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पांच हजार में एक बच्चे को होती है यह बीमारी

Mon, 04 Mar 2019 01:57 AM IST
manoj tiwari न्यूज डेस्क, अमर उजाला लखनऊ
न्यूज डेस्क, अमर उजाला लखनऊ Published by: manoj tiwari Updated Mon, 04 Mar 2019 01:57 AM IST
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out of 5000 only one kid suffer from this health problem
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लखनऊ। एसजीपीजीआई में चल रही कार्यशाला के दूसरे दिन चिकित्सकों ने सात साल केबच्चे की सर्जरी कर पेशाब की थैली बनाई। यह सर्जरी करीब आठ घंटे चली। पेशाब की थैली बनाने के प्लास्टिक सर्जरी करके उसके जननांग को भी विकसित किया गया है।
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यूरोलॉजी विभाग के प्रो. एमएस अंसारी ने बताया कि यह जन्मजात बीमारी है। इसे मूत्राशय की एक्सस्ट्रोफी कहते हैं। एक्सस्ट्रोफी का अर्थ होता है एक खोखले अंग का उलटा होना। इसमें पेशाब की थैली अंदर नहीं होती है। जननांग तो होता है, लेकिन उसका पूर्णरूप से विकास नहीं होता। पेट के अंदर पेशाब की थैली नहीं होने की वजह से लगातार पेशाब होती रहती है, जिससे जननांग क्षतिग्रस्त हो जाता है। प्रो. अंसारी ने बताया कि करीब तीन माह पहले यह बच्चा ओपीडी में आया था। इसके बाद उसे ऑपरेशन की डेट दी गई थी। रविवार को आठ घंटे चली सर्जरी में पेशाब की थैली बनाई गई है। अब बच्चा सामान्य बच्चों की तरह पेशाब कर सकेगा।
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प्रोफेसर एमएस अंसारी ने बताया कि यह बीमारी पांच हजार बच्चों में किसी एक को होती है। पेशाब की थैली नहीं होने की वजह से लगातार बूंद-बूंद पेशाब होती रहती है। इससे दुर्गंध आने लगती है। कुछ लोग बच्चे को डायपर लगाते हैं तो कुछ लोग कपड़ा बांध कर रखते हैं। इससे लिंग में संक्रमण होने का खतरा बना रहता है। इस तरह की दिक्कत होने पर तत्काल चिकित्सक से सलाह लेनी चाहिए। अल्ट्रासाउंड जांच में पेट के निचले हिस्से में उभार साफ तौर पर दिखता है। पेशाब की थैली नहीं होने, मूत्र नलिकाओं से अविकसित होने आदि का पता चल जाता है।
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बालक-बालिका दोनों में होती है विकृति
यह समस्या बालक एवं बालिका दोनों में पाई जाती है। लक्षण के आधार पर इलाज शुरू कर दिया जाता है। बच्चे की उम्र सालभर होने के बाद इसकी सर्जरी करके अधूरे अंग को विकसित किया जाता है।
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