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कार्यालय पूजा स्थल नहीं बन सकते : हाईकोर्ट
अमर उजाला ब्यूरो, लखनऊ
Updated Tue, 11 Apr 2017 10:04 AM IST
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लखनऊ बेंच हाईकोर्ट (फाइल फोटो)
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कोई नागरिक घर या संपत्ति को कुछ नियमों के अधीन रहते हुए पूजा स्थल घोषित कर सकता है, लेकिन सार्वजनिक स्थान के लिए ऐसा नहीं किया जा सकता।
सड़क और गलियों में पूजा-प्रार्थना किसी का मूल अधिकार नहीं है, केवल धार्मिक आयोजनों के लिए इनका उपयोग हो सकता है। एक सार्वजनिक कार्यालय जहां नागरिक कर्तव्यों का निर्वहन होता है, उसे
किसी एक धर्म के पूजा स्थल में नहीं बदला जा सकता।
ऐसा हुआ तो वह कार्यालय, कार्यालय नहीं रहेगा। हाईकोर्ट की लखनऊ खंडपीठ ने खंडपीठ की नई इमारत परिसर में मंदिर बनाए जाने की याचिका को इस टिप्पणी के साथ खारिज कर दिया। अदालत ने कहा कि संविधान ने सरकार को किसी खास धर्म को प्रचारित करने का आदेश नहीं दिया है।
याचिका : अनुच्छेद 25 की व्यवस्था के अनुसार बहुसंख्यक वकीलों को मिले ऐसी जगह
याचिका हिंदू फ्रंट फॉर जस्टिस ने दायर की थी। इसमें नई इमारत में पूजा प्रार्थना के लिए मंदिर या गुरुद्वारा जैसी कोई जगह नहीं होने की बात कहते हुए बताया गया था कि हाईकोर्ट की कैसरबाग स्थित पुरानी इमारत में यह उपलब्ध थी। ऐसे में उन्हें नए कैंपस में भी ऐसी जगह मुहैया करवाई जाए।
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संविधान के अनुच्छेद 25 की व्यवस्था के अनुसार कोर्ट आने वाले बहुसंख्यक वकील को ऐसी जगह दी जानी चाहिए। इसके बिना वे अपने हिंदू धर्म के पालन से महरूम रह जाएंगे। यह संविधान में दिए गए मूल अधिकारों का हनन होगा। वकीलों के साथ साथ बड़ी संख्या में वादी भी कोर्ट आते हैं, यहां काफी समय रहते हैं, उनके भी अधिकारों का संरक्षण होना चाहिए। यह सरकार का दायित्व भी है।
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सड़क और गलियों में पूजा-प्रार्थना किसी का मूल अधिकार नहीं है, केवल धार्मिक आयोजनों के लिए इनका उपयोग हो सकता है। एक सार्वजनिक कार्यालय जहां नागरिक कर्तव्यों का निर्वहन होता है, उसे
किसी एक धर्म के पूजा स्थल में नहीं बदला जा सकता।
ऐसा हुआ तो वह कार्यालय, कार्यालय नहीं रहेगा। हाईकोर्ट की लखनऊ खंडपीठ ने खंडपीठ की नई इमारत परिसर में मंदिर बनाए जाने की याचिका को इस टिप्पणी के साथ खारिज कर दिया। अदालत ने कहा कि संविधान ने सरकार को किसी खास धर्म को प्रचारित करने का आदेश नहीं दिया है।
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याचिका : अनुच्छेद 25 की व्यवस्था के अनुसार बहुसंख्यक वकीलों को मिले ऐसी जगह
