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यूपी : कृषि निर्यात प्रोत्साहन की योजना के तहत नहीं बना एक भी क्लस्टर, नीति में बदलाव की दरकार

Wed, 22 Sep 2021 05:05 AM IST
दुष्यंत शर्मा महेंद्र तिवारी, लखनऊ
महेंद्र तिवारी, लखनऊ Published by: दुष्यंत शर्मा Updated Wed, 22 Sep 2021 05:05 AM IST
सार

लघु व सीमांत किसानों को नजरंदाज कर बड़े किसानों को ध्यान में रखकर नीति बनाने का असर। कलस्टर के लिए 20-20 एकड़ भूमि आपस में मिली होने की शर्त से योजना नहीं चढ़ सकी परवान। 

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Not a single cluster formed under the scheme of agricultural export promotion in up
demo pic... - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

प्रदेश में क्लस्टर आधारित खेती के जरिए कृषि निर्यात प्रोत्साहन की योजना झुनझुना साबित हुई है। दो वर्ष बीत गए हैं, प्रदेश में नीति के तहत एक भी  क्लस्टर नहीं बनाया जा सका है। किसानों का कहना है कि नीति में लघु व सीमांत किसानों की भूमिका नजरंदाज किए जाने से ऐसी स्थिति बनी है। जब तक नीति में बदलाव नहीं होता, कलस्टर आधारित निर्यात का उददेश्य पूरा नहीं हो सकता।

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प्रदेश सरकार ने 13 सितंबर, 2019 को यूपी कृषि निर्यात नीति-2019 जारी की थी। इसमें कृषि निर्यात को उस समय के 17,591 करोड़ रुपये के स्तर से बढ़ाकर दो गुना करने का लक्ष्य तय किया गया था। दावा किया गया कि नीति उत्पादन व उत्पादों के लिए क्लस्टर दृष्टिकोण को केंद्र में रखकर बनाई गई है। निर्यात को बढ़ाने के लिए पहचान किए गए कलस्टर्स में बुनियादी ढांचे के विकास के लिए तमाम तरह के प्रोत्साहन का प्रावधान किया गया। लेकिन, निर्यात क्लस्टर के लिए न्यूनतम 50 हेक्टेयर की कृषि भूमि में 20-20 हेक्टेयर आपस में सटी होने की शर्त जोड़ दी गई। भूमि निरंतरता की इस शर्त की वजह सेदो वर्ष में एक भी क्लस्टर नहीं बन सका।
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नीति में बदलाव होना चाहिए : पद्मश्री भारत भूषण
बुलंदशहर के सम्मानित कृषक व पद्मश्री भारत भूषण त्यागी का कहना है कि प्रदेश सरकार ने किसानों के लिए कई महत्वपूर्ण पहल की हैं। लेकिन, कृषि निर्यात प्रोत्साहन के  लिए क्लस्टर बनाने की प्रक्रिया निर्धारण में छोटे किसानों को केंद्र में न रखने की चूक हुई है। 50 हेक्टेयर के क्लस्टर में 20-20 हेक्टेयर की भूमि आपस में जुड़े होने की अव्यवहारिक शर्त जोड़ दी गई। दूसरा, जो नीति बनाई गई, उसकी किसानों तक जानकारी नहीं पहुंची। गुणवत्ता पूर्ण उत्पाद तैयार करने के प्रशिक्षण की व्यवस्था नहीं हुई। इसका असर ये हुआ कि क्लस्टर नहीं बन सके। इसके लिए नीति में बदलाव होना चाहिए।
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जो निर्यात के लिए काम कर रहे, वे भी नहीं ले पा रहे लाभ : यादव 
गोरखपुर के ब्रह्म ऋषि बायो इनर्जी फार्मर प्रोड्यूसर कंपनी के निदेशक महेंद्र प्रताप यादव का कहना है 2019 में कृषि विभाग के तत्कालीन अफसरों ने बड़े किसानों व कॉर्पोरेट को ध्यान में रखकर निर्यात क्लस्टर योजना बनाई। अधिकतम हिस्सा वाले छोटे किसानों का ध्यान नहीं रखा। नतीजा ये हुआ कि जो लोग निर्यात को ध्यान में रखकर खेती करते हैं वे भी इसका लाभ नहीं ले सके। यादव ने बताया कि मेरा समूह काला नमक धान की खेती कर रहा है। लेकिन, इस नीति का लाभ नहीं ले सकता। वजह, समूह में ज्यादातर लघु व सीमांत किसान हैं। 20-20 हेक्टेयर का खेत और फिर आपस में जुड़े होने की शर्त का पालन संभव नहीं है। इसके बावजूद समूह अपने हिसाब से काम कर रहा है। समूह से जुड़े किसान जहां भी हैं, उनके उत्पाद इकट्ठा करा लेता है। समूह ने इस बार 10 टन काला नमक चावल निर्यात की योजना तैयार की है।

