पूर्वांचल की सियासत: ‘सत्ता के ताज’ की तलाश में राजभरों पर दांव, विपक्ष के दांव से भाजपा की चुनौती बढ़ी
सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष ओम प्रकाश राजभर के सपा में शामिल होने से भाजपा की मुश्किलें बढ़ गई हैं। हालांकि, राजभर समाज के अन्य नेताओं के भरोसे भाजपा ने अपनी सियासी पकड़ मजबूत करने की कोशिश की पर कामयाबी नहीं मिली।
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उत्तर प्रदेश में 2022 में ‘सत्ता के ताज’ की तलाश में गैर भाजपा दलों की तरफ से राजभर बिरादरी पर दांव लगाने और उन पर डोरे डालने का काम शुरू हो गया है। इसके लिए सपा ने पूर्व मंत्री ओमप्रकाश राजभर में गठबंधन किया और बसपा के पूर्व प्रदेश अध्यक्ष रामअचल राजभर को पार्टी में शामिल किया है। वहीं बसपा ने भी भीम राजभर को प्रदेश अध्यक्ष बनाकर पूर्वांचल में अपनी गणित दुरुस्त करने की कोशिश की है।
वैसे भाजपा ने ओमप्रकाश राजभर के साथ रहते हुए भी इस वोट पर अपनी खुद की संगठनात्मक पकड़ व पहुंच मजबूत बनाने का काम शुरू कर दिया था। बावजूद इसके राजभरों पर विपक्ष का दांव पूर्वांचल में भाजपा की चुनौती बढ़ा सकता है। यह समय बताएगा कि भाजपा इस चुनौती से कैसे पार पाती है।
ऐसा लगता है कि विपक्ष ने पूर्वांचल में भाजपा की लगातार तीन चुनाव से बनी मजबूत पकड़ की काट उसी के सियासी गणित से करने की तैयारी की है। सब जानते हैं कि 2013 में उत्तर प्रदेश में भाजपा के प्रदेश प्रभारी बनकर आए अमित शाह ने हिंदुत्व के साथ जातिवाद की गणित पर भी गहराई से काम कराया।
ओमप्रकाश राजभर, अनुप्रिया पटेल जैसे उन नेताओं को साथ लिया जिनका अपने समाज के बीच प्रभाव दिख रहा था। अन्य बिरादरी के नेताओं को भी या तो पार्टी में शामिल कराया या पार्टी में उन जातियों के कार्यकर्ताओं का पद व कद बढ़ाकर उनकी जातियों को भाजपा में तवज्जो देने का संदेश दिया। जिसका पार्टी को लाभ भी मिला।
राजभर जाति पर इसलिए दांव
भले ही आबादी के लिहाज से प्रदेश की कुल जनसंख्या में राजभर बिरादरी की हिस्सेदारी सामाजिक न्याय समिति की रिपोर्ट के मुताबिक लगभग 3 प्रतिशत ही हो, लेकिन अवध के अयोध्या से लेकर अंबेडकरनगर तक और पूर्वांचल के बस्ती से बलिया तक कई जिलों में विधानसभा की सीटों पर इनकी संख्या 10 से 20 प्रतिशत तक है।
इसकी वजह से उन सीटों पर इनका वोट निर्णायक हो जाता है। इनमें वाराणसी, जौनपुर, चंदौली, गाजीपुर, आजमगढ़, देवरिया, बलिया व मऊ में राजभर समाज के लोग लगभग 20 प्रतिशत तक है जबकि गोरखपुर, अयोध्या, अंबेडकरनगर, बहराइच, श्रावस्ती, बस्ती, सिद्धार्थनगर, संतकबीरनगर, महराजगंज, कुशीनगर में भी 10 प्रतिशत तक बताए जाते हैं ।
भाजपा के सामने इसलिए चुनौती
सभी को याद होगा कि 2017 से पहले भाजपा ने राजभर समाज की राजनीति करने वाले ओमप्रकाश राजभर के साथ गठबंधन किया था। जिसके कारण पूर्वांचल में कई सीटों पर राजभर बिरादरी का प्रभाव होना था। पर, अति पिछड़ों को आरक्षण के फार्मूले, पिछड़ी जाति का मुख्यमंत्री सहित कुछ अन्य मुद्दों पर ओमप्रकाश राजभर और भाजपा के बीच असहमति हो गई। जिस पर ओमप्रकाश की लगातार बयानबाजी के बाद योगी आदित्यनाथ मंत्रिमंडल से विदाई हो गई। अब उन्होंने सपा से हाथ मिला लिया है। माना जाता है कि सपा उनके सहारे पूर्वांचल में भाजपा की गणित गड़बड़ाने की कोशिश करेगी।
सरोकारों का संदेश कितना होगा कारगर
वैसे भाजपा ने हरिनारायण राजभर जैसे नेताओं को चुनावी राजनीति में उतारकर इस बिरादरी के साथ संगठनात्मक संपर्क व संवाद पर काम बहुत पहले ही शुरू कर दिया था। हरिनारायण को 2014 में पार्टी ने लोकसभा का टिकट भी दिया और वे सांसद भी चुने गए। पर, वह न अपना कद बढ़ा पाए और न राजभरों के बीच भाजपा की पकड़ व पहुंच में बढ़ोतरी कर पाए।
प्रदेश में सरकार बनने के बाद भाजपा ने अनिल राजभर को मंत्री बनाकर और सकलदीप राजभर को राज्यसभा भेजकर भी राजभर बिरादरी के बीच पार्टी की सीधे पकड़ व पहुंच बढ़ाने का काम किया है। बावजूद इसके ओमप्रकाश राजभर और रामअचल राजभर जैसे नेताओं की सपा के साथ मौजूदगी ने भाजपा के सामने इस समाज के बीच चुनावी गणित को दुरुस्त रखने की राह में पहले की तुलना में कुछ मुश्किलें तो खड़ी ही कर दी है। अब आने वाले दिनों में भाजपा की तरफ से इससे निपटने के लिए क्या दांव चला जाएगा यह देखना होगा।