उप्र बोर्ड परीक्षा में आठ लाख बच्चे हिंदी में फेल, दुखद... भयावह... शिक्षक बोले- बड़े बदलाव की जरूरत
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क्या हिंदी महज हमारे लिए एक भाषा भर है? कतई नहीं। यह हमारी संस्कृति की संवाहक है। हमें अपनी जड़ों से जोड़ती है। अब खुद से सवाल कीजिए। हम अपनी जड़ों से कैसे कट रहे हैं? क्यों कट रहे हैं? ....क्योंकि हम अपनी चीजों पर गर्व करना भूल गए। कमतरी का यह एहसास मिटाना होगा... अपनी भाषा अपनी संस्कृति पर गर्व करना होगा... हालात खुद-ब-खुद बदल जाएंगे।
यूपी बोर्ड की परीक्षा में इस वर्ष आठ लाख परीक्षार्थी हिंदी विषय में फेल हो गए। हिंदी भाषी प्रदेश में ही नई पीढ़ी में हिंदी को लेकर इस तरह का लचर प्रदर्शन हमें हिंदी के भविष्य को लेकर चिंतित होने पर मजबूर करता है। हिंदी की इस दुर्दशा के लिए आखिर कौन जिम्मेदार है? यह प्रश्न उठना स्वाभाविक है।
क्या अंग्रेजी मीडियम स्कूलों की बाढ़ इसके लिए जिम्मेदार हैं? या फिर समाज में उस धारणा के गहरे पैठ कर जाना जो अंग्रेजी को एक स्टेटस सिंबल मानती है। या फिर यह धारणा कि अंग्रेजी रोजगार की भाषा है? यूपी बोर्ड के नतीजेे से एक बात तो बिल्कुल साफ है कि हिंदी महज परीक्षा पास करने का विषय बनकर रह गई है।
पाठ्यक्रम जटिल, शिक्षकों की कमी तो कैसे समझ में आए हिंदी
कैसे सुधरे हिंदी
जब राजकीय कॉलेजों में ही 1300 शिक्षकों के पद खाली
राजकीय शिक्षक संघ के प्रदेश अध्यक्ष पारसनाथ पांडेय का कहना है कि प्रदेश में राजकीय कॉलेजों की संख्या 2383 है। इनमें सात हजार शिक्षक कार्यरत हैं जबकि 18 हजार पद खाली हैं। खाली पड़े पदों में 1300 हिंदी के शिक्षकों के हैं। लखनऊ की बात करें तो यहां 51 राजकीय कॉलेज हैं। इनमें 1200 शिक्षक पढ़ाते हैं। यहां हिंदी के शिक्षकों के करीब 80 पद रिक्त पड़े हैं। ऐसे में खुद अंदाजा लगाया जा सकता है कि यहां हिंदी शिक्षा की हालत कैसी होगी। एडेड विद्यालयों का हाल भी बहुत खराब है जहां हिंदी शिक्षकों की कमी है।
वक्त आ गया है कि हम शिक्षकों को दें विशेष ट्रेनिंग
लखनऊ निवासी साहित्यकार व शिक्षाविद् मंजू मिश्रा अमेरिका के कैलिफोर्निया प्रांत में न सिर्फ भारतीयों को बल्कि अमेरिका के लोगों को भी 20 वर्षों से हिंदी सिखा रही हैं। अब तक वे 50 हजार से ज्यादा बच्चों, प्रौढ़ व बुजुर्गों को हिंदी सिखा चुकी हैं। हिंदी के उत्थान के लिए वे वहां लगातार अपनी संस्था उत्तर प्रदेश मंडल ऑफ अमेरिका और विश्व हिंदी ज्योति के माध्यम से हिंदुस्तानी संस्कृति में रचे-बसे साहित्यिक व सांस्कृतिक आयोजन कराती रहती हैं।
मैं स्तब्ध हूं...कभी सोचा न था अपने बच्चों में इतनी उपेक्षित हो जाएगी हिंदी
मंजू मिश्रा से जब हमने हिंदी के भविष्य पर सवाल किया तो उन्होंने कहा, इस बार उत्तर प्रदेश की बोर्ड परीक्षा में हिंदी में फेल होने वाले छात्रों की संख्या देखकर मैं स्तब्ध हूं। हिंदी अपने ही घर में अपने ही बच्चों के बीच में इतनी उपेक्षित हो जाएगी, कभी सोचा नहीं था। सच कहूं तो यह अचानक ही नहीं हो गया।
