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महिला की जिंदगी की कीमत, 3 लाख रुपये!

Mon, 28 Jul 2014 02:40 AM IST
अतुल भारद्वाज/अमर उजाला, लखनऊ
अतुल भारद्वाज/अमर उजाला, लखनऊ Updated Mon, 28 Jul 2014 02:40 AM IST
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compension of three lakhs on doctors

इलाज के दौरान लापरवाही बरतने से एक महिला की मौत के मामले में उपभोक्ता फोरम में जानकीपुरम निवासी सर्जन डॉ. टीसी गोयल और महानगर एक्सटेंशन निवासी फिजीशियन डॉ. सत्यवान को मेडिकल नेग्लिजेंस का दोषी पाया है।

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फोरम में इन दोनों डॉक्टरों पर तीन लाख रुपये का हर्जाना लगाया है। कटरा मकबूलगंज के शिवप्रसाद ने 11 वर्ष पुराने इस मामले में सत्यशिव क्लीनिक को भी पक्ष बनाया था।
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शिवप्रसाद ने शिकायत की थी कि इन डॉक्टरों ने उनकी पत्नी चंदा के गॉल ब्लेडर के ऑपरेशन में लापरवाही की, जिससे चंदा की तबियत बिगड़ती गई और उसकी मौत हो गई।
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शिकायत के मुताबिक, मार्च 2003 में चंदा को पीलिया हुआ। रेलवे हॉस्पिटल में इलाज के बाद उसे डिस्चार्ज कर दिया गया। अप्रैल 2003 में उसे  अचानक से तेज दर्द हुआ, जिस पर उसे सिविल अस्पताल में दिखाया गया।

शिवप्रसाद के अनुसार, परिवार के लोगों के कहने पर 12 अप्रैल 2003 को उसने चंदा को डॉ. टीसी गोयल को दिखाया। डॉ. गोयल ने चंदा के गॉल ब्लेडर में स्टोन होने की बात कहकर तुरंत ऑपरेशन की सलाह दी।

ऑपरेशन के लिए डॉ. सत्यवान से भी राय ली गई। 14 अप्रैल को डॉ. गोयल ने ऑपरेशन किया। इसके बाद स्टोन की जांच के लिए भेज दिया गया।

डॉ. गोयल ने शिवप्रसाद के पूछने पर भी ऑपरेशन से पहले और न ही बाद में मरीज की जान जोखिम में होने की बात बताई।

बावजूद धीरे-धीरे स्वस्थ होने की बात कह उसे आराम मिले बिना बकाया पैसे जमा करवा डिस्चार्ज कर दिया।

शिकायतकर्ता ने बताया कि 5 मई 2003 को ट्यूब से मवाद आने के बाद उसने डॉ. गोयल से फिर संपर्क किया। कुछ जांच कराने के बाद डॉ. गोयल ने जल्दी रिकवरी होने की बात कहकर दिखाते रहने को कहा।

यहां कैंसर विशेषज्ञ डॉक्टर को दिखाने की जगह डॉ. गोयल लापरवाही करते रहे। 13 जून 2003 को केजीएमयू में उनकी पत्नी की मौत हो गई।

केजीएमयू की मेडिकल रिपोर्ट में मौत की वजह सेप्टीसीमिया बताया गया जोकि गाल ब्लेडर में कैंसर हो जाने से हुआ था। फोरम को बताया गया कि खून की जांच में बिलरुबिन का स्तर 16.75 प्रतिशत था।

ऐसे में भी ऑपरेशन जोखिम भरा था। इसके बावजूद डॉक्टर ने रुपयों के लालच में ऑपरेशन किया, जिसकी वजह से चंदा की मौत हो गई।

डॉ. गोयल का कहना था कि सभी जांच कराने के बाद ही ऑपरेशन किया गया। कैंसर प्रभावित गॉल ब्लेडर को इसलिए नहीं पहचाना जा सका क्योंकि कोई सूजन या गांठ नहीं थी। जांच का एकमात्र विकल्प अल्ट्रासाउंड है।

अंतिम रूप से बॉयोप्सी से ही कैंसर का पता किया जा सकता है। मरीज की देखभाल के लिए पूरी सावधानी और ट्रीटमेंट के तरीके को अपनाया गया। उन्होंने दलील दी कि वैसे भी मरीज की मौत का कारण दिल का दौरा है।

अगर मरीज का समय पर ऑपरेशन नहीं किया गया होता तो यह और ज्यादा बुरा हो सकता था। वहीं डॉ. सत्यवान का कहना था कि कैंसर स्पेशलिस्ट को दिखाने के लिए कोई रिक्वेस्ट उनसे नहीं की गई।

नर्सिंग होम से सभी जरूरी सुविधाएं मरीज को उपलब्ध कराई गईं। वहीं, फोरम ने इस पूरे मामले में एसजीपीजीआई के विशेषज्ञ डॉक्टरों से राय ली। मामले की गंभीरता को देखते हुए फोरम ने एसजीपीजीआई को जांच फारवर्ड की थी।

जांच में बताया गया कि मरीज को कैंसर का पता चलने के बाद विशेषज्ञ डॉक्टर को रेफर किया जाना चाहिए था। डॉक्टर का दावा पूरा करने के लिए इस तरह की कोई रेफरल स्लिप मौजूद नहीं है।

सर्जन दोबारा पीलिया होने के डर से टी-ट्यूब भी नहीं निकाल सके। इसी वजह से मरीज को शायद बुखार बना रहा। फोरम ने माना कि मरीज को कैंसर विशेषज्ञ को रेफर नहीं किया गया।

वहीं टी-ट्यूब नहीं निकालना डॉक्टर की अक्षमता को ही साबित करता है जोकि एसजीपीजीआई की रिपोर्ट में शामिल है।

अध्यक्ष विजय वर्मा ने आदेश में कहा कि डॉ. टीसी गोयल ने पूरी कर्मठता और केयर के साथ अपना काम नहीं किया।

डॉक्टर के रिकॉर्ड को सुनकर ही शिकायकर्ता अपनी पत्नी को लेकर गया। लेकिन कोई अच्छे रिकॉर्ड का डॉक्टर लापरवाही नहीं कर सकता, ऐसा भी संभव नहीं। एक डॉक्टर जानबूझकर मरीज का नुकसान नहीं करता।

लेकिन अगर वह अपना काम पूरी कर्मठता से भी नहीं करता तो भी यह सेवा में कमी है। डॉ. सत्यवान ने भी अपने बयान में कहा कि जब उनसे मरीज नहीं संभला तो केजीएमयू रेफर कर दिया।


जहां मरीज की सेप्टीसीमिया से मौत हो गई। हालांकि डॉ. सत्यवान भी अपनी जिम्मेदारी से नहीं भाग सकते। ऐसे में शिकायतकर्ता अपने चार बच्चों के साथ पत्नी की मौत की क्षतिपूर्ति पाने का अधिकारी है।

विपक्षी पार्टियों को इसके लिए तीन लाख रुपए का हर्जाना चुकाना होगा। वहीं 3,000 रुपये विधिक व्यय के अदा करने होंगे।

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