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अयोध्या विवाद: मुसलमानों ने वसीम रिजवी को प्रतिनिधि मानने से किया इंकार, कहा- कोर्ट करे फैसला

Sun, 12 Nov 2017 03:22 PM IST
टीम डिजिटल/अमर उजाला, लखनऊ
टीम डिजिटल/अमर उजाला, लखनऊ Updated Sun, 12 Nov 2017 03:22 PM IST
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muslims say wasim rizvi is nor our representative on ayodhya issue.

अयोध्या मसले पर विवाद सुलझाने के ‌लिए संतों से मिलकर आपसी सहमति का रास्ता निकालने अयोध्या आए शिया वक्फ बोर्ड के अध्यक्ष वसीम रिजवी को मुसलमानों ने अपना प्रतिनिधि मानने से इन्कार कर दिया और कहा कि वह खुद इस मसले पर संतों से बात करेंगे। सा‌थ ही ये भी कहा कि मामला कोर्ट में है वहीं, इसका फैसला हो। अगर कोर्ट कह दे तो कल से ही मंदिर निर्माण शुरू हो जाए।

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रविवार को संकट मोचन हनुमानगढ़ी मंदिर के बंद कमरे में वार्ता शुरू हुई। जिसमें हिंदू पक्षकार महंत धर्मदास, अखाड़ा परिषद के अध्यक्ष नरेंद्र गिरी, शिया वक्फ बोर्ड के अध्यक्ष वसीम रिजवी और बाबरी मस्जिद के मुद्दई इकबाल अंसारी सहित कई लोग शामिल हुए।
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इकबाल अंसारी, अचानक बैठक से नाराज होकर निकले और वसीम रिजवी को मुस्लिम पक्षकार मानने से इंकार कर दिया और कहा कि हम उनके फॉर्मूले से सहमत नहीं हैं। रिजवी का पक्ष सुन्नी मुसलमान नहीं मानेगा। वो मुसलमानों के पक्षकार नहीं हैं। बाबरी सुन्नियों की मस्जिद थी। इसलिए वहीं इस मामले के मुद्दई हैं। रिजवी का इसमें कोई दखल नहीं होना चाहिए।
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कहा कि अगर रिजवी जैसे लोग बातचीत में शामिल होंगे तो कभी भी मुद्दे का हल नहीं निकलेगा। अंसारी ने कहा कि अब मामला कोर्ट में है वही इसका फैसला करे। अगर कोर्ट कहे तो कल से ही मंदिर बनना शुरू हो जाएगा। इकबाल अंसारी को पिता हाशिम अंसारी की मौत के बाद अयोध्या मामले में मुस्लिम पैरोकार बनाया गया था।

वहीं,  वसीम रिजवी का कहना है कि अयोध्या में मंदिर ही बनना चाहिए कि जबकि मस्जिद को किसी अन्य जगह मुस्लिम बस्‍ती में बना देना चाहिए, लेकिन इस पर मुसलमानों के सभी वर्ग सहमत नहीं हैं।

सुप्रीम कोर्ट ने कहा था, बातचीत से निकालें हल

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अयोध्या विवाद पर मार्च 2017 में सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि था कि इस मुद्दे का हल अदालत के बाहर संबंधित पक्ष मिलकर निकालें और अगर जरूरी होगा तो कोर्ट इसमें दखल देगा।

जबकि, इलहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ बेंच ने विवादित 2.77 एकड़ की जमीन को तीन पक्षों में बराबर बांटने का आदेश दिया था। कोर्ट के अपने फैसले में एक तिहाई हिस्सा निर्मोही अखाड़ा, एक तिहाई हिस्सा रामलला विराजमान को और एक तिहाई हिस्सा सुन्नी वक्फ बोर्ड को देने की बात कही थी।

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