप के लिए आता है। ऑपरेशन के बाद उसे कीमोथेरेपी की भी कोई जरूरत नहीं पड़ी थी।

फाइलेरिया होने पर पैर की लिंब ग्रंथियां हो जाती है ब्लॉक

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डेमो

डॉ. अंशुमान के मुताबिक, पैरों में हाथी पांव की समस्या फाइलेरिया बीमारी की वजह से रहती है। पेट में माइक्रो फाइलेरिया का वायरस कैसे पहुंचा ये स्पष्ट कर पाना बहुत मुश्किल है। 

उनका दावा है कि इस तरह का ये पहला केस था। फाइलेरिया होने पर पैर की लिंब ग्रंथिया ब्लॉक हो जाती हैं जिसकी वजह से पैरों में उसमें सूजन आ जाती है।

मरीज के भीतर दुर्लभ लक्षण को देखते हुए सर्जरी प्लान की गई। ओटी में सबसे पहले पेट में लेप्रोस्कोप डालकर देखा गया कि पेट में कैंसर फैला तो नहीं है। जांच में पेट के दो हिस्सों में माइक्रो फाइलेरिया दिखा। इसके बाद ओपन सर्जरी की गई।

(एफएनएसी) जांच कराई गई तो पता चला कि जो समस्या पेट में दिख रही है वह कैंसर नहीं है। इसके बाद तीन इंच का चीरा लगाकर पेट के सेगमेंट पांच और आठ को काटकर अलग कर दिया गया।

इस पूरी प्रक्रिया में चार घंटे का समय लगा। मरीज अब पूरी तरह ठीक है और उसका वजन भी पहले से काफी बढ़ा है। डॉ. अंशुमान पांडे के नेतृत्व में की गई सर्जरी में डॉ. शकील अहमद और पैथोलॉजी विभाग की विभागाध्यक्ष डॉ. नुजहत हुसैन का सहयोग रहा। 

एनेस्थेटिस्ट की भूमिका संस्थान के निदेशक डॉ. दीपक मालवीय और उनकी टीम ने निभाई। संस्थान में इस दुलर्थ बीमारी का ऑपरेशन होने पर निदेशक डॉ. दीपक मालवीय और चिकित्सा अधीक्षक डॉ. सुब्रत चंद्रा ने टीम को बधाई दी है।

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