फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
डाउनलोड करें

सब्सक्राइब करें
Hindi News ›   Uttar Pradesh ›   Lucknow News ›   polution of detergent in gomti river

गोमती में जहर : रोजाना घुल रहा 240 क्विंटल साबुन, जलीय जीवन के साथ इंसानों की सेहत को भी खतरा

Mon, 20 Dec 2021 01:57 AM IST
Lucknow Bureau लखनऊ ब्यूरो
Updated Mon, 20 Dec 2021 01:57 AM IST
विज्ञापन
polution of detergent in gomti river
अतुल भारद्वाज, लखनऊ। गोमती नदी में राजधानी रोजाना करीब 24,000 किलो साबुन घोल रही है। इस साबुन में मौजूद नाइट्रेट, फॉस्फेट जैसे तत्व पानी को जहरीला बना रहे हैं। इससे जलीय जीवन पर खतरा मंडरा रहा है। सीवरेज और नाले का पानी शोधित करने के लिए बने एसटीपी भी परंपरागत तकनीक से इस प्रदूषण (सर्फेक्टेंट) को खत्म नहीं कर पा रहे हैं। इससे पीने के लिए उपयोग हो रहे नदी का पानी इंसानों के लिए भी खतरा बढ़ा रहा है।
विज्ञापन

बीबीएयू के पर्यावरण अध्ययन विभाग के प्रोफेसर डॉ. वेंकटेश दत्ता का कहना है कि लखनऊ में हम औसतन छह लाख घरों को सरकारी आंकड़ों के मुताबिक लेते हैं। प्रति घर औसतन 1.5 किलो साबुन (सर्फेक्टेंट) हर माह उपयोग होता है। ऐसे में हर माह करीब नौ लाख किलो साबुन उपयोग होता है। रोजाना में यह औसत 30,000 किलो हुआ। इसका 80 प्रतिशत भी नदी में गया तो यह आंकड़ा रोजाना 24000 किलोग्राम हुआ। यानी, लखनऊ में 35 किमी लंबाई में बहने वाली गोमती में रोजाना करीब 686 किलोग्राम साबुन प्रति किमी घुल रहा है। यह पानी के जलीय जीवन को समाप्त करने के लिए काफी है। औद्योगिक उपयोग के चलते इस मात्रा को बढ़ा हुआ ही होना चाहिए।
विज्ञापन

आईआईटीआर, आईआईटी बीएचयू की जांच में भी खतरा मिला
आईआईटीआर के वैज्ञानिक डॉ. जीसी किस्कू की मदद से आईआईटी बीएचयू के मार्कंडेय, राजकीय इंजीनियरिंग कॉलेज अंबेडकर नगर के देवेंद्र पी मिश्रा, विंपी लैबोरेटरीज एलएलसी यूएई की निशी के शुक्ला, बीबीडी विवि के पर्यावरण विभाग पोखराज साहू, प्रमोद सिंह और विनय कुमार की रिसर्च टीम ने गोमती नदी के पानी में साबुन (आयोनिक सर्फेक्टेंट) की मौजूदगी और असर को पता करने के लिए नमूने लिए। यह शोध 2019 में मानसूनी बारिश से ठीक पहले लिए नमूनों पर किया गया। इसमें पानी में साबुन के तत्वों की मौजूदगी काफी अधिक मिली। 2020 में यह रिपोर्ट वैज्ञानिक शोधपत्रों में प्रकाशित की गई है। शोध में माना गया कि यह सर्फेक्टेंट झाग बनने से लेकर जलीय परिवेश के लिए भी ईको-टॉक्सिक प्रभाव पैदा कर रहा है। इससे खाद्य श्रृंखला से लेकर उनके जीवन में भी बदलाव हो सकते हैं। पीने के पानी में सर्फेक्टेंट की मात्रा 0.2 ग्राम प्रति घनमी से अधिक नहीं होनी चाहिए। जबकि, गोमती में 10 में से तीन जगह पक्का पुल, डालीगंज पुल, दिलकुशा पर यह मात्रा इस मानक से अधिक मिली।
विज्ञापन
विज्ञापन