विकास खंड हो क्लस्टर का दायरा : आशीष
गोंडा में देव ऋषि बायो इनर्जी फार्मर प्रोड्यूसर कंपनी के निदेशक आशीष सिंह कहते हैं कि 92.9 प्रतिशत लघु व सीमांत किसान हैं। ऐसे किसानों के पास अधिकतम दो हेक्टेयर कृषि भूमि उपलब्ध है। ऐसे में 20-20 हेक्टेयर की कृषि भूमि और आपस में सटी होने की शर्त से क्लस्टर बनना बेहद मुश्किल है। आशीष का कहना है कि नीति का लाभ आम किसानों को दिलाने के लिए कलस्टर में 20-20 हेक्टेयर की निरंतरता की शर्त हटाई जानी चाहिए। इस नीति का जमीनी स्तर पर क्रियान्वयन हो इसके लिए, 50 हेक्टेयर के क्लस्टर का दायरा विकास खंड तय किया जाना चाहिए। कृषि निर्यात नीति यदि छोटे व मझोले किसानों को ध्यान में रखकर बनाई जाए तो कृषि उत्पादों का निर्यात तेजी से बढ़ सकता है। किसानों की आय भी बढ़ सकती है।

भारी प्रोत्साहन का प्रावधान, फिर भी कलस्टर में नहीं रुझान
निर्यात कलस्टर बनाने, आवश्यक सुविधाओं, प्रसंस्करण इकाई की स्थापना के लिए प्रोत्साहन की व्यवस्था है। क्लस्टर में उत्पादित कृषि उत्पाद के प्रसंस्करण के लिए स्थापित नई प्रसंस्करण इकाई, पैक हाउस, कोल्ड स्टोरेज, राइपेनिंग चैंबर आदि पर प्रोत्साहन मिलेगा। यह प्रोत्साहन निर्यात के टर्न ओवर के 10 प्रतिशत अथवा 25 लाख रुपये जो भी कम हो, निर्यात प्रारंभ करने के वर्ष से 5 वर्ष तक मिल सकेगा। क्लस्टर का विस्तार किए जाने पर कलस्टर निर्माण, पंजीकरण और निर्यात लक्ष्य पूर्ण होने पर अतिरिक्त प्रोत्साहन की भी व्यवस्था है। 50 से 100 हेक्टेयर तक 10 लाख, 100 से 150 हेक्टेयर तक 16 लाख, 150 से 200 हेक्टेयर तक 22 लाख, 200 से 250 हेक्टेयर तक 28 लाख, 250 से 300 हेक्टेयर तक 34 लाख, 300 से 350 हेक्टेयर तक 40 लाख मिल सकता है। इसमें प्रथम वर्ष 40 प्रतिशत व उसके बाद 15 प्रतिशत प्रति वर्ष अगले 4 वर्ष तक दिए जाने की व्यवस्था है।

जल परिवहन अनुदान वायु परिवहन के बराबर करने की मांग
नीति के तहत वायु मार्ग से निर्यात करने पर परिवहन अनुदान के रूप में 10 रुपये प्रति किलोग्राम अथवा वास्तविक भाड़़े का 25 प्रतिशत जो भी कम हो दिए जाने की व्यवस्था है। लेकिन जल मार्ग अथवा सड़क मार्ग से निर्यात पर यह अनुदान 5 रुपये प्रति किलोग्राम अथवा वास्तविक भाड़े का 25 प्रतिशत, जो भी कम हो तय किया गया है। समूह में खेती कर रहे किसानों का कहना है कि वायु परिवहन के बराबर ही जल व सड़क मार्ग से निर्यात का परिवहन अनुदान होना चाहिए। प्रदेश से पोर्ट काफी दूर हैं और सड़क मार्ग से यह और भी महंगा पड़ता है।


सरकार कृषि निर्यात के प्रोत्साहन के लिए प्रतिबद्ध है। कृषि निर्यात नीति में कुछ विसंगतियां संज्ञान में लाई गई हैं। कुछ सुझाव भी प्राप्त हुए हैं। विभाग उस पर विचार कर रहा है। विसंगतियां जल्द से जल्द दूर की जाएंगी।
 - डा. सुग्रीव शुक्ला, निदेशक कृषि विपणन

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