करीब 12-13 साल पहले की बात है। मेरी बेटी जो उस समय चार साल की रही होगी, अमेरिका से लखनऊ गई थी। वहां अपनी हमउम्र रिश्तेदार बच्ची के साथ टीवी देखते हुए वो मुझसे बोली, मम्मा देखो घोड़ा...। तभी लखनऊ में ही रहने वाली बच्ची बोली-नहीं ये तो हॉर्स है।
उस समय तो हम सब खूब हंसे कि अमेरिका में रहने वाली बच्ची घोड़ा जानती है लेकिन भारत में रहने वाली बच्ची हिंदी नहीं जानती। मेरा मानना है कि अंग्रेजी सीखनी चाहिए लेकिन हिंदी को बिसरा कर नहीं। बल्कि हिंदी के बाद एक अन्य भाषा के तौर पर जैसे कि फ्रेंच, स्पेनिश, जर्मन इत्यादि विदेशी भाषाएं सीखी जा सकती हैं।
...तो क्या पश्चिम से पूरब की ओर चलेगी हिंदी की बयार
यहां अमेरिका में लोग अपने बच्चों को हिंदी सिखाते हैं। चिन्मय ट्रस्ट, यूएस हिंदी फाउंडेशन, जैन मंदिर, साईं मंदिर, दुर्गा मंदिर, स्वामी नारायण मंदिर, समेत कई संस्थाएं प्रतिवर्ष आठ से दस हजार बच्चों को विशेष रूप से हिंदी सिखाती हैं। डी एन्जा कॉलेज में तो हिंदी विदेशी भाषा के रूप में सिखाई जाती है। आज की स्थिति देखकर तो लग रहा है कि वो दिन दूर नहीं जब हिंदी की बयार पश्चिम से पूरब की ओर चलेगी।
इन सुधारों की है जरूरत
- अन्य विषयों की तरह हिंदी की गुणवत्ता पर भी ध्यान दिया जाना चाहिए। इसके लिए मासिक परीक्षाएं भी कराई जा सकती हैं। - शिक्षकों को विशेष ट्रेनिंग देनी चाहिए। - स्कूलों में हिंदी से ओतप्रोत सांस्कृतिक आयोजन जरूरी हैं। - हिंदी में रोजगार के अवसर सृजित किए जाएं। - प्रतियोगी परीक्षाओं में हिंदी अनिवार्य हो।
हिंदी पढ़ाने की पद्धति में परिवर्तन हो
लखनऊ की मूल निवासी और कूपर्टीनो कॉलेज कैलिफोर्निया में हिंदी की शिक्षिका रीना माथुर कहती हैं कि एक हिंदी शिक्षक और दादी के होने के मेरे अनुभव के अनुसार बच्चों में हिंदी की रुचि बढ़ाने के लिए हिंदी पढ़ाने की पद्धति में परिवर्तन की आवश्यकता है। आजकल घर में बच्चों से बातचीत करने और कहानियां सुनने-सुनाने का अवसर और माहौल कम होता जा रहा है। बच्चे भी टीवी और सोशल मीडिया पर अधिक रहते हैं। प्रतियोगी परीक्षाओं में अगर हिंदी को अनिवार्य कर दिया जाए तो कोई भी अभिभावक हिंदी को कम वरीयता नहीं देगा। बच्चे भी हिंदी को अधिक गंभीरता से पढ़ेंगे। हिंदी के अच्छे शिक्षक भी मिल जाएंगे।
ये उपाय हो सकते हैं कारगर
- स्कूलों में काव्य समारोह व सांस्कृतिक कार्यक्रमों का आयोजन हो।
- अभिभावक घर में बच्चों से हिंदी में बात करने की आदत डालें।
- इंजीनियरिंग, प्रबंधन व मेडिकल प्रवेश परीक्षाओं में हिंदी को अनिवार्य किया जाए।
- हिंदी के शिक्षकों को वरीयता दी जाए, स्कूलों में इनके पद भरे जाएं।
पाठ्यक्रम की हिंदी पांच-छह सौ साल पुरानी भाषा
समाज पर हावी होता कॉन्वेंट कल्चर भी जिम्मेदार
जब कॉन्वेंट कल्चर इस कदर समाज पर हावी हो कि कॉलेज का प्रबंधन बच्चों को इस बात की चेतावनी देने लगे कि कैंपस में हिंदी का एक भी शब्द बोला तो फाइन लगेगा, तो आप समझ सकते हैं कि हिंदी को लेकर बच्चों के मन में किस तरह के भाव आएंगे। कॉन्वेंट स्कूलों में हिंदी शिक्षकों को भी दोयम दर्जे का समझा जाता है। कुल मिलाकर हिंदी की दुर्दशा के लिए पठन-पाठन और स्कूल प्रबंधतंत्र के साथ अभिभावक भी जिम्मेदार हैं।
