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Lucknow News: पीएचडी के बीच नौकरी मिलने पर पढ़ाई नहीं होगी प्रभावित

Sun, 26 Apr 2026 01:38 AM IST
Lucknow Bureau लखनऊ ब्यूरो
Updated Sun, 26 Apr 2026 01:38 AM IST
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Pursuing a PhD will not be affected if a job is secured in the interim.
लखनऊ विश्वविद्यालय
लखनऊ। लखनऊ विश्वविद्यालय में पीएचडी अध्यादेश-2026 को विद्या परिषद के बाद कार्यपरिषद से भी मंजूरी मिल गई है। नए प्रावधानों के लागू होने से शोधार्थियों को बड़ी राहत मिलेगी। अब पीएचडी के दौरान यदि किसी विद्यार्थी को नौकरी मिलती है तो उसे शोध बीच में छोड़ना नहीं पड़ेगा।
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विश्वविद्यालय के प्रवक्ता डॉ. मुकुल श्रीवास्तव के अनुसार, नया अध्यादेश शोध की गुणवत्ता सुधारने, लचीलापन बढ़ाने और छात्र-केंद्रित अकादमिक माहौल को मजबूत करने के उद्देश्य से तैयार किया गया है। इसके तहत पूर्णकालिक शोधार्थी स्थायी रोजगार मिलने पर पाठ्यक्रम पूरा करने के बाद अंशकालिक पंजीकरण में परिवर्तित हो सकेंगे। यह व्यवस्था वर्तमान शोधार्थियों पर भी लागू होगी। नए नियमों में शोध विषय के विकास की अनुमति भी दी गई है, जिससे शोधार्थी प्रारंभिक चरण में विषय तय करने के बाद अंतिम थीसिस जमा करने तक उसमें संशोधन कर सकेंगे।
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अध्यादेश के तहत तेज प्रगति करने वाले शोधार्थियों को कुलपति की अनुमति से थीसिस जमा करने की समय सीमा में अधिकतम छह माह की छूट दी जा सकती है, हालांकि अंतिम मौखिक परीक्षा न्यूनतम तीन वर्ष पूरे होने के बाद ही आयोजित होगी। अंशकालिक शोधार्थियों के लिए शोध अवधि में कम से कम 120 दिनों तक विश्वविद्यालय से जुड़ाव अनिवार्य किया गया है।
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इसके अलावा, दो-क्रेडिट का ‘रिसर्च और पब्लिकेशन एथिक्स’ पाठ्यक्रम अनिवार्य किया गया है, जिसे ऑनलाइन माध्यम से पूरा करना होगा। शोध की निगरानी के लिए रिसर्च एडवाइजरी कमेटी (आरएसी) की बैठकें अब वर्ष में दो बार जनवरी और जुलाई में होंगी।
पीएचडी शोधार्थियों को थीसिस जमा करने से पहले दो शोध-पत्र प्रकाशित करना अनिवार्य होगा। विश्वविद्यालय के माध्यम से दायर पेटेंट को एक शोध प्रकाशन के बराबर माना जाएगा, जिससे अनुप्रयुक्त शोध और बौद्धिक संपदा सृजन को बढ़ावा मिलने की उम्मीद है।


कोट

नए अध्यादेश के बाद अब ऑनलाइन थीसिस मूल्यांकन और सॉफ्ट कॉपी जमा करना अनिवार्य कर दिया है। हम शोधार्थियों को अधिक अकादमिक स्वतंत्रता देना चाहते हैं, साथ ही मजबूत नैतिक नींव और सटीक शोध परिणाम सुनिश्चित करना चाहते हैं। यह अध्यादेश डॉक्टोरल शिक्षा को मजबूत करने की दिशा में एक जरूरी कदम है।

- प्रो. जेपी सैनी, कुलपति लखनऊ विश्वविद्यालय
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