आपातकाल में क्रूरता: पिलाई गई पेशाब, उखाड़े गए नाखून
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आपातकाल में क्या जुल्म ढाए गए इसकी पीड़ा वही महसूस कर सकते हैं जिन्होंने इसे झेला है। इनके किस्से सुनकर किसी के भी रोएं खड़े हो जाएंगे। जुल्म की दास्तान सुनकर लगता है कि इमरजेंसी के खिलाफ लड़ाई बहुत आसान नहीं थी। जेल जाने वालों ने बाहर निकलने की उम्मीद ही छोड़ दी थी। इसलिए भले ही सुनने वालों को आपातकाल से मुक्ति बहुत बड़ी बात न लगे लेकिन इनके लिए यह दूसरी आजादी से कम नहीं है।
जेल से निकली चचा की लाश
विधायक शारदा प्रताप शुक्त आपातकाल का किस्सा सुनाते हुए कहते हैं कि मैं भूमिगत हो गया था। लोकदल की तरफ से 9 अगस्त 1975 को क्रांति दिवस पर आपातकाल के खिलाफ गिरफ्तारी देने का ऐलान हुआ। मैं भी लखनऊ पहुंचा। मेरे मित्र विनय कुमार पंजाब नेशनल बैंक में थे। तय हुआ कि पिक्चर देखी जाए। अमीनाबाद के सिनेमाघर में उमर कैद फिल्म देखने पहुंचा। एलआईयू का एक सिपाही मुझे जानता था।
फिल्म देखकर बाहर निकला और अपनी साइकिल लेकर चला तो लगा कि पुलिस वाले पीछे हैं। मैने अपना झोला जिसमें आपातकाल के विरुद्ध साहित्य था, विनय को पकड़ाया। इसी बीच, अमीनाबाद थाने के इंस्पेक्टर जेपी मिश्र पास आ गए और बोले- हमारे साथ चलो। मैंने कहा, ‘ऐसे तो मैं जाने से रहा। या तो हमें बताओ कि मेरी गिरफ्तारी कर रहे हो।’
आखिर इंस्पेक्टर ने गिरफ्तार किया और थाने ले गए। जेल में मलिहाबाद के 90 वर्षीय हिदायत अली से मुलाकात हुई। उन्होंने मुझे रामचरित मानस की चौपाई सुनाई, ‘जासु राज प्रिय प्रजा दुखारी, सो नृप अवसि नरक अधिकारी’ मेरी आंखों में आंसू आ गए। मुसलमान होकर रामचरित मानस पर इतना विश्वास।
उस दिन तो उन बुजुर्ग चचा के लिए और आदर बढ़ गया जब रिहाई आदेश लेकर जेल पहुंचे बेटे से उन्होंने कहा, ‘मैं मुचलके पर दस्तखत करके बाहर नहीं जाऊंगा।’ आपातकाल खत्म होने के बाद ही बाहर जाऊंगा या मेरी लाश बाहर जाएगी। चचा झुके नहीं। आखिर उनकी लाश ही बाहर निकली।
लाश पर भी लगाया मीसा कानून
आपातकाल पर सूर्यकुमार (पूर्व छात्र नेता, चंद्रशेखर के सहायक और इस समय भोंडसी आश्रम के ट्रस्टी) कहते हैं कि 13 सितंबर 1975 को शाम लगभग पांच बजे अमीनाबाद में जुलूस निकला। साथ में थे राजधानी के निर्मल जगत्यानी, ओमप्रकाश त्रिपाठी व विमल बहुगुणा। पुलिस ने लाठीचार्ज कर दिया। हम सभी बुरी तरह पीटे गए। थानाध्यक्ष जयप्रकाश मिश्र ने खुद मुझे मारा।
गिरफ्तार होकर जेल पहुंचा तो वहां वरिष्ठ समाजवादी नेता रामसागर मिश्र पहले से थे। उम्र लगभग 80 साल लेकिन जज्बा गजब का। स्वास्थ्य पहले से ही खराब था। मीसा भी लगा था। जेल में स्वास्थ्य और बिगड़ गया तो उन्हें सिविल अस्पताल में भर्ती कराया गया जहां उनकी मृत्यु हो गई। पर, पुलिस वाले उनके परिवार के लोगों को लाश देने को तैयार नहीं। कहा, लाश नहीं दे सकते क्योंकि मीसा लगा है। सभी परेशान।