हिंदी के प्रति उदासीनता के प्रमुख कारण
- छात्रों व शिक्षकों की उदासीनता और कॉन्वेंट कल्चर का आतंक
- सरकारों में हिंदी के उत्थान के लिए दृढ़ इच्छाशक्ति का अभाव
- नौकरी के लिए हिंदी की अनिवार्यता न होना
हिंदी के उत्थान के लिए ये हो सकते हैं कारगर उपाय
- सरकार के स्तर से हिंदी को बढ़ावा देने के लिए वास्तविक प्रयास हों और एक ठोस नीति बनाई जाए
- सभी प्रकार की नौकरियों के लिए हिंदी की अनिवार्यता हो
- स्कूलों व समाज में अंग्रेजी के साथ हिंदी को भी बराबर का दर्जा मिले
- प्रशासनिक कार्यों में सभी कामकाज हिंदी में संपादित हों
पहले फिल्मों से हिंदी सीखते थे लोग
मूलरूप से सुल्तानपुर के निवासी और मुंबई में रह रहे गीतकार व लेखक देवमणि पांडेय कहते हैं कि एक जमाना था जब लोग फिल्मों से हिंदी सीखते थे लेकिन अब यह सब गुजरे जमाने की बात हो गई। उत्तर प्रदेश के शहरों व कस्बों में आजकल युवा अच्छी हिंदी फिल्में देखने से ज्यादा तो मोबाइल पर लगे रहते हैं और फिल्म स्टार की लाइफ स्टाइल फॉलो करते हैं।
नई पीढ़ी ही नहीं बल्कि उनके अभिभावक भी हिंदी को बच्चा मानते हैं जिसे पढ़ने और सीखने की जरूरत नहीं समझते। आजकल हिंदी सीखने में न तो बच्चों की रुचि है और न ही अभिभावकों की। इसीलिए हिंदी विषय को लेकर ज्यादा लापरवाही बढ़ती जा रही है। जिस तरह से उत्तर प्रदेश में अंग्रेजी स्कूलों की बाढ़ आई और वहां दाखिले को लेकर अभिभावक व छात्र बेचैन रहते हैं, उसे देखकर लगता है कि हिंदी का भविष्य बहुत मुश्किल हो जाएगा।
30 साल पहले हुए शोध को नकार दिया गया
‘लखनऊ जनपद में हिंदी पठन-पाठन की स्थिति’ पर वर्ष 1990-92 में एक शोध हुआ था। इस शोध में रंजना पांडेय ने विस्तृत रिपोर्ट तैयार की थी जिसमें केंद्रीय विद्यालयों, सरकारी विद्यालयों और कॉन्वेंट स्कूलों में हिंदी के पठन-पाठन को लेकर तुलनात्मक अध्ययन किया गया था। इस शोध में केंद्रीय विद्यालयों में हिंदी के पठन-पाठन की स्थिति काफी हद तक ठीक मिली थी जबकि कॉन्वेंट व अन्य सरकारी स्कूलों में हिंदी की दुर्दशा की ओर इशारा किया गया था।
लखनऊ विवि में हिंदी के पूर्व विभागाध्यक्ष डॉ. सूर्य प्रसाद दीक्षित के दिशा-निर्देशन में हुए इस शोध के निष्कर्षों को उस समय शिक्षा विभाग को भी भेजा गया था। डॉ. दीक्षित बताते हैं कि इतने महत्वपूर्ण शोध पर शिक्षा विभाग ने कोई ध्यान नहीं दिया और उसे डस्टबिन में डाल दिया गया।
संज्ञेय अपराध है आठ लाख परीक्षार्थियों का हिंदी में फेल होना
जो आठ लाख परीक्षार्थी अनुत्तीर्ण हुए हैं, इसके लिए वे अभिभावक भी दोषी हैं जो हिंदी को वाहियात बताते हैं और यह कहते सुख पाते हैं कि उनका बच्चा हिंदी में कमजोर है। इसमें वे शिक्षक भी दोषी हैं जिन्हें कच्छा और कक्षा का भेद नहीं पता और जिनकी नियुक्ति मिशन कमीशन के तहत होती है।
वे विषय में रुचि ही पैदा नहीं कर पाते क्योंकि वे उपार्जन हेतु आते हैं, अध्यापन हेतु नहीं। उच्च शिक्षा में भी यही स्थिति है। डॉ. राहुल अवस्थी का मानना है कि दोषी वे भी हैं जो यह नियुक्तियां लोभ-लाभ में करते हैं क्योंकि वे भी ऐसे ही आते हैं। एक लंबा इतिहास है आयोग, बोर्ड और पैनल में नकली लोगों का...।