याचिका हिंदू फ्रंट फॉर जस्टिस ने दायर की थी। इसमें नई इमारत में पूजा प्रार्थना के लिए मंदिर या गुरुद्वारा जैसी कोई जगह नहीं होने की बात कहते हुए बताया गया था कि हाईकोर्ट की कैसरबाग स्थित पुरानी इमारत में यह उपलब्ध थी। ऐसे में उन्हें नए कैंपस में भी ऐसी जगह मुहैया करवाई जाए।
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संविधान के अनुच्छेद 25 की व्यवस्था के अनुसार कोर्ट आने वाले बहुसंख्यक वकील को ऐसी जगह दी जानी चाहिए। इसके बिना वे अपने हिंदू धर्म के पालन से महरूम रह जाएंगे। यह संविधान में दिए गए मूल अधिकारों का हनन होगा। वकीलों के साथ साथ बड़ी संख्या में वादी भी कोर्ट आते हैं, यहां काफी समय रहते हैं, उनके भी अधिकारों का संरक्षण होना चाहिए। यह सरकार का दायित्व भी है।
'सार्वजनिक स्थल पर धर्म का पालन के अधिकार का समर्थन नहीं'
(डेमो पिक)
सरकार : अनुच्छेद 25 में सार्वजनिक स्थल पर धर्म का पालन के अधिकार का समर्थन नहीं
प्रदेश सरकार की ओर से अतिरिक्त महाधिवक्ता उपेंद्र नाथ मिश्रा और केंद्र की ओर से एडिशनल सॉलिसिटर जनरल ने याचिका का विरोध किया और कहा कि अनुच्छेद 25 में धर्म के स्वतंत्र पालन की छूट दी गई है। लेकिन यह सार्वजनिक स्थल या परिसर में धर्म का पालन करने के अधिकार को समर्थन नहीं करती। न ही यह सरकार का कोई दायित्व है कि वह लोगों को उनकी सुविधा के अनुसार इसके लिए जगह उपलब्ध करवाए।
कोर्ट : प्रस्तावना में ‘हम भारत के लोग’ किसी एक धर्म के लिए नहीं कहा
जस्टिस अमरेश्वर प्रताप साही और जस्टिस अनिल कुमार श्रीवास्तव - द्वितीय ने अपने निर्णय में कहा कि इस तरह के प्रश्नों पर विचार सामाजिक सौहार्द और इमारत के निर्माण के उदेश्य और लोकतांत्रित, धर्मनिरपेक्ष, गैर-धार्मिक गणतंत्र के भविष्य को ध्यान में रखते हुए किया जाना चाहिए।
संविधान की प्रस्तावना का प्रथम वाक्य ‘हम भारत के लोग’ का उपयोग हुआ है, किसी एक धर्म के लिए नहीं कहा गया। यह संदेह दूर करने के लिए काफी है। यह सभी तरह की स्वतंत्रता, जिसमें धर्म की स्वतंत्रता भी शामिल है, सभी नागरिकों को बिना भेदभाव देता है। इन स्वतंत्रताओं पर कुछ तार्किक प्रतिबंध भी हैं, ताकि वे दूसरों के अधिकारों में अतिक्रमण न करें। दूसरी ओर संविधान का अध्याय - 3 कहीं पर भी सरकार को किसी खास धर्म के प्रचार का आदेश नहीं देता।
इमारत धार्मिक कार्यों के लिए नहीं न्यायिक कार्यों के लिए बनी
हाईकोर्ट ने कहा, इस इमारत का निर्माण धार्मिक कार्यों के लिए नहीं हुआ है। यहां हाईकोर्ट का उद्देश्य संविधान के संरक्षक के रूप में काम करते हुए भी मामलों में न्याय करना है। हाईकोर्ट न्याय का मंदिर है, उसका धर्म न्याय देना है। यह पूजा स्थल नहीं हो सकता। हाईकोर्ट परिसर किसी की इच्छाओं का प्रतिबिंब नहीं हो सकता। एक धर्म के लिए पूजा स्थल उपलब्ध करवाना संस्थान के मूल्यों के खिलाफ होगा।
