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यूपी चुनाव: चुनाव चाहे जो जीते मगर इनके मुद्दे हार जाते हैं
अमर उजाला ब्यूरो-अजीत बिसारिया
Updated Sat, 04 Mar 2017 02:35 PM IST
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चुनाव चाहे जो जीते, हमारे मुद्दे हमेशा हार जाते हैं। जाति-धर्म के समीकरणों के सामने वे अपनी मुकम्मल जगह नहीं बना पाते। जुबानी वादों के अलावा कुछ हाथ नहीं आता। यह पीड़ा है मुबारकपुर और मऊ के उन संजीदे बुनकरों की, जो न सिर्फ अपने पेशे के प्रति समर्पित हैं, बल्कि आने वाली पीढ़ी को भी विरासत में कुछ न कुछ सौंपना चाहते हैं। अपने उत्पादों की अच्छी मार्केटिंग की छटपटाहट उन्हें हमेशा परेशान किए रहती है।
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यूं तो सपा संरक्षक मुलायम सिंह यादव के संसदीय क्षेत्र का हिस्सा होने के कारण मुबारकपुर में काफी विकास कार्य हुए हैं, पर मूल समस्याओं के हल न होने से यहां के बुनकर काफी निराश हैं। बुनकर किताबुद्दीन कहते हैं कि तैयार माल घरों में डंप पड़ा है।
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पहले यहां बाहर के खरीददार आते थे, पर अब वे बनारस से ही लौट जाते हैं। यहां आए भी कैसे, न उनके ठहरने की उचित व्यवस्था है और न ही खाने-पाने की। कोई ऐसा सेंटर भी नहीं है कि एक ही छत के नीचे उन्हें वैराइटी दिखाई जा सके।
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बायर-सेलर मीट का कोई इंतजाम नहीं
बुनकरों की समस्याएं बताते, किताबुद्दीन,मो. साजिद, मो हुसैन और जमशेद आलम
पीढ़ियों से मो. हुसैन का खानदान इसी काम में लगा हुआ है। वे कहते हैं कि अखिलेश सरकार ने मुबारकपुर में बुनकर विपणन केंद्र का निर्माण तो किया है, पर अभी तक यह चालू नहीं हुआ। इसमें 158 दुकानें बन गई हैं, पर बाहर से आने वाले व्यापारियों को ठहरने के लिए गेस्ट हाउस व सेलर-बायर मीट के लिए मीटिंग हॉल की व्यवस्था नहीं है।
अहमद जिया का मानना है कि गेस्ट हाउस और मीटिंग हॉल के बिना यहां अच्छे खरीदारों को नहीं लाया जा सकता। यही वजह है कि वे बनारस से ही लौट जाते हैं। यहां के बुनकर बिचौलियों को अपना माल सस्ते में देने को मजबूर हैं।
चालू नहीं हुआ एकमात्र विपणन केंद्र
बुनकर केंद्र चलाने वाले इफ्तिखार मुनीम यह स्वीकार करते हैं कि पिछले पांच साल में मुबारकपुर के बुनकरों की समस्याओं को ध्यान में रखते हुए कुछ काम हुए हैं, पर वे नाकाफी हैं। कहते हैं कि छह महीने से विपणन केंद्र बनकर तैयार है, पर इसे चालू नहीं किया गया। वे विपणन केंद्र में साप्ताहिक हाट लगाने का मुद्दा भी प्रमुखता से उठाते हैं और केंद्र के परिसर में अच्छे फूड प्लाजा की जरूरत पर बल देते हैं। नौशाद अहमद का कहना है जिस तरह से इलेक्शन के दौरान अच्छी बिजली मिली, अगर इसी तरह से पूरे साढ़े चार साल मिलती रहे तो पॉवरलूम से कम लागत में ज्यादा उत्पादन किया जा सकता है।
सात साल से नहीं बढ़ी मजदूरी
जमशेद आलम कहते हैं कि उत्पादों की उचित मार्केटिंग न होने से पिछले सात साल से यहां बुनकरों की आमदनी में बढ़ोतरी नहीं हुई है। 5वीं पास जमशेद कहते हैं कि यह वक्त ऑनलाइन मार्केटिंग का है। इसमें कम पढ़े-लिखे बुनकरों की मदद के लिए सरकार को आगे आना चाहिए। एक बार बिचौलियों से मुक्ति मिल जाए तो हम खूब तरक्की करके दिखा सकते हैं।
अहमद जिया का मानना है कि गेस्ट हाउस और मीटिंग हॉल के बिना यहां अच्छे खरीदारों को नहीं लाया जा सकता। यही वजह है कि वे बनारस से ही लौट जाते हैं। यहां के बुनकर बिचौलियों को अपना माल सस्ते में देने को मजबूर हैं।
