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तत्काल राहत देने वाली आयुर्वेदिक दवाएं बनानी होंगी
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तत्काल राहत देने वाली आयुर्वेदिक दवाएं बनानी होंगी
विश्व आयुर्वेद परिषद की ओर से आयोजित संगोष्ठी में दिए गए सुझाव
आयुष पद्धतियों के आधुनिकीकरण की जरूरत पर जोर
आयुष मिशन की सलाहकार डॉ. कविता त्यागी ने कहा कि आयुष चिकित्सा पद्धति को समय के साथ अत्याधुनिक बनाना होगा। ऐसी दवाएं तैयार करनी होंगी, जो लोगों को तत्काल राहत दें। जड़ी-बूटियों की खेती के साथ ही उनके प्रसंस्करण पर ध्यान देना होगा। सरकार की ओर से इस दिशा में लगातार प्रोत्साहन दिया जा रहा है। वह विश्व आयुर्वेद परिषद अवध प्रांत की ओर से गोमती नगर स्थित होटल में रविवार को आयोजित संगोष्ठी को संबोधित कर रही थीं।
उन्होंने जड़ी बूटियों को इकट्ठा करने से लेकर उसे दवा का आकार देने तक की विधि पर विस्तार से चर्चा की। चिरायता का उदाहरण देते हुए कहा कि यह हिमालय में मिलता है। वहां की जलवायु के हिसाब से मनुष्य का रोग दूर करने में कारगर है। जब उसे दूसरी जलवायु में और दूसरी तकनीक से तैयार किया जाएगा तो उसका रोग पर असर कम होना स्वाभाविक है। ऐसे में आयुर्वेद, यूनानी चिकित्सा में शोध को बढ़ावा देने की जरूरत है। उन्होंने कहा कि 70 फीसदी से ज्यादा पौधे के रस से दवाएं बनती हैं। पौधे तो तोड़े जा रहे हैं, लेकिन उन्हें दोबारा लगाने में कोताही बरती जा रही है।
आयुष मिशन के निदेशक आरएन वाजपेयी ने भी आयुर्वेद के विकास पर चर्चा की। इस दौरान आयुर्वेद सेक्टर में उद्यमिता विकास और कैंसर चिकित्सा में आयुर्वेद के योगदान पर भी विस्तार से चर्चा की गई। मौके पर डॉ. पीएस ओझा, डॉ. एसके मिश्रा, डॉ. गोमती द्विवेदी, परिषद के अध्यक्ष डॉ. अजय दत्त शर्मा, डॉ. इंद्रेश कुमार सिंह, सीएमओ डॉ. नरेंद्र अग्रवाल, डॉ. एसके मिश्रा, डॉ. शैलेंद्र यादव आदि मौजूद थे।
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विश्व आयुर्वेद परिषद की ओर से आयोजित संगोष्ठी में दिए गए सुझाव
आयुष पद्धतियों के आधुनिकीकरण की जरूरत पर जोर
आयुष मिशन की सलाहकार डॉ. कविता त्यागी ने कहा कि आयुष चिकित्सा पद्धति को समय के साथ अत्याधुनिक बनाना होगा। ऐसी दवाएं तैयार करनी होंगी, जो लोगों को तत्काल राहत दें। जड़ी-बूटियों की खेती के साथ ही उनके प्रसंस्करण पर ध्यान देना होगा। सरकार की ओर से इस दिशा में लगातार प्रोत्साहन दिया जा रहा है। वह विश्व आयुर्वेद परिषद अवध प्रांत की ओर से गोमती नगर स्थित होटल में रविवार को आयोजित संगोष्ठी को संबोधित कर रही थीं।
उन्होंने जड़ी बूटियों को इकट्ठा करने से लेकर उसे दवा का आकार देने तक की विधि पर विस्तार से चर्चा की। चिरायता का उदाहरण देते हुए कहा कि यह हिमालय में मिलता है। वहां की जलवायु के हिसाब से मनुष्य का रोग दूर करने में कारगर है। जब उसे दूसरी जलवायु में और दूसरी तकनीक से तैयार किया जाएगा तो उसका रोग पर असर कम होना स्वाभाविक है। ऐसे में आयुर्वेद, यूनानी चिकित्सा में शोध को बढ़ावा देने की जरूरत है। उन्होंने कहा कि 70 फीसदी से ज्यादा पौधे के रस से दवाएं बनती हैं। पौधे तो तोड़े जा रहे हैं, लेकिन उन्हें दोबारा लगाने में कोताही बरती जा रही है।
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आयुष मिशन के निदेशक आरएन वाजपेयी ने भी आयुर्वेद के विकास पर चर्चा की। इस दौरान आयुर्वेद सेक्टर में उद्यमिता विकास और कैंसर चिकित्सा में आयुर्वेद के योगदान पर भी विस्तार से चर्चा की गई। मौके पर डॉ. पीएस ओझा, डॉ. एसके मिश्रा, डॉ. गोमती द्विवेदी, परिषद के अध्यक्ष डॉ. अजय दत्त शर्मा, डॉ. इंद्रेश कुमार सिंह, सीएमओ डॉ. नरेंद्र अग्रवाल, डॉ. एसके मिश्रा, डॉ. शैलेंद्र यादव आदि मौजूद थे।
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