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मंदिर आंदोलन : पिटने के बाद पाई ऐतिहासिक फोटो
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आरिफ
लखनऊ। राममंदिर अब मूर्त रूप ले रहा है। करीब तीन दशक पहले जब मंदिर आंदोलन चरम पर था, उस वक्त अयोध्या का माहौल आज जैसा नहीं था। एक पत्रकार के लिए उस दौर में वहां ग्राउंड रिपोर्टिंग करना और फोटो खींचना बेहद जोखिम भरा काम था। यह कहना है वरिष्ठ छायाकार आरबी थापा का जो 1990 में राममंदिर आंदोलन के दौरान विवादित ढांचे के ऊपर कारसेवकों की भगवा लहराते तस्वीर खींच कर सुर्खियों में आ गए थे।
थापा बताते हैं कि कवरेज के लिए 6 दिसंबर 1992 को अयोध्या गया हुआ था। पहले भी कई बार गया था, इसलिए शहर जाना-पहचाना था। मगर उस दिन माहौल अलग था। करीब ढाई लाख कारसेवक अयोध्या में थे, उन्माद और जुनून से लैस। चारों तरफ ‘एक धक्का और दो, ढांचा तोड़ दो’ का नारा गूंज रहा था।
मुहूर्त के मुताबिक, वहां 11.30 बजे साधु-संत साफ-सफाई कर प्रतीकात्मक स्तंभ बनाने वाले थे। 10 बजे के करीब डेढ़ सौ साधु-संत पूजन-सामग्री लेकर आए। तभी लालकृष्ण आडवाणी, अशोक सिंघल और मुरली मनोहर जोशी को साथ लेकर एएसपी अंजू गुप्ता वहां पहुंचीं। बैरिकेडिंग तोड़कर चबूतरे पर आने की कोशिश करने वाले कारसेवकों को पुलिस खदेड़ने में लगी थी। थापा बताते हैं, मैं विवादित ढांचे से दूर खड़ा था। वहां से तस्वीरें खींचना बहुत मुश्किल हो रहा था। एक तरफ पुलिस तो दूसरी ओर कारसेवक छायाकारों को हटाने में जुटे थे। एक-एक फोटोग्राफर की घेराबंदी पांच-पांच कारसेवकों के दल ने कर रखी थी। तभी अचानक कारसेवक ढांचे पर चढ़ गए, भगदड़ मच गई। इसका फायदा उठाकर मैं कारसेवकों का घेरा तोड़कर भाग निकला। पीछे से आवाज आई थापा को पकड़ो... इस बीच किसी ने मुझे धक्का देकर गिरा दिया। फिर शुरू हुआ पिटाई का दौर, देर तक मार खाने के बाद किसी ने हमें उठाया और सीता रसोई जाने का इशारा किया। जहां पहले से मार खाए कई पत्रकार और छायाकार बैठे जख्म सहला रहे थे। अजय सिंह, पंकज ओहरी, नायर जैदी, मुन्ने बक्शी (अब दिवंगत) जैसे उस दौर के दिग्गज छायाकार एक-दूसरे का हौसला बढ़ा रहे थे।
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हिम्मत करके फिर वहां से निकले। इस बीच एक बड़ा पत्थर हमारे पास आकर गिरा। देखा तो दूसरे तल से तकरीबन 75 वर्षीय महिला गुस्से से कांपती हुई हाथ में ईंट उठाएं हम पर निशाना साधने के प्रयास में थी। हाथ जोड़कर अपराध पूछा तो बोलीं, भाग जाओ, तस्वीर मत खींचना। निवेदन किया, माताजी मैं तो हिंदू राष्ट्र (नेपाल) का नागरिक हूं, हमको क्यों कारसेवा देखने से रोक रही हैं। तरस खाकर बोलीं, जाओ देख लो, मगर फोटो मत खींचना वरना...।
46 एकड़ का पूरा इलाका जुनून से भरा था। समूचा दृश्य दिल दहलाने वाला था। कोई दो सौ कारसेवक विवादित ढांचे की तीनों गुंबदों पर चढ़कर लोहे के राॅड, गैंते और सरियों से चोट कर रहे थे। नीचे कारसेवकों ने ढांचा घेर रखा था। एक-एक कर तीनों गुंबद तोड़ दिए गए। इस तरह तमाम बंदिशों, दुश्वारियों के बीच थोड़ा पिट-पिटाकर हम लोगों ने अपना काम अंजाम दिया।