चालू नहीं हुआ एकमात्र विपणन केंद्र
बुनकर केंद्र चलाने वाले इफ्तिखार मुनीम यह स्वीकार करते हैं कि पिछले पांच साल में मुबारकपुर के बुनकरों की समस्याओं को ध्यान में रखते हुए कुछ काम हुए हैं, पर वे नाकाफी हैं। कहते हैं कि छह महीने से विपणन केंद्र बनकर तैयार है, पर इसे चालू नहीं किया गया। वे विपणन केंद्र में साप्ताहिक हाट लगाने का मुद्दा भी प्रमुखता से उठाते हैं और केंद्र के परिसर में अच्छे फूड प्लाजा की जरूरत पर बल देते हैं। नौशाद अहमद का कहना है जिस तरह से इलेक्शन के दौरान अच्छी बिजली मिली, अगर इसी तरह से पूरे साढ़े चार साल मिलती रहे तो पॉवरलूम से कम लागत में ज्यादा उत्पादन किया जा सकता है।
सात साल से नहीं बढ़ी मजदूरी
जमशेद आलम कहते हैं कि उत्पादों की उचित मार्केटिंग न होने से पिछले सात साल से यहां बुनकरों की आमदनी में बढ़ोतरी नहीं हुई है। 5वीं पास जमशेद कहते हैं कि यह वक्त ऑनलाइन मार्केटिंग का है। इसमें कम पढ़े-लिखे बुनकरों की मदद के लिए सरकार को आगे आना चाहिए। एक बार बिचौलियों से मुक्ति मिल जाए तो हम खूब तरक्की करके दिखा सकते हैं।
अपना ही कल्याण करती है सोसाइटी
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महबूब आलम कहते हैं कि अकेले मुबारकपुर क्षेत्र में बुनकरों के कल्याण के लिए 462 सोसाइटी चल रही हैं, मगर इनसे सत्ताधारी दल से जुड़े कुछ लोगों का ही कल्याण हो रहा है। आम बुनकरों को कोई फायदा नहीं हो रहा। यूपिका हैंडलूम सरीखी संस्थाएं इनकी मदद से ही साड़ियां खरीदती हैं। शाहिद परवेज अंसारी बताते हैं, इससे ज्यादा पीड़ा क्या होगी कि मुबारकपुर में बनने वाली साड़ी भी बनारसी साड़ी के नाम से बिकती है। चार लाख से ज्यादा बुनकरों वाला यह कस्बा अपनी पहचान के लिए तरस रहा है।
हावी है जाति-धर्म के समीकरण
बुनकर अब्दुल बाकी कहते हैं कि हर चुनाव में जाति-धर्म के मुद्दे हावी हो जाते हैं। बुनकरों के असली मुद्दे इन समीकरणों के मुकाबले काफी पीछे छूट जाते हैं। चुनाव परिणाम चाहे जो हों, एक तबके के रूप में बुनकरों की हमेशा हार ही होती है।
प्रोसेसिंग प्लांट की सख्त जरूरत
मऊ के व्यापारी उमाशंकर ओमर कहते हैं कि यहां के बुनकर नए जमाने के हिसाब से खुद को नहीं ढाल पा रहे हैं। इसके लिए वे नहीं, बल्कि हमारा सिस्टम जिम्मेदार है। प्रोसेसिंग प्लांट न होने के कारण सभी बुनकर डिजाइन की छपाई करते हैं। नतीजतन वैराइटी न होने के कारण माल डंप हो जाता है। अगर सरकार एक अदद आधुनिक मशीनों से युक्त प्रोसेसिंग प्लांट लगवा दे तो हर पीस अलग प्रिंट का निकाला जा सकता है।
हावी है जाति-धर्म के समीकरण
बुनकर अब्दुल बाकी कहते हैं कि हर चुनाव में जाति-धर्म के मुद्दे हावी हो जाते हैं। बुनकरों के असली मुद्दे इन समीकरणों के मुकाबले काफी पीछे छूट जाते हैं। चुनाव परिणाम चाहे जो हों, एक तबके के रूप में बुनकरों की हमेशा हार ही होती है।
प्रोसेसिंग प्लांट की सख्त जरूरत
मऊ के व्यापारी उमाशंकर ओमर कहते हैं कि यहां के बुनकर नए जमाने के हिसाब से खुद को नहीं ढाल पा रहे हैं। इसके लिए वे नहीं, बल्कि हमारा सिस्टम जिम्मेदार है। प्रोसेसिंग प्लांट न होने के कारण सभी बुनकर डिजाइन की छपाई करते हैं। नतीजतन वैराइटी न होने के कारण माल डंप हो जाता है। अगर सरकार एक अदद आधुनिक मशीनों से युक्त प्रोसेसिंग प्लांट लगवा दे तो हर पीस अलग प्रिंट का निकाला जा सकता है।