रामभक्त बोले, अयोध्या मुद्दा मध्यस्थता के लिए भेजना मामले को लटकाने की कोशिश, पैनल पर उठे सवाल
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सुप्रीम कोर्ट द्वारा अयोध्या के राम जन्मभूमि-बाबरी मस्जिद भूमि विवाद का मामला मध्यस्थता के लिए भेजे जाने पर अयोध्यावासी रामभक्तों ने नाराजगी जताई है। उन्होंने कहा कि इस मसले को हल करने के लिए पहले भी कोशिशें होती रही हैं लेकिन कोई परिणाम नहीं निकला। ऐसे में फिर से मध्यस्थता के लिए भेजना मामले को लटकाने की ही कोशिश है।
गौरतलब है कि शुक्रवार को दिए गए फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने सेवानिवृत्त न्यायाधीश एफ एम आई कलीफुल्ला को मध्यस्थता के लिये गठित तीन सदस्यीय समिति का अध्यक्ष नियुक्त किया है। प्रधान न्यायाधीश रंजन गोगोई की अध्यक्षता वाली पांच सदस्यीय संविधान पीठ ने कहा कि पैनल के अन्य सदस्यों में आध्यात्मिक गुरू श्री श्री रविशंकर और वरिष्ठ अधिवक्ता श्रीराम पंचू भी शामिल हैं। मध्यस्थता के लिए बैठकें अयोध्या में होंगी। हालांकि, श्री श्री रविशंकर पहले भी मुद्दे पर मध्यस्थता की कोशिश कर चुके हैं तब निर्मोही अखाड़े को छोड़कर हिंदू व मुस्लिम दोनों ही पक्षकारों ने उनके प्रयासों को खारिज कर दिया था।
अयोध्या में मस्जिद बनी तो कर लूंगा आत्मदाहः वेदांती
मध्यस्थता के लिए सुप्रीम कोर्ट द्वारा बनाए गए पैनल पर सवाल उठाते हुए रामजन्मभूमि न्यास के सदस्य डॉ. रामविलास दास वेदांती ने कहा कि जिनका रामजन्मभूमि मसले से कोई संबंध नहीं। जो अयोध्या के इतिहास व परंपरा से अपरिचित हैं। उन्हें पैनल में शामिल किया गया है। वेदांती ने स्पष्ट कहा कि अयोध्या में सिर्फ राम मंदिर बनेगा। नगर के बाहर मस्जिद बने तो हमें कोई आपत्ति नहीं।
'मध्यस्थता से सदैव ही भागता रहा है मुस्लिम पक्ष'
मामले पर विश्व हिंदू परिषद के प्रवक्ता शरद शर्मा ने कहा कि श्रीराम जन्मभूमि के विवाद पर मध्यस्थता का औचित्य समझ से परे है। इसके पहले ऐसी कई कोशिशें हो चुकी हैं लेकिन इनका परिणाम क्या निकला? देश की जनता सुप्रीम कोर्ट का सम्मान करती है। उन्हें जो भी करना है करके देख लें। हम मंदिर के लिए इंतजार कर लेंगे। हिंदू समाज ने 70 वर्षों से इसके लिए आहुतियां दी उसे मध्यस्थता से क्या प्राप्त होगा?
उन्होंने कहा कि जहां श्रीराम लला विराजमान हैं वह उनकी ही जन्मभूमि है। आक्रमणकारियों ने बलपूर्वक वहां बाबरी नाम ढ़ांचे को खड़ा किया। अब भव्य मंदिर के अलावा किसी भी प्रकार का ढ़ांचा हिंदू समाज स्वीकार नहीं करेगा। स्वतंत्र देश में गुलामी के इस प्रतीक का कोई स्थान नहीं है।
उन्होंने कहा कि पहले भी एक दर्जन से ज्यादा मौके आए यहां तक कि देश के प्रधानमंत्री तक ने मध्यस्थता कराने का प्रयास किया लेकिन मुस्लिम पक्ष सदैव ही इससे भागता रहा। संतों ने लाखों-करोड़ों राम भक्तों के सम्मुख यह घोषित कर रखा है कि अयोध्या की सांस्कृतिक सीमा मे मस्जिद का कोई औचित्य नहीं है। हिंदू समाज आज भी इन बातों पर कायम है।
'मध्यस्थता के लिए बनाए गए पैनल में अयोध्या का कोई प्रतिनिधित्व नहीं'
आचार्य सत्येंद्र दास ने कहा कि कोर्ट ने जो मध्यस्थता की पहल के लिए पैनल बनाया है। उसमें अयोध्या का कोई प्रतिनिधि नहीं है। मध्यस्थता की प्रक्रिया एक तरह से मामले को लटकाने का ही प्रयास है। क्योंकि यह जरूरी नहीं है कि इस तरह की कोशिश से मामले का समाधान निकल आएगा। उन्होंने कहा कि चाहे मध्यस्थता से या फिर कोर्ट के निर्णय से कुछ भी हो रामलला टेंट से बाहर आकर भव्य मंदिर में शीघ्र विराजमान हों, हम सभी यही चाहते हैं।
मध्यस्थता की पहल व्यर्थ की कवायदः त्रिलोकीनाथ
सखा रामलला त्रिलोकीनाथ पांडेय ने कहा कि कोर्ट जनभावनाओं के अनुसार चलती है। सबरीमाला केस इसका उदाहरण है। विवादित भूमि पर बाबरी मस्जिद नहीं बल्कि मुस्लिम पक्ष का विजय स्तंभ था। जो कि अपमान का सूचक और कलंक था। रामनगरी में मस्जिद बनें हम कभी भी ये स्वीकार नहीं करेंगे।उन्होंने कहा कि क्या गारंटी है कि जो पैनल बना है हिंदू समाज उसकी बात मान ही लेगा। यह एक बेकार की कवायद है।