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लखनऊ। राममंदिर अब मूर्त रूप ले रहा है। करीब तीन दशक पहले जब मंदिर आंदोलन चरम पर था, उस वक्त अयोध्या का माहौल आज जैसा नहीं था। एक पत्रकार के लिए उस दौर में वहां ग्राउंड रिपोर्टिंग करना और फोटो खींचना बेहद जोखिम भरा काम था। यह कहना है वरिष्ठ छायाकार आरबी थापा का जो 1990 में राममंदिर आंदोलन के दौरान विवादित ढांचे के ऊपर कारसेवकों की भगवा लहराते तस्वीर खींच कर सुर्खियों में आ गए थे।
थापा बताते हैं कि कवरेज के लिए 6 दिसंबर 1992 को अयोध्या गया हुआ था। पहले भी कई बार गया था, इसलिए शहर जाना-पहचाना था। मगर उस दिन माहौल अलग था। करीब ढाई लाख कारसेवक अयोध्या में थे, उन्माद और जुनून से लैस। चारों तरफ ‘एक धक्का और दो, ढांचा तोड़ दो’ का नारा गूंज रहा था।
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मुहूर्त के मुताबिक, वहां 11.30 बजे साधु-संत साफ-सफाई कर प्रतीकात्मक स्तंभ बनाने वाले थे। 10 बजे के करीब डेढ़ सौ साधु-संत पूजन-सामग्री लेकर आए। तभी लालकृष्ण आडवाणी, अशोक सिंघल और मुरली मनोहर जोशी को साथ लेकर एएसपी अंजू गुप्ता वहां पहुंचीं। बैरिकेडिंग तोड़कर चबूतरे पर आने की कोशिश करने वाले कारसेवकों को पुलिस खदेड़ने में लगी थी। थापा बताते हैं, मैं विवादित ढांचे से दूर खड़ा था। वहां से तस्वीरें खींचना बहुत मुश्किल हो रहा था। एक तरफ पुलिस तो दूसरी ओर कारसेवक छायाकारों को हटाने में जुटे थे। एक-एक फोटोग्राफर की घेराबंदी पांच-पांच कारसेवकों के दल ने कर रखी थी। तभी अचानक कारसेवक ढांचे पर चढ़ गए, भगदड़ मच गई। इसका फायदा उठाकर मैं कारसेवकों का घेरा तोड़कर भाग निकला। पीछे से आवाज आई थापा को पकड़ो... इस बीच किसी ने मुझे धक्का देकर गिरा दिया। फिर शुरू हुआ पिटाई का दौर, देर तक मार खाने के बाद किसी ने हमें उठाया और सीता रसोई जाने का इशारा किया। जहां पहले से मार खाए कई पत्रकार और छायाकार बैठे जख्म सहला रहे थे। अजय सिंह, पंकज ओहरी, नायर जैदी, मुन्ने बक्शी (अब दिवंगत) जैसे उस दौर के दिग्गज छायाकार एक-दूसरे का हौसला बढ़ा रहे थे।
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हिम्मत करके फिर वहां से निकले। इस बीच एक बड़ा पत्थर हमारे पास आकर गिरा। देखा तो दूसरे तल से तकरीबन 75 वर्षीय महिला गुस्से से कांपती हुई हाथ में ईंट उठाएं हम पर निशाना साधने के प्रयास में थी। हाथ जोड़कर अपराध पूछा तो बोलीं, भाग जाओ, तस्वीर मत खींचना। निवेदन किया, माताजी मैं तो हिंदू राष्ट्र (नेपाल) का नागरिक हूं, हमको क्यों कारसेवा देखने से रोक रही हैं। तरस खाकर बोलीं, जाओ देख लो, मगर फोटो मत खींचना वरना...।
46 एकड़ का पूरा इलाका जुनून से भरा था। समूचा दृश्य दिल दहलाने वाला था। कोई दो सौ कारसेवक विवादित ढांचे की तीनों गुंबदों पर चढ़कर लोहे के राॅड, गैंते और सरियों से चोट कर रहे थे। नीचे कारसेवकों ने ढांचा घेर रखा था। एक-एक कर तीनों गुंबद तोड़ दिए गए। इस तरह तमाम बंदिशों, दुश्वारियों के बीच थोड़ा पिट-पिटाकर हम लोगों ने अपना काम अंजाम दिया।