नवजात को लेकर भटकते रहे मां-बाप, उखड़ गई सांस
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अस्पतालों में बदहाल व्यवस्था और लापरवाही ने एक बार फिर एक नवजात की जान ले ली। सुल्तानपुर में जन्मे एक नवजात की जान बचाने के लिए उसका पिता राजधानी के सरकारी अस्पतालों में गुहार लगाता रहा लेकिन कहीं भी उसे इलाज नहीं मिला।
जब तक वह ट्रॉमा सेंटर पहुंचा नन्हीं सी जान की सासें उखड़ चुकी थीं। बदहवास पिता बस इतना ही कह पा रहा था कि वक्त पर इलाज मिल जाता तो उसके बच्चे की जान बच सकती थी।
सुल्तानपुर के करौना गांव के अम्बरीश कुमार की पत्नी पूनम (29) का 28 फरवरी को सुल्तानपुर के निजी अस्पताल में प्रसव हुआ था। अम्बरीश बताते हैं कि प्रसव के दो दिन बाद बच्चे को सांस लेने में दिक्कत हुई।
डॉक्टरों ने दवा देकर कहा कि जल्दी ठीक हो जाएगा। तीन मार्च की सुबह पांच बजे बच्चे की हालत बिगड़ी तो डॉक्टरों ने जिला अस्पताल जाने की सलाह दी। सुबह सात बजे जिला अस्पताल पहुंचे तो डॉक्टरों ने एनआईसीयू की जरूरत बताकर लखनऊ रेफर कर दिया।
डॉक्टर लगवाते रहे मां-बाप से चक्कर
सुबह 11 बजे लोहिया अस्पताल की इमरजेंसी पहुंचे तो डॉक्टर ने इलाज देने के बजाय ओपीडी के चक्कर लगवाए। इसके बाद वहां के स्टाफ के कहने पर मां-बाप झलकारी बाई अस्पताल पहुंचे तो पर्चा काउंटर पर बैठे कर्मचारी ने निजी अस्पताल का केस बताकर भर्ती करने से मना कर दिया।
दोपहर करीब एक बजे डफरिन अस्पताल पहुंचे तो डॉक्टर ने देखते ही वेंटिलेटर सपोर्ट की जरूरत बताकर ट्रॉमा सेंटर रेफर कर दिया। दोपहर दो बजे जब ट्रॉमा सेंटर पहुंचे तो वहां इमरजेंसी में मौजूद डॉक्टरों ने जांच करने के बाद बच्चे को मृत बताया।
नवजात की मौत के बाद मां पूनम और पिता अम्बरीश फूट-फूट कर रोने लगे। पिता का आरोप था कि बच्चे की हालत खराब होने के बाद भी उसे अस्पतालों में भर्ती नहीं किया गया। समय रहते इलाज मिल जाता तो उसकी जान बच सकती थी।
एनआईसीयू की कमी ले रही जान
लोहिया, डफरिन और झलकारीबाई अस्पताल में एनआईसीयू की सुविधा तो है लेकिन अचानक कोई नवजात पहुंच जाए तो उसे बेड मिलना मुश्किल है। लोहिया में आठ बेड, झलकारीबाई में छह और डफरिन में 12 बेड की यूनिट हर समय फुल रहती है।
डॉक्टरों का मानना है कि अस्पतालों में मानक के अनुसार कुछ भी नहीं है। रोजाना हर अस्पताल में 15 से 20 केस हो रहे हैं और जन्म लेने वाले बच्चों को एनआईसीयू मिलना मुश्किल होता है। वेंटिलेटर सपोर्ट तो किसी अस्पताल में नहीं है। बच्चे की हालत अधिक खराब हो जाए तो केजीएमयू भेजने के अलावा कोई चारा नहीं है।
वहीं सीएमओ डॉ. एसएनएस यादव कहते हैं कि नवजातों को बेहतर इलाज के लिए सभी अस्पतालों में व्यवस्था है। बेड खाली न होने के चलते बच्चे को भर्ती नहीं किया जा सका होगा। ऐसा कोई नियम नहीं है कि प्राइवेट अस्पताल में जन्म लेने वाले बच्चे को भर्ती न किया जाए।
केजीएमयू ट्रॉमा सेंटर में वेंटिलेटर सपोर्ट की व्यवस्था है इसलिए बच्चे को रेफर किया गया। इस बारे में अस्पतालों को निर्देश जारी कर प्राथमिक उपचार देने के लिए कहा जाएगा।