दोषी वे भी हैं जो दोषपूर्ण मूल्यांकन करते हैं। जो कॉपी जंचने की प्रक्रिया से अवगत हैं, वे स्वीकारेंगे कि बिल बनाने के फेर में एक बड़े हिस्से तक कॉपियां गलत जंचती हैं। आखिरकार दोषी वे बच्चेे भी हैं, जो हर विषय की महत्ता को विवेक की तुला पर तौल नहीं पाते, पर इसके पीछे भी वह नकारात्मक छवि छिपी है, जो हम बनाते हैं।
हिंदी का अध्ययन खैराती मत बनाइए
हिंदी का अध्ययन खैराती मत बनाइए। उसे गर्व के भाव से भरिए। कीमती बनाइए, शुल्क लगाइए। मुफ्तिया सरकारी संस्थान कभी महंगे और प्राइवेट विद्यालयों की बराबरी नहीं कर पाते। पास होने के लिए राष्ट्रभाषा या मातृभाषा में उत्तीर्ण होना अनिवार्य कर दीजिए। उसे रोजगारपरक पाठ्यक्रम का अंग बनाइए। व्यवस्था को पारदर्शी, प्रातिभ प्रवण और पवित्र कर दीजिए। देखिएगा! ये मंजर नजर से दूर हो जाएंगे।
इन बातों पर देना होगा विशेष ध्यान
हिंदी की उत्तर पुस्तिकाओं के मूल्यांकन में योग्य व हिंदी प्रेमियों को लगाया जाए। कई बार सुनने में आता है कि किसी और विषय के शिक्षक हिंदी की कॉपियां जांचने में लगा दिए जाते हैं।
सरकारी प्रयास जरूरी
यूपी बोर्ड में हिंदी का पेपर अन्य बोर्ड से कठिन होता है। इसलिए अन्य बोर्ड में हिंदी में बच्चों को अच्छे नंबर मिल जाते हैं। हिंदी की दुर्दशा इसलिए भी है क्योंकि सरकारी स्तर पर अंग्रेजी का उपयोग बढ़ता जा रहा है। सिलेबस की भी बात करें तो कई कोर्स सिर्फ अंग्रेजी माध्यम में ही हैं। सरकार को इस पर काम करना चाहिए। डॉ. आरपी मिश्रा, प्रदेश प्रवक्ता- उत्तर प्रदेश माध्यमिक शिक्षक संघ
हिंदी को आसान समझने की गलती करते हैं विद्यार्थी
इन्होंने हिंदी की बदौलत छुआ सफलता का शिखर
पद्मश्री गोपालदास नीरज के बाद जिस गीतकार ने प्रेम और कल्पनाशीलता के सौंदर्य को अपनी मखमली आवाज में पिरोकर हिंदी काव्य मंचों पर वाहवाही लूटी, उसे दुनिया डॉ. विष्णु सक्सेना के नाम से जानती है। कथ्य की दृष्टि से बेहद खास उनके गीतों में प्रेम और सृष्टि के साथ भारतीय संस्कृति में रचे-बसे रूपकों का प्रयोग श्रोताओं के सीधे दिल में उतरता है।
अभिनेता आशुतोष राणा के हिंदी प्रेम से उनके प्रशंसक भले ही बाद में परिचित हुए लेकिन आज उनके वीडियो और कविताएं जब सोशल मीडिया पर अपलोड होती हैं तो उन्हें वायरल होते देर नहीं लगती। अंग्रेजी स्कूल में पढ़े होने के बावजूद आशुतोष की हिंदी पर मजबूत पकड़ व बोलने का अंदाज लोगों को खूब पसंद आता है। जब वे अपनी कविता ‘हे भारत के राम जगो मैं तुम्हें जगाने आया हूं’ सुनाते हैं तो लोग मंत्रमुग्ध हो जाते हैं।
यूं तो नीलेश मिश्रा को हिंदी फिल्मों के गीतकार के रूप में ज्यादा जाना जाता था लेकिन आज उनकी पहचान हिंदी कहानियां बन गई हैं। सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर उनकी कहानियों को सुनने वाले लाखों में है। लखनऊ में ही रहने वाले नीलेश ने कहानी सुनाने के अपने निराले अंदाज से हिंदी बोलने वाले आम लोगों तक अपनी खास जगह बनाई है।