अखिलेश का 'विकास', अफसरों ने लगाई 'वाट'

महेंद्र तिवारी/अमर उजाला, लखनऊ Updated Mon, 20 Jan 2014 11:55 AM IST
officers stops development of up
नाबार्ड के सहयोग से चल रहीं हजारों करोड़ रुपये की योजनाएं अफसरों की बेरुखी से लटकीं पड़ी हैं। कई विभाग परियोजनाओं पर सहमति के बावजूद पैसा नहीं ला पा रहे हैं।

प्रमुख सचिव वित्त आनंद मिश्र ने हाल ही में ग्रामीण अवस्थापना विकास निधि से सहायता प्राप्त परियोजनाओं की समीक्षा की तो तमाम विभागों की कलई खुल गई।

चौंकाने वाली बात ये है कि नाबार्ड से पैसा लेकर जो परियोजनाएं चलाई जा रही हैं, अफसर उसका ठीक से हिसाब-किताब तक नहीं दे रहे हैं। इससे सरकार की किरकिरी हो रही है।

600 करोड़ की परियोजनाएं पूरा होने की सूचना दी गई है, मगर पूर्णता रिपोर्ट देने में अफसर आनाकानी कर रहे हैं

147 करोड़ की परियोजनाओं पर कुंडली
17 जिलों में गोदामों के निर्माण के लिए राज्य भंडारण निगम ने 147.62 करोड़ रुपये की परियोजना नाबार्ड को भेजी थी। परियोजना स्वीकृति समिति ने इसे तकनीकी रूप से क्लीयर कर दिया है। इसके बाद प्रदेश सरकार को औपचारिकताएं पूरी करनी हैं, जो अब तक पूरी नहीं हो सकी हैं। यह काम सहकारिता विभाग में अटका है।

बरेली जिले में कैलाशा नदी के बाढ़ नियंत्रण, कासगंज की असदगढ़ किला-नदौली बांध के चौड़ीकरण व बदायूं में गंगा नदी तटबंध निर्माण की परियोजनाओं से संबंधित स्वीकृतियां जारी होने में सिंचाई विभाग ही अड़ंगा डाले हुए है।

बताया जाता है कि सिंचाई विभाग द्वारा प्रशासकीय व वित्तीय स्वीकृतियां जारी होने के बाद ही नाबार्ड स्वीकृति पत्र जारी करेगा। सिंचाई विभाग के स्तर पर यह कार्यवाही छह महीने से लेकर दो महीने तक से लंबित है।

600 पूर्ण परियोजनाओं का ब्यौरा ही नहीं
ग्रामीण अवस्थापना विकास निधि के अंतर्गत प्रदेश की 4151 परियोजनाओं पर नाबार्ड ने शत-प्रतिशत ऋण दिया है। इनमें से करीब 600 का ब्यौरा नाबार्ड को नहीं मिल रहा है। सिंचाई विभाग ने जिन 1391 परियोजनाओं के पूरा होने की बात कही है उनमें से करीब 300 परियोजनाओं की रिपोर्ट नहीं मिल रही है।

इसी तरह पूरी हो चुकी ग्रामीण सड़कों में से 271, पुलों के 32 और माध्यमिक शिक्षा के करीब 60 परियोजनाओं की रिपोर्ट का नाबार्ड को लंबे अर्से से इंतजार है।

खर्च 41 प्रतिशत, काम सिर्फ 15 प्रतिशत
उन्नाव की डलमऊ परियोजना इस समय विस्तार अवधि में चल रही है। बताया गया है कि इस परियोजना पर 41 प्रतिशत रकम खर्च की जा चुकी है मगर मौके पर काम केवल 15 प्रतिशत ही हुआ है। नतीजा ये है कि परियोजना की लागत व समय दोनों में वृद्धि होती जा रही है। इसके अलावा झांसी के पहुुंच डैम की तस्वीर इसके उलटी है।

यहां काम 83 प्रतिशत बताया गया है जबकि पैसा 75 फीसदी ही खर्च हुआ है। इससे साफ है कि विभागीय स्तर पर परियोजनाओं के काम की समीक्षा कितनी लचर है।

परियोजनाओं के रद्द होने का खतरा बढ़ा
विभागीय अफसरों की सुस्ती का खामियाजा कुछ परियोजनाओं को भुगतना पड़ सकता है। पता चला है कि पशुपालन विभाग की सात परियोजनाएं अभी तक शुरू नहीं हो पाई हैं।

यह परियोजनाएं करीब 1.41 करोड़ रुपये से प्रस्तावित हैं। इसके अलावा लोक निर्माण विभाग की 208, पुलों की 20, सिंचाई विभाग की 39, लघु सिंचाई विभाग के 5, माध्यमिक शिक्षा की 81 व पशुपालन की 21 परियोजनाओं सुस्त है।

अब प्रमुख सचिव वित्त आनंद मिश्र ने अफसरों से दो टूक कहा है कि वे इन परियोजनाओं की समीक्षा करें। जो परियोजनाएं शुरू नहीं हुई हैं और उनकी जरूरत नहीं है तो उन्हें खत्म किया जाए।

ये पैसा मांगकर प्रस्ताव देना ही भूल गए
लघु सिंचाई व वन विभाग के लिए नाबार्ड से 100 करोड़ व 10 करोड़ की परियोजनाओं की सहमति बनी थी। बाद में वन विभाग ने 50 करोड़ रुपये हरित पट्टी के लिए मांगे थे लेकिन अधिकारियों ने नाबार्ड को प्रस्ता नहीं भेजा।

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