{"_id":"660cfb8d5ddb822bde0a079f","slug":"poet-bekal-utsahi-become-the-member-of-rajyasabha-after-rajeev-gandhi-s-approval-2024-04-03","type":"story","status":"publish","title_hn":"Flash Back: ...और राजीव गांधी ने बेकल उत्साही को राज्यसभा पहुंचा दिया, नेहरू की प्रशंसा ने दिया नया नाम","category":{"title":"City & states","title_hn":"शहर और राज्य","slug":"city-and-states"}}
Flash Back: ...और राजीव गांधी ने बेकल उत्साही को राज्यसभा पहुंचा दिया, नेहरू की प्रशंसा ने दिया नया नाम
Wed, 03 Apr 2024 12:17 PM IST
ishwar ashish
अजय कुमार श्रीवास्तव, अमर उजाला, बलरामपुर
अजय कुमार श्रीवास्तव, अमर उजाला, बलरामपुर
Published by: ishwar ashish
Updated Wed, 03 Apr 2024 12:17 PM IST
सार
बेकल उत्साही से जुड़े करीबी बताते हैं कि उनका बलरामपुर का घर बनवाने में नेहरू ने करीब 35 हजार रुपये दिए थे। विरोधी विचारधारा के बावजूद वह पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी बाजपेयी के भी हमेशा काफी करीब रहे।
विज्ञापन
शायर बेकल उत्साही।
- फोटो : amar ujala
विस्तार
हिंदी और उर्दू साहित्य के ख्याति प्राप्त कवि और शायर बेकल उत्साही को साहित्य में योगदान के लिए 1976 में उन्हें राष्ट्रपति ने पद्मश्री सम्मान से सम्मानित किया। पार्टी की निरंतर सेवाओं को देखते हुए तत्कालीन राजीव गांधी सरकार ने बेकल उत्साही को 1986 में राज्य सभा का सदस्य मनोनीत किया था।
विज्ञापन
देश को आजादी मिलने के बाद साल 1952 में प्रथम बार देश में आम चुनाव हो रहे थे। तब कांग्रेस के अध्यक्ष व भारत के प्रधानमंत्री पं. जवाहर लाल नेहरु चुनाव प्रचार के लिए गोंडा आए थे। चुनावी जनसभा के दौरान शहीदे आजम सरदार भगत सिंह इंटर कॉलेज गोंडा में बेकल उत्साही ने ''किसान भारत का'' कविता गाकर उनका स्वागत किया। कविता को सुनकर नेहरू मंत्रमुग्ध होकर बोले कि यह हमारा उत्साही शायर है। इसके बाद से ही उनका नाम बेकल उत्साही हो गया।
विज्ञापन
ये भी पढ़ें - रामनगरी से अभी तक कोई महिला नहीं बन सकी है सांसद, अयोध्या मंडल की सीटों पर मिल चुकी है जीत
विज्ञापन
ये भी पढ़ें - जुदा है सीतापुर के मतदाताओं का अंदाज, जो मन भाया उसे पलकों पर बैठाया, अधिकतर को जमानत के लिए तरसाया`
नेहरू की प्रेरणा से वह कांग्रेस से जुड़ कर राजनीति में आए। बेकल उत्साही से जुड़े करीबी बताते हैं कि उनका बलरामपुर का घर बनवाने में नेहरू ने करीब 35 हजार रुपये दिए थे। विरोधी विचारधारा के बावजूद वह पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी बाजपेयी के भी हमेशा काफी करीब रहे।
मोहम्मद शफी खान से बने बेकल
उतरौला तहसील क्षेत्र के गौर रमवापुर गांव में एक जून 1924 को जमींदार परिवार में बेकल उत्साही का जन्म हुआ था। उनका वास्तविक नाम मो. शफी खां था। उनके पिता का नाम जफर खां लोदी और मां का नाम बिस्मिल्ला था। बेकल उत्साही ने 1942 में पहली बार जब बलरामपुर के एमपीपी इंटर कॉलेज में शेर पढ़ा तब वह कक्षा सात में पढ़ते थे।
शेरो-शायरी के शौक के कारण उनके पिता उन्हें पसंद नहीं करते थे। उनकी रचनाएं प्रकृति के साथ- साथ गांव प्रेम, सामाजिक सौहार्द और देशभक्ति की भावना से परिपूर्ण होती थीं। बेकल उत्साही ने हिंदी और उर्दू दोनों ही भाषाओं में उत्कृष्ट साहित्य का सृजन कर दुनिया को अपनी प्रतिभा का लोहा मनवाया था। उनकी गीत, गजल, नज्म, मुक्तक, रुबाई व दोहा आदि विविध काव्य विधाओं में 20 से ज्यादा पुस्तकें प्रकाशित हुईं।