दुनिया की अधिकांश नदियों से अधिक साबुन गोमती में
शोध टीम ने पाया कि गोमती नदी में घुले साबुन की मात्रा दुनिया की अधिकांश प्रमुख नदियों से अधिक है। इसमें सर्फेक्टेंट 0.1005 से 0.2758 ग्राम प्रति घनमीटर मिला। इंग्लैंड की नदियों में यह 0.007 से 0.0173 ग्राम प्रति घनमीटर, जापान की सुनामी नदी में 0.005 से 0.001 ग्राम प्रति घनमीटर, अमेरिका की मिसीसिपी नदी में 0.01 से 0.03 ग्राम प्रति घनमीटर, कनाडा की हैलीफैक्स हार्बर नदी में 0.001 से 0.2 ग्राम प्रति घनमीटर सर्फेक्टेंट मिला। केवल तुर्की की कुछ नदियों में सर्फेक्टेंट गोमती नदी के आसपास मिलता है। शोध टीम ने भी एसटीपी पर शोधन तकनीक में बदलाव की जरूरत बताई थी।
50 से अधिक जगहों से नदी में गिरता डिस्चार्ज
रिसर्च टीम ने शोध के लिए 10 जगह से नमूने लिए। टीम ने पाया कि घैला से शहीद पथ के बीच करीब 50 जगहों पर सीधे तौर पर गंदे पानी का डिस्चार्ज नदी में हो रहा था। इसमें नगरिया, सरकटा, पाटा जैसे बड़े नाले शामिल थे। करीब 250 टन सीवरेज बिना शोधन के नदी में गिरता मिला।
साबुन को लेकर कोई मानक प्रक्रिया ही नहीं
साबुन या सर्फेक्टेंट को लेकर कोई मानक प्रक्रिया ही अभी नहीं है। ऐसे में एसटीपी या दूसरी जगहों पर इसके शोधन या उपयोग को लेकर कार्रवाई नहीं की जा सकती है। एसटीपी से निकल रहे पानी की नियमित जांच की जाती है। रिपोर्ट खराब आने पर जरूरी बदलाव भी कराते हैं। नालों को भी टेप कराकर एसटीपी तक ले जाने की कार्रवाई चल रही है। नदी में गिरने वाले नालों की संख्या लगातार कम हो रही है। - डॉ. रामकरन, क्षेत्रीय अधिकारी, यूपीपीसीबी

शोधन तकनीक में बदलाव करना होगा
एसटीपी पर सालों पुरानी तकनीक से शोधन किया जा रहा है। इससे साबुन की मात्रा को शोधित ही नहीं किया जा सकता है। सर्फेक्टेंट्स की समस्या का हल निकालने के लिए फॉस्फेट फ्री डिटरजेंट बनाने का नियम लागू है। उन्होंने एसटीपी की तकनीक भी सुधारी है। भारत की नदियों को बचाना है तो तुरंत इस दिशा में काम करना होगा। दिल्ली में यमुना और लखनऊ में गोमती में सफेद झाग की फोटो हर साल छपती हैं, लेकिन इसका हल नहीं निकलता। - डॉ. वेंकटेश दत्ता, प्रोफेसर, पर्यावरण अध्ययन विभाग, बीबीएयू
विज्ञापन
विज्ञापन

रहें हर खबर से अपडेट, डाउनलोड करें Android Hindi News App, iOS Hindi News App और Amarujala Hindi News APP अपने मोबाइल पे|
Get all India News in Hindi related to live update of politics, sports, entertainment, technology and education etc. Stay updated with us for all breaking news from India News and more news in Hindi.

विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन

एड फ्री अनुभव के लिए अमर उजाला प्रीमियम सब्सक्राइब करें

Next Article

AU ऐप में पढ़ें

Followed