इसका मतलब यह भी नहीं है कि कोर्ट परिसर में धर्म के बारे में सोचा न जाए। याचियों को संस्थान को एक संवैधानिक निधि के रूप में पनपने में सहयोग करना चाहिए। याचिका को खारिज करते हुए हाईकोर्ट ने कहा कि ऐसा कुछ नहीं है जो हाईकोर्ट को पूजा के लिए अलग जगह देने के लिए बाध्य कर सके। हाईकोर्ट कैंपस के बाहर पूजन के लिए जगह उपलब्ध है, जहां पूजा की जा सकती है।
प्रदेश सरकार की ओर से अतिरिक्त महाधिवक्ता उपेंद्र नाथ मिश्रा और केंद्र की ओर से एडिशनल सॉलिसिटर जनरल ने याचिका का विरोध किया और कहा कि अनुच्छेद 25 में धर्म के स्वतंत्र पालन की छूट दी गई है। लेकिन यह सार्वजनिक स्थल या परिसर में धर्म का पालन करने के अधिकार को समर्थन नहीं करती। न ही यह सरकार का कोई दायित्व है कि वह लोगों को उनकी सुविधा के अनुसार इसके लिए जगह उपलब्ध करवाए।
कोर्ट : प्रस्तावना में ‘हम भारत के लोग’ किसी एक धर्म के लिए नहीं कहा
जस्टिस अमरेश्वर प्रताप साही और जस्टिस अनिल कुमार श्रीवास्तव - द्वितीय ने अपने निर्णय में कहा कि इस तरह के प्रश्नों पर विचार सामाजिक सौहार्द और इमारत के निर्माण के उदेश्य और लोकतांत्रित, धर्मनिरपेक्ष, गैर-धार्मिक गणतंत्र के भविष्य को ध्यान में रखते हुए किया जाना चाहिए।
संविधान की प्रस्तावना का प्रथम वाक्य ‘हम भारत के लोग’ का उपयोग हुआ है, किसी एक धर्म के लिए नहीं कहा गया। यह संदेह दूर करने के लिए काफी है। यह सभी तरह की स्वतंत्रता, जिसमें धर्म की स्वतंत्रता भी शामिल है, सभी नागरिकों को बिना भेदभाव देता है। इन स्वतंत्रताओं पर कुछ तार्किक प्रतिबंध भी हैं, ताकि वे दूसरों के अधिकारों में अतिक्रमण न करें। दूसरी ओर संविधान का अध्याय - 3 कहीं पर भी सरकार को किसी खास धर्म के प्रचार का आदेश नहीं देता।
इमारत धार्मिक कार्यों के लिए नहीं न्यायिक कार्यों के लिए बनी
हाईकोर्ट ने कहा, इस इमारत का निर्माण धार्मिक कार्यों के लिए नहीं हुआ है। यहां हाईकोर्ट का उद्देश्य संविधान के संरक्षक के रूप में काम करते हुए भी मामलों में न्याय करना है। हाईकोर्ट न्याय का मंदिर है, उसका धर्म न्याय देना है। यह पूजा स्थल नहीं हो सकता। हाईकोर्ट परिसर किसी की इच्छाओं का प्रतिबिंब नहीं हो सकता। एक धर्म के लिए पूजा स्थल उपलब्ध करवाना संस्थान के मूल्यों के खिलाफ होगा।
इसका मतलब यह भी नहीं है कि कोर्ट परिसर में धर्म के बारे में सोचा न जाए। याचियों को संस्थान को एक संवैधानिक निधि के रूप में पनपने में सहयोग करना चाहिए। याचिका को खारिज करते हुए हाईकोर्ट ने कहा कि ऐसा कुछ नहीं है जो हाईकोर्ट को पूजा के लिए अलग जगह देने के लिए बाध्य कर सके। हाईकोर्ट कैंपस के बाहर पूजन के लिए जगह उपलब्ध है, जहां पूजा की जा सकती है।