वेंटिलेटर की समस्या खत्म करने के लिए पॉलिसी लाएगी सरकार, परिजनों को भरना होगा फॉर्म
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वेंटिलेटर की समस्या को देखते हुए सरकार नई पॉलिसी ला रही है। इसके तहत किस स्टेज तक मरीज वेंटिलेटर पर रखना है और कब हटाना है, यह तय रहेगा।
ये बातें शनिवार को इंडियन काउंसिल ऑफ मेडिकल रिसर्च के महानिदेशक डॉ. बलराम भार्गव ने कहीं। वह यूपी चैप्टर ऑफ एसोसिएशन ऑफ फिजिशियन ऑफ इंडिया की ओर से आयोजित यूपी एपिकॉन कार्यक्रम संबोधित कर रहे थे।
डॉ. भार्गव ने कहा कि कई बार डॉक्टर के जवाब देने के बाद भी परिवारीजन मरीज को वेंटिलेटर पर रखने की जिद करते हैं। खास तौर से कैंसर, किडनी, लिवर के मरीजों में यह समस्या आती है। इतना ही नहीं मरीज भर्ती होने से पहले ही परिवारीजनों से फॉर्म भरवाया जाएगा। इसमें पूछा जाएगा कि मरीज को वेंटिलेटर पर रखना है या नहीं।
मनमानी तरीके से दवाओं का इस्तेमाल खतरनाक : डॉ. पीके माहेश्वरी
एसएन मेडिकल कॉलेज, आगरा के न्यूरोलॉजी के विभागाध्यक्ष एवं एपिकॉन 2020 के आयोजन सचिव डॉ. पीके माहेश्वरी ने कहा कि गैस और मानसिक बीमारी से जुड़ी दवाएं बिना डॉक्टर की सलाह के नहीं लेनी चाहिए।
इन दवाओं के लंबे समय तक इस्तेमाल से कई तरह से डिसआर्डर की समस्या हो जाती है। इसमें शरीर के किसी हिस्से में अचानक करंट जैसा महसूस होता है। इसी तरह मुंह, हाथ या शरीर के अन्य किसी हिस्से में टेढ़ापन और झटके आने लगते हैं।
सर्वाइकल डिस्टोनिया दर्दनाक होता है। इसमें गर्दन और मुंह टेढ़ा हो जाता है। पीड़ित मांसपेशियों को इच्छानुसार नहीं घुमा पाता है। सिर आगे-पीछे करने में भी दिक्कतें आती हैं। सिर एक ओर घुमा रहता है। इसके इलाज को बोटूलिनम इंजेक्शन दिया जाता है।
कई बार सर्जरी की भी जरूरत पड़ती है। इसी तरह टॉरेट सिंड्रोम में अचानक मुंह हिलता रहता है। बांहें, होंठ भी हिलते रहते हैं। यह बच्चों में ज्यादा होता है। ऐसे में बच्चों के उठने, बैठने के तरीके और उनके व्यवहार पर गौर करने की जरूरत होती है।