पुलिस वाले यह तर्क सुनने को तैयार नहीं कि कोई मृत आदमी कैसे राष्ट्र की आंतरिक सुरक्षा के लिए खतरा बन सकता है। बात संगठन कांग्रेस के वरिष्ठ नेता चंद्रभानु गुप्त के पास पहुंची। वह जिलाधिकारी के पास पहुंचे। कहा, ‘बहुत कायर हो सब लोग। लाश से भी इस देश को खतरा लग रहा है।’ तब जाकर मिश्र जी की लाश परिवारीजनों को मिली।
मुंह में ठूंसा गया अंगोछा
लखनऊ विश्वविद्यालय के पूर्व छात्र नेता निर्मल सिंह बताते हैं कि इंदिरा सरकार के खिलाफ आंदोलन चलाने के जुर्म में गिरफ्तार होकर लखनऊ जेल पहुंचा। सत्यप्रकाश मालवीय पहले से वहां थे। सुनवाई की तारीख पर जेल से कोर्ट जाने का अवसर मिलता। रास्ते में हम इंदिरा के खिलाफ नारे लगाते। तत्कालीन एसएसपी जीएस बेदी ने सिपाहियों को अंगोछा छिपाकर रखने को कहा।
निर्देश दिया कि जैसे ही ये लोग नारा लगाएं मुंह में ठूंस दो। हमने नारा लगाया तो सिपाही मुंह में अंगोछा ठूंसने दौड़ पड़े। हम लोग कैंट थाना ले जाए गए। वहां बेदी से खूब कहासुनी हुई। हम लोगों के मुंह पर अंगोछा बांधकर कोर्ट ले जा गया। जैसे ही कोर्ट के पास अंगोछा खुला। हमने फिर नारा लगाया, ‘इंदिरा गांधी मुर्दाबाद।’
'मैं सोने जा रहा था, ले जाकर जेल में बंद कर दिया'
लखनऊ विश्वविद्यालय में पूर्व प्रोफेसर आरसी नागपाल अपने अनुभव साझा करते हुए कहते हैं कि जुलाई या अगस्त 1975 में लखनऊ विश्वविद्यालय में पढ़ा रहा था। एक दिन सोने की तैयारी कर रहा था कि अचानक दरवाजे पर दस्तक हुई। एक दरोगा कुछ सिपाहियों के साथ आए थे। मैंने कहा, यार तुम जब आते हो तो रात में ही आते हो। पहले भी वह कई बार लोगों के एडमिशन के लिए आया तो रात में ही आया था।
दरोगा ने कहा, डॉ. साहब आपको हमारे साथ चलना है। मैं समझ गया। पूछा, ‘वारंट लाए हो।’ पुत्र रोहित उस समय 10 महीने का था। एक तरफ घर से बाहर छोटे बच्चे और पत्नी की देखभाल तो दूसरी तरफ गिरफ्तारी। मुझे गिरफ्तारी का कारण तो नहीं बताया लेकिन जहां तक समझता हूं कि आपातकाल के खिलाफ इंडियन एक्सप्रेस को भेजा गया मेरा लेख ही वजह बना।
जेल की यातनाओं की क्या बताएं। नाम नहीं याद है। एक साथी की मां काफी बीमार थी। कोर्ट से रिहाई का आदेश हो गया। सभी लोग खुश। वह साथी भी जेल के गेट के पास आया कि रिहाई आदेश आता ही होगा। थोड़ी देर में एक कांस्टेबल आया। उसने एक कागज दिया। मैंने खुशी से खोला तो पता चला कि उस साथी की रिहाई के बजाय उस पर मीसा लगा दिया गया है।
इन पर तो बर्बरता की हद हो गई
