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... और फिर एक साल बाद बेटी का दिल पसीजा और बोली- मां के साथ रहूंगी

Fri, 11 May 2018 02:17 PM IST
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, लखनऊ
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, लखनऊ Updated Fri, 11 May 2018 02:17 PM IST
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order of high court in the matter of minor girl in lucknow
डेमो
यह एक नाबालिग की कहानी, जिसे करीब 15 साल की उम्र में कोई बहला कर ले गया, लेकिन पुलिस ने उसे संरक्षण में लिया और कोर्ट में पेश किया। यहां उसकी मां भी पहुंची, लेकिन बेटी ने मां के साथ जाने से यह कहते हुए इन्कार कर दिया कि उसके पिता की मृत्यु हो चुकी है और मां किसी और पुरुष के साथ रह रही है।
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मां के पास वह सुरक्षित महसूस नहीं करेगी। ऐसे में कोर्ट ने उसे सितंबर 2017 में महिला शरणालय में आश्रय दिलाया। अब उसका दिल पिघला है और वह मां के साथ रहना चाहती है। इसके लिए उसने डीपीओ को प्रार्थना पत्र भिजवाया।
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मामला फिर हाईकोर्ट पहुंचा, मां ने अदालत को बताया कि वह अब पुरुष से अलग रहती है। बेटी को रखने के लिए तैयार है। हाईकोर्ट ने इसकी सीधे रजामंदी नहीं देते हुए नाबालिग के हितों को महत्वपूर्ण माना है और डीपीओ को मामले की रिपोर्ट तैयार करने के लिए कहा है।
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इसमें वह जांचेंगे कि क्या बालिका का अपनी मां के साथ रहना उसके हित में होगा? हाईकोर्ट ने कहा कि मामले पर सही निर्णय के लिए डीपीओ की रिपोर्ट को वह जानना चाहेगी। मां और बेटी के साथ रहने के लिए राजी होने पर भी हाईकोर्ट ने उन्हें सीधे इसकी इजाजत नहीं दी।

इसी आदेश पर निर्भर है बच्ची का भविष्य

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डेमो
उन्होंने कहा कि बालिका ने बातचीत में साफ और निश्चित तौर पर कहा है कि वह अपनी मां के साथ रहना चाहती है। मां इस समय दिल्ली में एक मॉल में काम कर रही है और पर्याप्त कमा रही है। बालिका, उसकी बड़ी बहन और छोटे भाई को वह संभाल सकती है।

उसी के संरक्षण में बड़ी बहन बीएससी कर रही है और छोटे भाई ने इस वर्ष हाईस्कूल पास किया है। बालिका द्वारा पूर्व में मां के साथ रहने से किए इन्कार के बारे में पूछने पर उसने बताया कि मां किसी अन्य व्यक्ति के साथ रह रही थी, इसलिए वह उनके साथ नहीं रहना चाहती थी।

लेकिन अब मां उस व्यक्ति के साथ नहीं रहती हैं। हाईकोर्ट ने कहा कि बालिका जुलाई 2019 में 18 वर्ष की होगी। फिलहाल वह मां के साथ जाने की इच्छा जता रही है, लेकिन चूंकि वह अभी नाबालिग है, इस संबंध में कोई आदेश देने से पूर्व यह जरूरी है कि अदालत उसका भविष्य, उसके हित और सुरक्षा सुनिश्चित करे। इसी से उसका भविष्य तय होना है।
 

कोर्ट की चिंता

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डेमो
हाईकोर्ट ने कहा कि बालिका ने पहले ही काफी पीड़ा भोगी है। उसकी पढ़ाई छूट गई थी, हालांकि शरणालय में इसका इंतजाम किया गया। फिर यह तथ्य जस का तस है कि उसे वैसा वातावरण नहीं मिला, जिसमें उसका पालन समाज के एक व्यक्ति के रूप में प्राकृतिक व स्वभाविक तौर पर सुनिश्चित हो पाता। ऐसे में एक सही निर्णय पर आने से पहले कोर्ट डीपीओ लखनऊ को निर्देश देती है कि वे मामले पर रिपोर्ट तैयार करें।

इसमें वे मां की स्थिति, दिल्ली में उसके काम, मामले में चल रही पुलिस कार्रवाई, आदि को भी शामिल करें। मामले की अगली सुनवाई 21 मई को होगी, तब तक यह रिपोर्ट दी जाएगी। इस तारीख पर बालिका, उसकी मां, डीपीओ उपस्थित रहेंगे। 
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