आपातकाल के समय विद्यार्थी परिषद व अब भाजपा के राजेंद्र तिवारी बताते हैं कि किशन लाल जी लखनऊ में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रचारक थे। पुलिस ने उन्हें पकड़ लिया और आलमबाग थाने में जमकर पिटाई की। उनसे पेशाब कराई और फिर वही पेशाब उन्हें जबरिया पिलाई।
किशन लाल मेरे साथ जेल में बंद थे। बेचारों को पिटाई के कारण पेशाब तक नहीं होती थी। जैसे-तैसे ठीक हुए। स्वदेश कुमार लखीमपुर का नौजवान आपातकाल के खिलाफ परचे बांटते पकड़ा गया।
हजरतगंज कोतवाली में उसे सिगरेटों से कई जगह जलाया गया। जेल में मैंने देखा, उसके शरीर पर कोई जगह ऐसी नहीं थी जो दागी न गई हो। लखनऊ से ट्रांसफर होकर मैं बरेली पहुंचा तो वहां भी जुल्म चरम पर देखा। माता प्रसाद डीएम थे और हाकिम राय एसपी।
जेल में एक दिन दो नौजवान वीरेन्द्र अटल और रमेश आनंद गिरफ्तार होकर पहुंचे। उनके साथ जो बीता था वह दिल दहला देने वाला था। इन दोनों अधिकारियों ने प्लास से इनके नाखून खिंचवा लिए थे।
‘तुम मेरे रहते बच्चों पर लाठी व गोली चलवाओगे’
पूर्व छात्रनेता रघुनंदन सिंह काका बताते हैं कि आपातकाल के विरुद्ध आंदोलन के चलते जेल में बंद था। एक दिन मीसा बंदियों को लखनऊ से दूसरी जेल ट्रांसफर करने का आदेश सुनाया गया। हमारी मांग थी कि ट्रांसफर करने से पहले सभी को बी श्रेणी दे दी जाए। प्रशासन अपनी हठधर्मिता पर उतारू था। एडीएम पी.एन. मिश्र भारी पुलिस बल लेकर जेल में आ गए और जबरन ले जाने लगे। हम लोगों ने विरोध शुरू कर दिया।
मिश्र ने पुलिस को लाठीचार्ज और फायरिंग को कहा। इसी बीच, 80-85 साल के बुजुर्ग रामसागर मिश्र ने पी.एन. मिश्रा की गर्दन दबोच ली। बोले, ‘तुम मेरे रहते बच्चों पर लाठी व गोली चलवाओगे।’ मिश्र घबड़ा गए। पंडित जी बोले, ‘छोड़ूंगा तब जब तुम बी श्रेणी देने की घोषणा करोगे और इन पुलिस वालों को बाहर करोगे या फिर इन लोगों को ट्रांसफर करने का फैसला बदलोगे।’ मिश्र को मांगें माननी पड़ी।
जुल्म की इंतिहा थी इमरजेंसी में
सुरेंद्र श्रीवास्तव अपने अनुभव बताते हैं कि मैं राजनारायण का सहयोगी था। 26 जून 1975 की बात है। मैं अपने किसी परिचित से मिलने जेल गया था। वहां एक अधिकारी ने मुझे देखकर कहा, ‘आइए-आइए आपका स्वागत है।’ मैं कुछ समझा नहीं। आखिर में उसी ने बताया कि आपातकाल लग गया है। मैं चुपचाप वहां से निकल लिया। चिनहट पहुंचा। वहां मुझे कैसरबाग में कोतवाल शंकर सिंह मिल गए। उन्होंने गिरफ्तारी देने को कहा।
गिरफ्तार होकर जेल पहुंचा तो मोतीलाल देहलवी भी वहां थे। एक दिन उनकी पत्नी मुलाकात के लिए आई थी। मजिस्ट्रेट की अनुमति के बावजूद जो कुछ उनके साथ हुआ वह सुनकर खून खौल उठा। पता चला कि उनके साथ उस तरह की अभद्रता की गई जिसे सभ्य व्यक्ति न कह सकता है और संवेदनशील व्यक्ति सुन सकता है।